Skip to content
Thursday, 29 October 2026
मध्य प्रदेश राष्ट्रीय हरदा

शब्द की सीमा से परे है प्रेम: मदनमोहन जी महाराज

5 min read
Text Size:

प्रेम बदला नहीं लेता, बलिदान देता है। 

अनोखा तीर, हरदा। वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज का मानना है कि प्रेम को शब्दों की सीमा में सीमित करते हुए उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार प्रेम में स्वार्थ, अहंकार और अपेक्षा का कोई स्थान नहीं होता। प्रेम शब्द को केन्द्र में रखते हुए एक अनौपचारिक बातचीत दौरान श्री व्यास जी महाराज ने प्रेम शब्द पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेम मानव की आंतरिक शांति और सकारात्मक अवस्था है, जिसकी शाब्दिक रूप से कोई भाषा नहीं होती। सीधे तौर पर कहां जाएं तो आंसूओं से बढ़कर प्रेम की कोई भाषा नही है। हम आध्यात्मिक दृष्टि से अगर प्रेम का वर्णन करते हैं तो प्रेम बदला नहीं लेता, बलिदान देता है। कामी व्यक्ति कभी प्रेमी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जब वियोगिनी भक्ति किसी के जीवन में प्रगट हो जाती है, तब सब साधन शून्य हो जाते हैं। सभी क्रियाएं सब सुक्ष्म हो जाती हैं। इस भक्ति तक पहुंचना इतना आसान नहीं है। जब व्यक्ति की प्रीत पुरातन प्रगट हो जाती है तभी इस स्थिति में पहुंच पाता है। प्रेम सिखाया नहीं जा सकता। प्रेम प्रकट होता है। मोह किसी व्यक्ति, स्थान आदि से हो सकता है, लेकिन प्रेम सार्वभौमिक होता है। उन्होंने प्रेम की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करने वाली प्रसिद्ध सूफी संत बाबा फरीद की प्रभु मिलन की चाह और प्रभु वियोग की पीड़ा को प्रदर्शित करती पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि

 “कागा सब तन खाइयों, चुन चुन खाइयों मांस, दो नैना मत खाइयों मोहें पिया मिलन की आस”।

वियोगिनी भक्ति बड़ी अद्भुत होती हैं। उन्होंने चेतन्य महाप्रभु का वर्णन करते हुए प्रेम की विरह वेदना पर प्रकाश डाला। वहीं संत कबीर दास की उल्पभाषी का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यह पी प्रेम को दर्शाने वाली बड़ी रोचक है। गोपिकाओ को भक्ति की ध्वजा माना गया है। कहां जाता है कि गोपियां श्रीकृष्ण के विरह में इतना रोई इतना रोई की आज भी हमारे ब्रज का पानी खारा है। गंगाजल से ज्यादा महत्व प्रेमी के आंसूओं का है। जीवन में त्याग करना पड़ता है लेकिन वैराग्य हो जाता है। वैराग्य पकता है तो जीवन में उदासीनता आ जाती है। जब उदासीनता पकती है तो व्यक्ति अनुरागी हो जाता है। इस स्थिति का शाब्दिक वर्णन करना ठीक वैसा ही है जैसे हम किसी गूंगे व्यक्ति को गूड़ खिलाकर उसके स्वाद के बारे में पूछे। उसे मीठा तो लगता है, रस भी प्राप्त हो रहा है, लेकिन वह वाणी से व्यक्त नहीं कर सकता। यही स्थिति प्रभु भक्ति में डूबे हुए भक्त की होती है। इसलिए प्रेम कामना रहित, वासना रहित होता है। उसमें कोई चाह नहीं होती, लोभ नहीं होता। लोभी प्रेमी नहीं हो सकता। श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि भ्रमण के लिए पूरा विश्व अच्छा हो सकता है, लेकिन रहने के लिए भारत से अच्छा कोई स्थान नहीं है। यह देव भूमि है। जहां अवतार लेने के लिए स्वयं भगवान भी प्रतीक्षा करते हैं। नदियां किसी भी देश में हो सकती है लेकिन गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी अगर किसी भी देश में हो तो बताइए। किसी और देश में कुंभ नहीं लगता। किसी भी देश में नदियों को मां का दर्जा प्राप्त नहीं है। विदेशी भी हमारे यहां कुंभ में आते हैं।‌ श्री व्यास जी ने कहा कि हमारी नर्मदा जैसी पवित्र नदी की परिक्रमा करने विदेशी भी आते हैं। उन्होंने तो अपनी दिव्य अनुभूतियों को लेकर किताबें तक लिखी है। यह सब प्रभु के प्रति अपने प्रेम का समर्पण ही है। आप धार्मिक स्थानों की यात्रा करें, चारों धाम जाएं, वृंदावन आएं यह सब अच्छी बात है लेकिन इससे ज्यादा अच्छा यह है कि व्यक्ति के अंदर ऐसा प्रेमा भाव प्रकट हो जिससे वह जहां रहता है वहीं उसके भाव से, व्यवहार से और कर्म से वह स्थान ही ब्रज और वृंदावन बन जाएं। यह सब शुद्ध अंतःकरण से ही संभव है। अगर आपका अंतःकरण शुद्ध तो प्रेम प्रकट होगा और अशुद्ध है तो वासना प्रकट होती है। प्रेम शब्द बोलना आसान है उसे करना इतना आसान नहीं है। चाहत के वशिभूत होकर व्यक्ति आज वासना के घिनौने कृत्य को पवित्र प्रेम का नाम देता है यह समाज में उत्पन्न विकृति का परिणाम है। श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रेम का इतना सुंदर वर्णन किया है जिसमें भगवान को अपनी ही श्रृष्टि के नियम तक बदलने की बात कही गई है।

“प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा। उनका मान भले टल जाए, भक्त का मान न टलते देखा”।

यह बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण पंक्ति है, जो भक्त और भगवान के अटूट प्रेम को दर्शाती है। जब भक्त अपने आराध्य से निश्छल और प्रबल प्रेम करता है, तो भगवान भी अपने नियम और मर्यादाओं को तोड़कर भक्त की रक्षा करने और उसके प्रेम का मान रखने दौड़े चले आते हैं। श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि धैर्य, विश्वास और निस्वार्थ समर्पण का निरंतर अभ्यास है प्रेम। जब प्रभु से प्रेम हो जाता है तो शब्द शून्य हो जाते हैं। फिर जड़ और चेतन का भेद समाप्त होकर समुचा जगत ही प्रेमातुर अर्थात ईश्वरमय नजर आता है। ईश्वर प्रेमानंद है और प्रेमानंद ही ईश्वर।

28 Views
What do you think?

Leave a Reply