– घायल ग्रामीण को 1 किमी तक पैदल लेकर चले ग्रामीण
अनोखा तीर, हरदा। जिले के ग्राम चुरनि से स्वास्थ्य और सडक़ व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है। गांव तक सडक़ नहीं होने के कारण पेड़ से गिरकर घायल हुए ग्रामीण को अस्पताल पहुंचाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को रात के अंधेरे में करीब एक किलोमीटर तक खाट पर लिटाकर पैदल चलना पड़ा। इसके बाद ट्रैक्टर-ट्रॉली से घायल को सिराली ले जाया गया, जहां से एंबुलेंस के जरिए हरदा जिला अस्पताल पहुंचाया गया। घटना ने गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं और सडक़ सुविधा पहुंचाने के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार ग्राम चुरनि निवासी मनराम मक्का की फसल को बंदरों से बचाने के लिए पेड़ पर चढ़े थे। इसी दौरान उनका पैर फिसल गया और वे नीचे गिरकर घायल हो गए। हादसे के बाद ग्रामीणों ने तत्काल 108 एंबुलेंस को सूचना दी, लेकिन गांव तक सडक़ नहीं होने के कारण एंबुलेंस के पहुंचने में परेशानी हुई। ऐसे में घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने खाट को ही सहारा बनाया। मनराम को खाट पर लिटाकर ग्रामीण करीब एक किलोमीटर तक पैदल चले। इसके बाद ट्रैक्टर-ट्रॉली की मदद से उन्हें सिराली पहुंचाया गया। वहां से एंबुलेंस के माध्यम से हरदा जिला अस्पताल लाया गया, जहां उनका उपचार जारी है।
गर्भवती महिलाओं के लिए भी बनी चुनौती
ग्रामीणों का कहना है कि चुरनि में सडक़ की समस्या केवल आपातकालीन चिकित्सा तक सीमित नहीं है। गांव तक पक्की सडक़ नहीं होने से गंभीर मरीजों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा पाता और गांव में ही प्रसव की स्थिति बन जाती है।
सवाल यह कि जिम्मेदारी किसकी?
एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और सुगम आवागमन उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं, वहीं चुरनि की तस्वीर सवाल खड़ा करती है कि अगर आपात स्थिति में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकती तो ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य सुविधा कितनी सुलभ है? सडक़ के अभाव में घायल को खाट पर एक किमी. तक ले जाने की मजबूरी व्यवस्था की जमीनी स्थिति बयां कर रही है।
मामले में सीएमएचओ ने बताया कि 108 एंबुलेंस का संचालन भोपाल से होता है। हालांकि उन्होंने चुरनि गांव के मामले को दिखवाने की बात कही है। इधर ग्रामीणों ने गांव तक सडक़ निर्माण की मांग की है, ताकि भविष्य में किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए खाट, ट्रैक्टर-ट्रॉली या अन्य वैकल्पिक साधनों का सहारा न लेना पड़े।







