क्या धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से समस्या हल हो गई?
देश की राजधानी दिल्ली में पिछले ३५ दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन आज केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही समाप्त हो गया। धरना स्थल जंतर-मंतर पर जश्न का माहौल देखने को मिला। बेशक जश्न होना भी चाहिए। चूंकि यह छात्र-छात्राओं के भविष्य से जुड़ा विषय है और इसको लेकर किए जा रहे आंदोलन के आगे सरकार झुकी तो निश्चित ही यह आंदोलनकारियों के लिए एक उत्साहजनक सफलता का कारक हो सकता है। लेकिन क्या एक मंत्री का इस्तीफा देने से इस राष्ट्रव्यापी समस्या का समाधान हो गया? एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री द्वारा इसके लिए कठोर कानून बनाने तथा फास्टट्रेक कोर्ट के माध्यम से त्वरित सुनवाई करने की बात कही गई। नीट पेपर लीक में संलिप्त दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ४७ अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया गया। सरकार द्वारा विषय की गंभीरता को देखते हुए सदन में चर्चा के द्वार खोल दिए गए। लेकिन यह सब आंदोलनकारियों और आंदोलन को श्रेय देने वाले सत्ता में विपक्ष की भूमिका निर्वाह करते राजनीतिक दलों को रास नहीं आया। हो सकता है आंदोलनकारी सरकार की बातों को मान कर तथा प्रसिद्ध शिक्षाविद्, जलवायु कार्यकर्ता इनोवेटर सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने पश्चात अपना धरना आंदोलन भी समाप्त कर देते। लेकिन जो राजनीतिक दल इस आंदोलन के माध्यम से अपना भविष्य और जमीन तलाश रहे थे उन्हें यह स्वीकार नहीं था। आखिर अगले ही वर्ष २०२७ में उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणीपुर में विधानसभा के चुनाव होना है जिसमें यह युवा शक्ति उनके लिए अच्छा खासा वोट बैंक बनकर उभर सकती है। वैसे भी तमाम विपक्ष मिलकर पिछले १२ वर्षों में ऐसा कोई राष्ट्रव्यापी मुद्दा लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए, जो अंगद के पैर की तरह सरकार को चुनौती देते नजर आए। यह आंदोलन भी किसी विपक्षी दल द्वारा उठाए गए मुद्दे को लेकर नहीं था बल्कि पिछले कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया के माध्यम से उत्पन्न हुए काकरोच जनता पार्टी के स्वयंभू संस्थापक बने अभिजीत दीपके द्वारा देश के छात्रों को प्रेरित कर चलाया गया आंदोलन था। चूंकि विषय सभी युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है इसलिए जंगल की आग की तरह इस आंदोलन की चिंगारी न केवल दिल्ली के जंतर-मंतर पर बल्कि देश के कोने-कोने में धधकती नजर आने लगी। मौके को भांपते हुए लम्बे समय से सत्ता सुंदरी के सपने देखने वाली कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और आप जैसे राजनीतिक दलों ने ‘मान न मान मैं तेरा मेहमानÓ की कहावत को चरितार्थ करते हुए इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन दे दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और सांसद डिम्पल यादव तो इस आंदोलन में इतने सक्रिय नजर आने लगे जैसे वह इस आंदोलन के माध्यम से केन्द्र सरकार को सत्ता से बेदखल कर देंगे और यूपी चुनाव में फतह हासिल कर लेंगे। इस आंदोलन को सर्वाधिक प्राणवायु प्रदान करने का कार्य सोनम वांगचुक का अनशन कर रहा था। सरकार भी इसे गंभीरता से ले रही थी। जिसके चलते सरकार ने न केवल आंदोलनकारियों तथा उन्हें समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों के साथ कई दौर की चर्चाएं की, जो बेनतीजा साबित हुई। विपक्षी दलों ने पहले संसद में चर्चा की मांग उठाई, सरकार ने उसे स्वीकारते हुए चर्चा के लिए आमंत्रित किया। लेकिन विपक्ष को चर्चा नहीं हंगामा खड़ा कर देश में अपनी सक्रियता और युवाओं के प्रति अपना कथित समर्पित प्रेम प्रदर्शित करना ज्यादा रास आ रहा था। जब सरकार ने संसद में चर्चा के लिए द्वार खोल दिए तो विपक्ष ने मुद्दे को हवा देते हुए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को प्राथमिकता दी। इस सबके चलते हुए मानसून सत्र का प्रथम सप्ताह विपक्षी दलों के भारी हंगामे के कारण चार दिनों तक पूरी तरह बाधित रहा। यहां उल्लेखनीय यह है कि संसद में विपक्ष चर्चा के लिए तैयार नहीं हुआ बल्कि प्रतिदिन संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए विरोध प्रदर्शन कर बार-बार संसदीय कार्रवाई को स्थगित कराने का कार्य कराता रहा। इससे विपक्षी सांसदों का राजनीतिक हितलाभ तो सध ही रहा था, साथ ही संसद सत्र के दौरान मिलने वाले तमाम आर्थिक लाभ भी बकायदा प्राप्त हो रहे थे। गौरतलब है कि भारतीय संसद की प्रतिदिन कार्रवाई पर लगभग ९ करोड़ रूपया अर्थात् प्रति मिनट ढाई लाख का खर्च आता है। यह खर्च इन राजनीतिक दलों के कोष से नहीं बल्कि जनता के टेक्स से वहन किया जाता है। हंगामा खड़ा कर जिस धन का दुरुपयोग यह राजनीतिक दल कर रहे थे वह इस दौरान अपने वेतन भत्ते का त्याग नहीं कर रहे थे बल्कि वह तो उन्हें मिलना तय ही है। चूंकि वह नियमित संसद भी तो जा रहे थे। ऐसी स्थिति में क्या जनता को यह सवाल खड़े नहीं करना चाहिए कि जब आप संसद नहीं चलने दे रहे तो आपको मुफ्त में वेतन भत्ते लेने का क्या हक है? संसद विचार विमर्श के लिए होती है, समस्या के समाधान और उसके लिए कठोर कानून तथा नीति बनाने के लिए होती है। जनता ने आपको निर्वाचित करके भी वहां इसीलिए भेजा है ताकि आप वहां बैठकर समस्याओं पर चर्चा करें और उसका समाधान निकाले। क्या आपके द्वारा ऐसा किया जा रहा था? क्या केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से इस राष्ट्रव्यापी नीट पेपर लीक समस्या का समाधान हो गया? क्या ३५ दिनों तक चले छात्र आंदोलन से लगभग ३६ करोड़ रुपए संसद की कार्रवाई पर हुए खर्च और आंदोलन के दौरान सार्वजनिक एवं निजी सम्पत्ति को पहुंचे करोड़ों रुपए की भरपाई इस इस्तीफे से हो गई? क्या देश की जनता आपकी इस सारी नौटंकी और युवाओं के प्रति निकाले जाने वाले मगरमच्छी आंसुओं की हकीकत को नहीं जानती? टीवी, कैमरों के सामने धरना स्थल पर आपकी नौटंकियों को जनता मनोरंजन के तौर पर देख रही थी? विपक्ष के रुप में ही सही जनता ने आपको निर्वाचित तो किया है? तो क्या जनता द्वारा किया गया यह निर्वाचन आपको इस तरह की नौटंकी के लिए पांच साल का ठेका दिया जाना है? जनता को यह सब पूछने का हक है। वास्तव में तो यह आंदोलन ही आप लोगों के द्वारा शुरु नहीं किया गया था, आप तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला की तर्ज पर वहां नांच कूद रहे थे। हैरत की बात तो यह है कि आंदोलन छात्रों ने किया, मांग सरकार ने मानी, इस्तीफा शिक्षा मंत्री ने दिया और अब कैंडल मार्च को परिवर्तित कर विजय मार्च कांग्रेस निकाल रही है। यह कांग्रेस की कौन सी विजयपताका का जश्न है जिसे कांग्रेस विजय मार्च के रुप में प्रदर्शित करने जा रही है। सच तो यह भी है कि कांग्रेस और तमाम विपक्षी दल यह भली भांति जानते है कि अगर वह संसद में चर्चा के लिए तैयार हो जाते तो जनता के बीच कैमरे पर उन्हें कहने सुनने के लिए ऐसे कोई मुद्दे नहीं मिलते जिससे वह चर्चा का विषय बन पाए। उनके समर्थक कार्यकर्ता देश भर में उनकी गिरफ्तारी को लेकर नाटक नौटंकी भी नहीं कर पाते। हो सकता है सदन में चर्चा के दौरान सरकार विपक्ष के मुद्दों की हवा निकालकर उन्हें बगले झांकने पर मजबूर कर देती। निश्चित ही ३६ दिनों तक चले इस छात्र आंदोलन ने सरकार को सोचने पर और आत्मअवलोकन करने पर मजबूर किया है। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तथा आंदोलनकारियों की अधिकांश मांगों को स्वीकार करना, आंदोलन के पश्चात ४७ कर्मचारियों को बर्खास्त करना, प्रधानमंत्री द्वारा सख्त कानून बनाने तथा फास्टट्रेक के माध्यम से सुनवाई करने की बात करना यह सब सरकार की सजगता और सफलता को प्रदर्शित नहीं करता। बल्कि अगर यह कदम सरकार आंदोलन से पहले या आंदोलन के शुरुआत चरण में ही उठा लेती तो ना यह आंदोलन इतना उग्र रुप लेता और ना ही विपक्ष को यह मुद्दा मिल पाता। अभी तो न सरकार जीती, न विपक्ष जीता और न ही प्रदर्शनकारी छात्रों की समस्या का कोई स्थायी समाधान हुआ, बस हुआ तो जनता के पैसों और सदन के महत्वपूर्ण समय का दुरूपयोग अवश्य हुआ है। हां इस आंदोलन से यह तो स्पष्ट हो गया है कि अब देश की जनता दासी या बेचारी नहीं रही बल्कि वह अपने हक की लड़ाई लड़ने का माद्दा रखने वाली हो गई है। वह धृष्टराज भी नहीं है और ना ही सत्ता सिंहासन पर बैठे धृष्टराजों को स्वीकार करने वाली है।





