16 दिनों तक गोबर से बनाई जा रहीं पारंपरिक आकृतियां
-अमावस्या को होगा पर्व का समापन
अनोखा तीर, हरदा। बदलते दौर में जहां कई पारंपरिक लोक पर्व धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं, वहीं शहर की बालिकाएं सदियों पुरानी सांझा पर्व की परंपरा को जीवंत रखने का प्रयास कर रही हैं। सोलह श्राद्ध यानी कड़े दिनों में मनाया जाने वाला यह पर्व मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल में विशेष रूप से प्रचलित है। इसे संजा माई या सांझा पर्व के नाम से जाना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित माना जाता है। पर्व के दौरान कुंवारी कन्याएं लगातार 16 दिनों तक घरों के बाहर गोबर से अलग-अलग पारंपरिक आकृतियां बनाकर उन्हें सजाती हैं। इसके साथ ही प्रतिदिन बालिकाएं सामूहिक रूप से पारंपरिक सांझा गीतों का गायन करती हैं। पर्व के दौरान शुरुआती पांच दिनों तक पांच गोले बनाए जाते हैं। इसके बाद छपरी, सात्या, हात्या, मोर, डोकरा-डोकरी, कोवा और कोट सहित विभिन्न आकृतियां बनाई जाती हैं। कोट के दिन पूर्व में बनाई गई आकृतियों को भी एक साथ सजाया जाता है। खेड़ीपुरा निवासी भूमि मौर्य ने बताया कि सांझा पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। मोहल्ले की सभी बालिकाएं एकत्रित होकर पारंपरिक सांझा गीत गाती हैं और पूरे उत्साह के साथ पर्व मनाती हैं। उनका कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में मदद मिलती है। इस अवसर पर भूमि मौर्य, भारती सिंगनाथ, नैना मौर्य, चुनचुन मौर्य, कंचन मौर्य, भावना शारदे, दुर्गा शारदे, गोला नायडे, दीप्ति सिंगनाथ, जानवी सावनेर, भारती शारदे सहित अन्य महिलाएं एवं बालिकाएं मौजूद रहीं। सांझा पर्व का समापन अमावस्या के दिन पारंपरिक रूप से किया जाएगा।







