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Friday, 23 October 2026
हरदा

भोलेनाथ का धवला नादिया कौन बांधे छोड़े रे….

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-शिव कालोनी में लड़ाएं डंडे, लोक परंपरा को सहेजने की कवायद
अनोखा तीर, हरदा। आधुनिकता के इस दौर में हमारी अनेक पारंपरिक लोक परंपराएं आज प्राय विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी है। ऐसी स्थिति में हमारे ग्रामीण अंचलों तथा ग्रामीण परिवेश में रचे-बसे कुछ ही लोग अब इस विदा होती पीढ़ी में शेष है, जो आज भी इन लोकगीतों और लोक परंपराओं को सहेजने की कवायद कर रहे हैं। इन्हीं विलुप्त होती परंपराओं में सावन माह में डंडे लड़ाकर भजन प्रस्तुति के साथ लोक नृत्य की भी एक विधा है। मूल रूप से यह भगवान भोलेनाथ को समर्पित शिव भक्ति और उपासना के साथ ही भगवत लीलाओं का लोकभाषा में सुंदर वर्णन के साथ डंडे लड़ाते हुए अपनी भाव अभिव्यक्ति का उत्सव होता है। निमाड़ और भूआणा (हरदा क्षेत्र) में इसका काफी प्रचलन रहा है। कभी सावन मास के शुरू होते ही गांव गांव में जहां महिला मंडलों द्वारा स्थानीय मंदिरों में रामसत्ता का आयोजन किया जाता था तो वहीं गांव के बाहर अथवा खलिहानों में बरगद तथा नीम के पेड़ों में रस्सी के झूले बांधे जाते थे। जिन पर गांव की बहूं बेटियां झूलती नजर आती थी। इसी तरह पुरुष वर्ग द्वारा डंडा लड़ाने तथा आल्हा उदल पढ़ने एवं संगीतमय रामायण पाठ जैसे आयोजन आम बात हुआ करती थी। किन्तु समय के साथ साथ आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी यह सभी लोक परंपराएं प्राय विलुप्त होती जा रही है। भाई-चारे के साथ सामूहिक उल्लास तथा उत्सवप्रियता के प्रतीक हमारे पारंपरिक आयोजन अब किस्से कहानियों में अथवा पुरानी पीढ़ी के कुछ लोगों तक ही सिमट कर रह गए हैं। गत दिवस हरदा की शिव कालोनी में बालागांव निवासी दयाराम भाटी तथा उनकी मित्र मंडली द्वारा डंडा लड़ाने का आयोजन रखा गया। कमर में ढोलक बांधकर डंडा लड़ाने वालों के साथ साथ ढोलक बजाकर उनके सुर में सुर मिलाते हुए ढोलक की थाप देते हुए लोकनृत्य की प्रस्तुति तथा शेष लोगों द्वारा हाथ में लकड़ी के डंडे लेकर एक दूसरे से डंडे लड़ाते हुए भावभक्ति पूर्ण लोकभाषा के भजनों की प्रस्तुति एक अलग ही भक्ति की विधा को प्रदर्शित करती है। आयोजन में सबसे पहले भगवान श्रीगणेश एवं मां सरस्वती की वंदना अपने अनूठे अंदाज में की जाती है। झूला पे झूले गजानन झूला पर झूले…. कुण थारी माता रे कुण थारा पिता किनहरी नाम धरायो गजानन, किनहरी नाम धरायो…।? भोलेनाथ का धवला नादिया कौन बांधे छोड़े रे…. नाचना में कायकी शरम लागे रे नाचना में…. मोरे पिया बिना जिया लगत नहीं है मोरी बाली उमरिया कटत नहीं है…म्हारो राम गयो वनवास चंदा छुप जा रे बादल म, म्हारो राम गयो… जैसे अनेक मनभावन तथा कर्णप्रिय भजनों की प्रस्तुति के साथ देर रात तक यह आयोजन चलता रहा। जिसमें नौकरी पेशा और व्यापार तथा मजदूरी करने वाले सभी तरह के लोगों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। आयोजन के सूत्रधार दयाराम भाटी की पहल पर शिक्षा विभाग के शिक्षक रविशंकर उधारे, सुखराम झिझोरे, दिनेश सोमानी, वहीं पुलिस विभाग से रमेश शर्मा, महेश शर्मा सहित विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले रामकृष्ण चौरे, रामचरण चौरे, रामसेवक कवड़़े , गुलाबचंद गुल्लू, अमरदास, ढोलक मास्टर हरिप्रसाद हुरमाले पोखरनी, तेजराम काजवे, हुकुमचंद दुधे, जगदीश प्रसाद चावड़ा आदि ने अपनी सामूहिक मनभावन प्रस्तुति देते हुए इस विलुप्त होती प्रथा को सहेजने की कवायद की।

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