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Friday, 6 November 2026
हरदा

सत्य के मार्ग पर चलना ही आत्मकल्याण का पथ

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-उत्तम सत्य धर्म का कराया महत्व बोध

अनोखा तीर, हरदा। आत्मा की साधना और आत्मशुद्धि के महापर्व पर्वराज पर्युषण के अंतर्गत रविवार को दिगंबर जैन समाज द्वारा दशलक्षण पर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में समाज के श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस अवसर पर ऊं अर्हम ध्यान योग प्रशिक्षिका अनिता दीदी ने मुनिश्री प्रणम्य सागर जी महाराज के डिजिटल संस्करण के माध्यम से उत्तम सत्य धर्म का जीवन में महत्व एवं उसके प्रभाव को समझाया। उन्होंने कहा कि क्रोध, लोभ, भय तथा हंसी-मजाक आदि के कारण मनुष्य असत्य का सहारा लेता है, जबकि सत्य धर्म का वास्तविक स्वरूप यही है कि न तो झूठ बोला जाए और न ही झूठा व्यवहार किया जाए। सत्य का आचरण लोकहित और आत्मकल्याण का साधक है। उन्होंने कहा कि सत्य को शब्दों के आडंबर से सजाने की आवश्यकता नहीं होती। जो देखता है वह कहता नहीं, जो कहता है वह दिखता नहीं, जहां कहने और देखने का अंतर समाप्त हो जाए, वहीं उत्तम सत्य है। साथ ही अनेकांत और स्याद्वाद की महिमा को समझते हुए भगवान महावीर के सिद्धांतों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। संध्याकाल में आरती के पश्चात समाजजनों द्वारा 48 दीपों के साथ भक्तामर स्तोत्र का सामूहिक पाठ किया गया। पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन होने वाले धार्मिक आयोजनों में समाज के श्रद्धालु पूरे उत्साह, मनोयोग और भक्तिभाव के साथ सहभागी हो रहे हैं। समाज अध्यक्ष सुरेंद्र जैन ने बताया कि उत्तम सत्य दिवस पर समाज के बच्चों ने आगे बढ़कर धार्मिक बोलियां लेकर पुण्यार्जन का सौभाग्य प्राप्त किया। उन्होंने बच्चों में दिए जा रहे संस्कारों के लिए उनके परिजनों के पुण्य की अनुमोदना की।
बच्चों के लिए समाज की विशेष पहल
दिगंबर जैन समाज ट्रस्ट द्वारा बच्चों को धार्मिक गतिविधियों से जोड़ने के उद्देश्य से विशेष घोषणा की गई। इसके तहत 8 से 15 वर्ष आयु के जो बच्चे अगले पांच दिनों तक लगातार अभिषेक में शामिल होंगे, उन्हें मुक्तागिरी तीर्थ दर्शन के लिए ले जाया जाएगा। जिन बच्चों की परीक्षा होगी, उन्हें उस दिन की छूट दी जाएगी। अभिषेक में शामिल होने वाले बच्चों के लिए बोली लेना अनिवार्य नहीं रखा गया है। समाज की इस पहल से बच्चों में धार्मिक संस्कारों, नियमितता और भगवान के प्रति भक्ति की भावना को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।

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