आयुष्मान का सात माह से नहीं मिला भुगतान, कैसे करें इलाज

 
अनोखा तीर, भोपाल। प्रदेशभर के निजी अस्पतालों, चिकित्सकों एवं चिकित्सा संगठनों की संयुक्त प्रदेश स्तरीय बैठक में आयुष्मान भारत योजना के लंबित भुगतान, एनएबीएच की अनिवार्यता, अस्पतालों पर बढ़ते प्रशासनिक दबाव, डॉक्टरों एवं स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सहित स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गई। बैठक में संगठनों ने स्पष्ट किया कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध कार्रवाई चाहिए। हरदा जिले में जिन प्राईवेट चिकित्सालय में आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का उपचार किया जा रहा है, उन पर भी भुगतान एवं नियमों की मार पड़ रही है। इसके लिए 8 अक्टूबर से सभी प्राईवेट चिकित्सा संस्थान आयुष्मान मरीजों का उपचार नहीं करेंगे। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए अस्पताल संचालकों, चिकित्सकों एवं संगठनों के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रदेश के अनेक अस्पतालों के भुगतान सात माह से अधिक समय से लंबित हैं। अस्पताल मरीजों का उपचार करने के साथ दवाइयां, जांच और ऑपरेशन की सुविधाएं उपलब्ध करा चुके हैं तथा डॉक्टरों एवं कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य खर्च भी वहन कर चुके हैं। संगठनों ने मांग की कि वर्तमान पोर्टल, पुराने पोर्टल, सीपीडी द्वारा रिजेक्ट किए गए तथा अन्य कारणों से लंबित सभी पात्र एवं वैध क्लेम का तत्काल परीक्षण कर निर्धारित समय-सीमा में भुगतान किया जाए। उन्होंने कहा कि वास्तविक मरीज का वास्तविक उपचार होने के बाद केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक आपत्तियों के आधार पर वैध भुगतान रोकना स्वीकार्य नहीं होगा। भविष्य में आयुष्मान भुगतान एमओयू के अनुसार निर्धारित समय-सीमा में किया जाए तथा अनावश्यक विलंब की स्थिति में जवाबदेही तय की जाए।
एनएबीएच की अनिवार्यता का विरोध
संयुक्त संगठनों ने एनएबीएच एक्रेडिटेशन को अनिवार्य किए जाने का विरोध किया। संगठनों ने कहा कि अस्पतालों में गुणवत्ता एवं पेशेंट सेफ्टी सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन गुणवत्ता के नाम पर ऐसी अनिवार्य व्यवस्था नहीं थोपी जानी चाहिए, जो छोटे, मध्यम और संसाधन सीमित अस्पतालों के लिए व्यावहारिक रूप से कठिन हो। उन्होंने एनएबीएच को स्वैच्छिक एवं इंसेंटिव-बेस्ड व्यवस्था के रूप में रखने तथा अस्पताल की बेड क्षमता, श्रेणी, संसाधन, भौगोलिक स्थिति एवं स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक मानक निर्धारित करने की मांग की।
सिंगल विंडो सिस्टम लागू करने की मांग
अस्पताल संचालकों ने विभिन्न विभागों से अलग-अलग लाइसेंस, अनुमति एवं नवीनीकरण की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने अस्पतालों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू करने की मांग की, ताकि एक ही प्रक्रिया के माध्यम से आवश्यक अनुमतियां एवं लाइसेंस संबंधी कार्य पूरे हो सकें। अस्पतालों को अनावश्यक कागजी कार्रवाई और विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत देने की मांग की गई।
कार्रवाई से पहले सुनवाई का अधिकार
संगठनों ने मांग की कि किसी अस्पताल का पंजीयन निलंबित या निरस्त करने, अस्पताल बंद कराने अथवा किसी गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई से पहले अस्पताल प्रबंधन को पर्याप्त नोटिस, अपना पक्ष रखने का अवसर, निष्पक्ष सुनवाई तथा कारणयुक्त आदेश दिया जाए। प्रशासनिक कार्रवाई प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप किए जाने की मांग की गई।
डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग
बैठक में डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, स्वास्थ्यकर्मियों एवं अस्पतालों के विरुद्ध हिंसा, धमकी, तोड़फोड़ और इंटीमिडेशन की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई। संगठनों ने डॉक्टर्स प्रोटेक्शन एक्ट सहित मौजूदा कानूनी प्रावधानों का प्रभावी और त्वरित क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी भय के माहौल में काम नहीं कर सकते। अस्पतालों में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रभावी रूप से सुनिश्चित की जानी चाहिए।
जमीनी परिस्थितियों के अनुरूप नियम बनाने की मांग
संगठनों ने कहा कि डॉक्टरों, विशेषज्ञों, नर्सिंग स्टाफ एवं अन्य हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की वास्तविक उपलब्धता को ध्यान में रखे बिना बनाए गए अव्यावहारिक नियम स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। मानव संसाधन की वास्तविक उपलब्धता, अस्पताल की क्षमता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक नियम बनाने की मांग की गई।
सरकारी डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेज फैकल्टी के मुद्दे भी उठे
बैठक में सरकारी चिकित्सकों एवं मेडिकल कॉलेज फैकल्टी से संबंधित रिक्त पदों, अत्यधिक कार्यभार, पदोन्नति, स्थानांतरण, वर्कप्लेस सेफ्टी, सेवा शर्तों तथा अनावश्यक नॉन-क्लिनिकल ड्यूटी जैसे मुद्दों पर भी तत्काल कार्रवाई की मांग की गई। संगठनों ने कहा कि डॉक्टरों को उनके मूल चिकित्सकीय दायित्वों से हटाकर अनावश्यक प्रशासनिक एवं गैर-चिकित्सकीय कार्यों में लगाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नीति निर्माण में डॉक्टरों से संवाद की मांग
बैठक में मांग की गई कि डॉक्टरों और अस्पतालों को प्रभावित करने वाली किसी भी बड़ी स्वास्थ्य नीति, योजना या रेगुलेटरी चेंज को लागू करने से पहले चिकित्सा एवं अस्पताल संगठनों के प्रतिनिधियों से अनिवार्य रूप से संवाद किया जाए। संगठनों ने कहा कि मरीजों का इलाज करने वाले चिकित्सकों और अस्पताल संचालकों की जमीनी समस्याओं एवं अनुभवों को नीति निर्माण में शामिल किया जाना आवश्यक है। संयुक्त बैठक में संगठनों ने कहा कि आयुष्मान के सात माह से अधिक लंबित वैध भुगतान, सीपीडी द्वारा रिजेक्ट किए गए पात्र क्लेम का निपटारा, नैबएच की अनिवार्यता समाप्त करना, सिंगल विंडो सिस्टम लागू करना तथा डॉक्टरों एवं अस्पतालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने सहित सभी मुद्दों पर स्पष्ट और समयबद्ध निर्णय लिया जाना चाहिए। संगठनों ने कहा कि प्रदेश के चिकित्सकों और अस्पतालों के हितों से जुड़े इन मुद्दों पर सभी संगठन एकजुट होकर सामूहिक कार्ययोजना तैयार करेंगे और शासन के समक्ष अपनी मांगों को मजबूती से रखेंगे।

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