राज-काज

 दिनेश निगम ‘त्यागी
नरोत्तम के लिए संजीवनी बन सकता सीजेपी आंदोलन….
– दतिया विधानसभा सीट के उप चुनाव में इस बार मुकाबला बराबरी का दिख रहा था। किसकी जीत होगी और किसकी हार, अभी भी तय नहीं है। अलबत्ता, नतीजे से प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रतिष्ठा जुड़ी है। वजह है पूरी तैयारी के बावजूद उन्हें भाजपा का टिकट न मिलना और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव द्वारा पार्टी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को जिताने की जवाबदारी उनके कंधों पर ही डाल देना। दतिया की जीत-हार से नरोत्तम की प्रतिष्ठा इसलिए जुड़ गई,  क्योंकि उन्हें टिकट न मिलने के कारण उनके समर्थकों ने दतिया में बड़ा उपद्रव मचाया। हाइवे जाम किया, पत्थरबाजी, लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले छूटे और जिले के भाजपा पदाधिकारियों, पार्षदों ने इस्तीफे सौंप दिए। नरोत्तम ने बाद में कहा कि वे नाराज नहीं है। उन्होंने दावा किया कि नाराज समर्थकों को मनाकर काम पर लगा दिया गया है, पर चर्चा यही है कि नाराज भाजपाई पार्टी प्रत्याशी के लिए काम नहीं करेंगे। भाजपा के हारने पर ठीकरा नरोत्तम के सिर फूटना तय था लेकिन दिल्ली का छात्र आंदोलन नरोत्तम के लिए संजीवनी का काम कर सकता है। भाजपा हारी तो ठीकरा नरोत्तम से ज्यादा इस आंदोलन के सिर फूटेगा। कहा जाएगा कि युवा और छात्र इतने नाराज हैं कि उन्होंने खुद भाजपा को वोट नहीें दिया और परिवार वालों को भी नहीं देने दिया। इस तरह नरोत्तम खुद को बचा सकते हैं।
सीजेपी आंदोलन ने दतिया में भाजपा को चिंता में डाला….!
– केंद्रीय मंत्री धमेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकारोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनरतले चल रहे छात्र आंदोलन समाप्त हो गया है। इससे केंद्र सरकार ने राहत की सांस ली है। बावजूद इसके छात्र आंदोलन के देश भर में बढ़ते असर ने दतिया विधानसभा सीट के उप चुनाव में प्रदेश भाजपा को चिंतित कर रखा है। भाजपा के नेता पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलने के कारण उनके समर्थकों की नाराजगी को किसी तरह दूर करने में जुटे थे, इस बीच सीजेपी के आंदोलन ने नई मुसीबत खड़ी कर दी। छात्र आंदोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। इसका मप्र में भी खास असर दिखाई पड़ा। इंदौर, भोपाल सहित कई शहरों में छात्र बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरे। बड़ी संख्या में युवा दिल्ली प्रदर्शन में शामिल होने भी पहुंचे। जो युवा सड़कों पर नहीं भी उतरें, वे भावनात्मक तौर इस आंदोलन से खुद को जोड़ते दिखाई पड़े। प्रदेश भाजपा को इस संकट का अहसास है। इसे ध्यान में रख कर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने रणनीति बनाई है। अब जब प्रचार के लिए 2 दिन का समय ही शेष है। सरकार के मंत्रियों, विधायकों और प्रमुख नेताओं की फौज क्षेत्र में उतार दी गई है। भाजपा की कोशिश है कि दतिया के उप चुनाव पर छात्र आंदोलन का असर न पड़े और पार्टी सम्मानजनक जीत दर्ज करे।
सिंधिया के रहते टिक पाएगी दिग्विजय की भविष्यवाणी….!
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह राजनीतिक शगूफेबाजी के लिए जाने जाते हैं। वे यह भी कहते हैं कि मैं जो बोलता हूं, वह सच होता है। इंदौर एयरपोर्ट में अचानक मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और दिग्विजय आमने-सामने हुए। 15-20 मिनट दोनों में चर्चा हुई तो दिग्विजय ने उनके सामने ही एक भविष्यवाणी कर दी। मौके पर मौजूद भाजपा नेता सावन सोनकर को देख कर उन्होंने कह दिया कि सांवेर से इस बार तुलसी सिलावट का टिकट कट रहा है, इसलिए इस सीट से तैयारी कर लो। सावन के लिए यह मुंह मांगी मुराद जैसी है लेकिन सवाल है क्या ऐसा हो पाएगा? सिलावट केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास समर्थक हैं। वे प्राथमिकता पर जो 3-4 टिकट मांगते हैं, उनमें एक तुलसी सिलावट का होता है। सिंधिया के रहते सिलावट का टिकट कटने के बारे में कोई सोचता भी नहीं, फिर भी दिग्विजय ने भविष्यवाणी कर दी, वह भी मुख्यमंत्री के सामने। दिग्विजय का कहा कैसे सच होगा, यह वे ही बता सकते हैं। हालांकि भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा फर्क है। भाजपा नरोत्तम मिश्रा जैसे कद्दावर नेता का भी टिकट काट देती है। सिंधिया जिस तरह कांग्रेस के टिकट दिलाते थे, वह स्थिति भाजपा में नहीं रहने वाली। कांग्रेस छोड़ कर उनके साथ भाजपा में आए कई विधायक घर बैठ चुके हैं। वैसे भी भाजपा नेतृत्व चौंकाने के लिए चर्चित है।
लोकतंत्र के मंदिर में बिना चर्चा बन गए 15 कानून….
विधानसभा का पांच दिन का छोटा मानसून सत्र, वह भी मात्र 3 दिन में समाप्त। इतना ही नहीं लोकतंत्र के इस मंदिर में 15 विधेयकों को पारित कर कानून बनाया गया लेकिन किसी पर भी चर्चा नहीं हुई। सभी को ध्वनिमत से हंगामें के बीच पारित कर दिया गया। भला ऐसे कानूनों का क्या औचित्य जिन पर कोई बहस ही न हुई हो। लोकसभा हो या विधानसभा, इसकी सार्थकता चर्चा में ही है। दरअसल, विधानसभा का यह मानसून सत्र कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन और दतिया विधानसभा सीट के उप चुनाव की भेंट चढ़ गया। विपक्ष ने हर रोज छात्र आंदोलन पर चर्चा को लेकर हंगामा किया, जिसे स्पीकर और सत्तापक्ष ने स्वीकार नहीं किया। लिहाजा, जनहित से जुड़े मुद्दों और विधेयकों पर सदन के अंदर जो सार्थक चर्चा होना चाहिए थी, नहीं हो सकी। दूसरा, दतिया विधानसभा सीट का उप चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों की साख और प्रतिष्ठा से जुड़ा है। दोनों दलों के नेताओं को प्रचार में जाने की जल्दी थी। इसकी वजह से सत्र को 3 दिन में ही समाप्त कर दिया। 3 दिन की मजबूरी इसलिए भी थी क्योंकि इससे कम सदन चलने पर विधायकों को वेतन-भत्ते का नुकसान हो जाता। बहरहाल, इस मानसून सत्र में सरकारी काम तो सब हो गया लेकिन चर्चा के लिहाज से यह औपचारिकता मात्र बन कर रह गया।
पूरा हो पाएगा कांग्रेस नेतृत्व द्वारा अवधेश से किया वादा….!
विधानसभा के पिछले चुनाव से पहले भाजपा छोड़ कर आए अवधेश नायक को कांग्रेस नेतृत्व से फिर आश्वासन मिला है। वैसा ही वादा किया गया है जैसा 2023 में उनका टिकट काट कर किया गया था। कांग्रेस नेतृत्व द्वारा किए गए वादे के बाद उन्होंने दतिया में कांग्रेस को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। पिछले चुनाव में भी उन्होंने ऐसा ही किया था। कांग्रेस के राजेंद्र भारती चुनाव जीते भी थे, पर किया गया वादा पूरा नहीं हुआ। अवधेश खुद बता चुके हैं कि तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रदेश प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने उनसे कहा था कि आप कांग्रेस को जिताइए, अगली बार आपको ही कांग्रेस का टिकट मिलेगा। पर न कमलनाथ टिकट दिलाने की स्थिति में हैं, न ही सुरजेवाला प्रदेश प्रभारी। अब प्रदेश कांग्रेस की कमान जीतू पटवारी के पास हैं और प्रदेश प्रभारी हैं हरीश चौधरी। अवधेश को इनसे अगली बार कांग्रेेस टिकट का आश्वासन मिला। नायक समझ चुके हैं कि अगले चुनाव तक कांग्रेस में ये दोनों ताकतवर रहेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं। विधानसभा चुनाव तक नेतृत्व बदल भी सकता है। खबर है, इसीलिए जीतू ने अवधेश की सीधे राहुल गांधी से बात कराई और उनका आश्वासन मिलने के बाद वे चुनाव प्रचार में जुटे हैं। यह वादा पूरा होता है या नहीं, 2028 के विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना होगा।

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