-मिट्टी की मटकी और लड्डू गोपाल को बीच में रखकर गाए भजन
-चांदनी रात में लगाया दूध का भोग
अनोखा तीर, सोडलपुर। ग्राम में प्राचीन परंपरा और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला। शरद पूर्णिमा के अवसर पर महिलाओं ने ग्यारस से लेकर पूर्णिमा तक लगातार पांच दिनों तक मिलकर गढ़वा रास किया। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को महिलाएं आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभा रही हैं। इस दौरान मिट्टी की मटकी को आकर्षक रूप से सजाकर बीच में रखा गया और उसके चारों ओर घेरा बनाकर महिलाओं ने झालरे देते हुए भजन गाए।
भजन-कीर्तन के साथ निभाई परंपरा
गढ़वा रास के दौरान महिलाएं प्रतिदिन एक स्थान पर एकत्रित होकर मिट्टी की सजी हुई मटकी को बीच में रखती हैं। इसके बाद मटकी के चारों ओर घेरा बनाकर पारंपरिक तरीके से झालरे देती हैं और भगवान के भजन गाकर धार्मिक उत्सव मनाती हैं। पांच दिनों तक चले इस आयोजन में महिलाओं ने सामूहिक रूप से भाग लेकर पुरानी परंपरा को जीवंत बनाए रखा।
शरद पूर्णिमा पर चांदनी रात में की पूजा-अर्चना
शरद पूर्णिमा के दिन आयोजन का विशेष महत्व रहा। महिलाओं ने विधि-विधान से पूजन और आरती की। इसके बाद गढ़वा मटकी फोड़कर प्रसाद का वितरण किया गया। वहीं, शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में लड्डू गोपाल भगवान को विराजित कर उन्हें दूध का भोग लगाया गया। मटकी और कन्हैया जी को बीच में रखकर महिलाओं ने पारंपरिक गढ़वा रास किया और भजन-कीर्तन के साथ उत्सव मनाया।
आज भी कायम है पुरानी परंपरा
आधुनिक समय में भी महिलाओं द्वारा इस परंपरा का नियमित रूप से निर्वहन करना ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक आस्था की मिसाल है। ग्यारस से पूर्णिमा तक चलने वाला यह आयोजन महिलाओं को एक साथ जोड़ने के साथ नई पीढ़ी तक पारंपरिक रीति-रिवाज पहुंचाने का माध्यम भी बना हुआ है। पांच दिवसीय धार्मिक आयोजन का समापन शरद पूर्णिमा पर पूजन, भजन और गढ़वा रास के साथ हुआ। इस दौरान रेखा साबू, करुणा रायखेरे, द्वारका सोनी, वर्षा रायखेरे, रानू रायखेरे, ऋतु रायखेरे, प्रीति राठौर, पार्वती चौधरी, शशि शर्मा सहित अन्य महिलाएं उपस्थित थीं।







