अनोखा तीर, रहटगांव। क्षेत्र में इन दिनों नवरात्रि के चलते माता के भक्त बड़ी ही आस्था से माता की उपासना कर रहे हैं। उपासना का एक मुख्य स्थल रहटगांव का खेड़ापति माता मंदिर है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में भक्त सुबह से जल चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। सुबह से रात्रि तक भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। खेड़ापति माता मंदिर का अपने आप में एक अलग ही महत्व है। इतिहास के झरोखे से देखें तो यह मंदिर अपनी अलग पहचान रखता है। यहां प्राकृतिक वातावरण में विशाल वट वृक्ष के नीचे पिंडी के रूप में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के साथ ही शिव जी, शनि महाराज और हनुमान जी महाराज के मंदिर से संपूर्ण प्रांगण शोभायमान है, जहां हमेशा भक्तों की भीड़ लगी रहती है। रहटगांव नगर के प्रशासनिक रिकॉर्ड और प्रबुद्धजनों के अनुसार यहां विशाल वट वृक्ष है जो लगभग 500 वर्षों से भी अधिक पुरातन है। धार्मिक मान्यता के अनुसार बरगद का वृक्ष अक्षय होता है, जिसका क्षरण सरलता से नहीं होता। इसकी अनुमानित आयु लगभग सात हजार से आठ हजार वर्ष से अधिक होती है। नगर के सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित नीरज महाराज ने बताया कि नगरवासी इस वृक्ष के नीचे विराजमान देवी-देवताओं की आराधना के साथ वैशाख माह में सपरिवार भोजन का भोग लगाकर आयु, सुख-संपदा, ऐश्वर्य की प्राप्ति करते हैं। हमारे पूर्वज पहले नगर से दूर स्वच्छ व पवित्र स्थानों का चयन कर अपने देवी-देवताओं की आराधना करते थे। नगर से दूर होने के कारण उस स्थान का नाम दंत कथाओं के अनुसार खेड़ा हुआ करता था और खेड़ा पर देवी विराजमान होने से इन पुरातन स्थानों का नाम खेड़ापति माता मंदिर पड़ गया।
खेड़ापति मंदिर पर जल चढ़ाने पहुंच रहे बड़ी संख्या में श्रद्धालु

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