हरदा में इन दिनों दो नेताओं के बीच वाकयुद्ध छिड़ा हुआ है। विकास का दावा करने वाले ये दोनों नेता वर्षों से हरदा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आए हैं। इसके बावजूद जिस तरह दोनों एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक मंचों और मीडिया के सामने स्तरहीन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, वह निश्चित रूप से हरदा के मतदाताओं को चुभने वाला है। कोई किसी को ‘पागल कह रहा है, तो कोई किसी को ‘पनौती । नेताओं की इस तरह की भाषा और शैली सुनकर अब आम लोग भी सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर जिन नेताओं को इतने वर्षों तक हरदा का प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया गया, क्या उनसे ऐसी ही भाषा और व्यवहार की उम्मीद थी?
विडंबना यह है कि दोनों नेता हरदा के विकास में अपने-अपने योगदान और उपलब्धियों को बढ़-चढ़कर पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। लेकिन जब जनता की नजर विकास के दावों से हटकर धरातल पर जाती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—वास्तव में विकास कितना हुआ और दिखाई कितना देता है?
राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में शब्दों की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। जनता ने नेताओं को एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्र के विकास और समस्याओं के समाधान के लिए चुना है। इसलिए नेताजी, आरोप लगाइए, सवाल पूछिए, अपनी उपलब्धियां गिनाइए—लेकिन ऐसी भाषा से बचिए, जो आपके पद से ज्यादा आपकी राजनीति की मर्यादा पर सवाल खड़े कर दे।
-नितेश गोयल, हरदा
ऐसी भाषा शोभा नहीं देती नेताजी

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