-आदिवासियों की बेदखली पर शिवराज सिंह चौहान मैदान में
-वन विकास निगम के एमडी मनोज अग्रवाल की भूमिका पर उठे सवाल
अनोखा तीर, भोपाल। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने मध्यप्रदेश में दो चर्चित डायलॉग के बीच सियासी और प्रशासनिक टकराव की नई कहानी खड़ी कर दी है। एक तरफ केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भरोसा दिलाने वाला संवाद—’मैं हूं ना तो दूसरी तरफ वन विभाग के गलियारों में पीसीसीएफ मनोज अग्रवाल से जोड़ा जाने वाला जुमला—’दिल मांगे मोर। लाड़कुई में आदिवासी परिवारों की बेदखली के बाद इन दोनों संवादों के मायने फिर चर्चा में हैं। जब भी वन भूमि से आदिवासी परिवारों को हटाने की कार्रवाई होती है, शिवराज सिंह चौहान का उनके बीच पहुंचकर उन्हें भरोसा दिलाना उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा रहा है। इस बार सीहोर वन मंडल के लाड़कुई क्षेत्र में बेदखली की कार्रवाई के बाद उनका भोपाल पहुंचकर मामले में दखल देना इस मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना रहा है। सवाल है कि वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और वर्षों से वहां रह रहे परिवारों के पुनर्वास के बीच संतुलन कैसे बनेगा? दूसरी ओर, वन विकास निगम के प्रबंध संचालक मनोज अग्रवाल की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। विभागीय हलकों में उनके साथ जोड़े जाने वाले ‘दिल मांगे मोरसंवाद को अतिक्रमण हटाने के अभियानों में मैदानी अधिकारियों का उत्साह बढ़ाने वाली कार्यशैली के रूप में याद किया जाता है। अब लाड़कुई में बेदखली की कार्रवाई को लेकर उनके नेतृत्व और जवाबदेही पर चर्चा तेज है। टकराव का असली सवाल डायलॉग का नहीं, जवाबदेही का है। यदि वन भूमि से अतिक्रमण हटाना कानूनन जरूरी है, तो कार्रवाई की प्रक्रिया, प्रभावित परिवारों के अधिकार और पुनर्वास की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। वहीं, यदि किसी कार्रवाई पर राजनीतिक स्तर से हस्तक्षेप होता है, तो उसके पीछे के तथ्य भी सामने आने चाहिए। फिलहाल ‘मैं हूं न और ‘दिल मांगे मोर की चर्चा के बीच निगाहें इस बात पर हैं कि लाड़कुई के आदिवासी परिवारों को राहत मिलती है या बेदखली का विवाद और गहराता है।




