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Saturday, 24 October 2026
हरदा

राज-काज

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दिनेश निगम ‘त्यागीÓ
इसके लिए दिग्विजय की आलोचना कितनी उचित….
– कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करना ऐसा मसला नहीं था, जिसकी आलोचना की जाए। वोट के लिए भगवान राम के नाम पर राजनीति तक ठीक है लेकिन उनके दर्शन-पूजन को लेकर आलोचना को उचित नहीं ठहराया जा सकता। अयोध्या जाकर दिग्विजय ने ऐसा कुछ कहा भी नहीं कि उनकी आलोचना की जाए। दिग्वजय ने कहा कि जब भगवान राम ने बुलाया, मैं उनके दर्शन करने आ गया। उन्होंने यह भी कहा कि हम धर्म का उपयोग व्यवसाय अथवा राजनीति के लिए नहीं करते क्योंकि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है। दिग्विजय ने कहा कि उन्होंने कभी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विरोध नहीं किया। साफ है कि दिग्विजय की यात्रा निजी और उनकी आस्था का प्रतीक थी। फिर भी इसे लेकर बयानबाजी हुई। कहा गया कि दिग्विजय रामलला की शरण में राज्यसभा की सीट के लिए गए हैं या फिर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के प्रति विरोध जताने के लिए। बता दें, दिग्विजय इस बार राज्यसभा की दावेदारी से इंकार कर चुके हैं और राहुल गांधी अब तक भगवान राम के दर्शन करने अयोध्या नहीं पहुंचे। इसे लेकर भाजपा उनकी आलोचना करती रहती है। दिग्विजय की राजनीति को लेकर आलोचना हो सकती है लेकिन उनकी धार्मिक आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। वे कट्टर सनातनी हैं।
गाइडलाइन के परवाह नहीं करते सरकार के मंत्री…
यह पहला अवसर नहीं है जब कहा गया कि प्रदेश सरकार के मंत्री कम से कम दो दिन सोमवार और मंगलवार को मंत्रालय में बैठेंगे और प्रदेश से आने वाले लोगों से मुलाकात कर उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे। इससे पहले प्रदेश भाजपा की ओर से पार्टी के प्रदेश कार्यालय में मंत्रियों के बैठने का शेड्यूल जारी किया गया था। इस तरह की गाइडलाइन अन्य मुख्यमंत्री भी जारी करते रहे हैं। मंत्रियों को यह भी निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे प्रभार के जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करें और माह मेंं कम से कम एक रात किसी गांव में गुजारें और लोगों की समस्याएं सुनें। रसोई गैस और पेट्राल-डीजल संकट के मौजूदा दौर में भी मंत्रियों को दौरे के निर्देश जारी हुए हैं। सरकार के कुछ मंत्री कुछ समय के लिए इसका पालन करते नजर आते हैं लेकिन बाद में पुराना ढर्रा प्रारंभ हो जाता है। सोमवार, मंगलवार को मंत्री मंत्रालय आते हैं लेकिन इस दिन ही केबिनेट की बैठक के साथ वे अपने विभागों की बैठकें बुला लेते हैं। नतीजा, वे बैठकों में व्यस्त रहते हैं और मिलने आने वाले लोग हताश होकर बिना मिले वापस चले जाते हैं। मंत्रियों की दिलचस्पी सिर्फ उनसे मिलने पर होती है जो उनके अपने विधानसभा क्षेत्र से आते हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और संगठन को चाहिए कि वे गाइडलाइन बनाने के साथ मानीटिरिंग की व्यवस्था भी करें ताकि पता चल सके कि निर्देशों का पालन हो भी रहा है या नहीं।
राज्यसभा सीट को लेकर चिंता में कांग्रेस नेतृत्व….
– राज्यसभा के चुनाव में बिहार सहित कुछ राज्यों में कांग्रेस के विधायकों ने जो किया, उससे पार्टी को नुकसान हुआ और एनडीए अपेक्षा से ज्यादा सीटें जीतने में सफल हो गया। इसके बाद कांग्रेस ने कुछ विधायकों को निलंबित कर दिया जबकि कुछ को कारण बताओ नोटिस जारी किया। मध्य प्रदेश में भी राज्यसभा की तीन सीटें खाली होने वाली हैं। इनमें से एक दिग्विजय सिंह की है जो कांग्रेस को मिल सकती है लेकिन यदि बिहार और अन्य राज्यों की तरह कांग्रेस के आधा दर्जन विधायकों ने ही क्रास वोटिंग कर दी या दगा कर दिया तो पार्टी इस एक सीट से भी हाथ धो सकती है। इसलिए बिहार, हरियाणा और उड़ीसा जैसे राज्यों में जो हुआ, उसे देखकर कांग्रेस नेतृत्व चिंतित है। विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा की विधायकी तो सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दी है लेकिन यह भी कह दिया है कि वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर सकेंगे। इस तरह कांग्रेस का एक वोट पहले ही कम हो चुका है। हालांकि वर्तमान में कांग्रेस के अंदर असंतोष कम दिख रहा है। पार्टी आलाकमान द्वारा एकजुट होकर भाजपा का मुकाबला करने के आह्वान का असर नेताओं में दिख रहा है लेकिन भाजपा जिस तरह आपरेशन लोटस चलाती है, उसकी हवा किसी को नहीं लगती और अचानक पांसा पलट जाता है।
अपने ‘निवासÓ में ही बैठे रह गए राम निवास….
पूर्व मंत्री राम निवास रावत ने जब से कांग्रेस छोड़ी तब से ही भाग्य उनका साथ नहीं दे रहा है। पहले वे पार्टी छोड़ने के बाद हुए विजयपुर विधानसभा सीट से उप चुनाव हार गए थे, जबकि तब वे प्रदेश की भाजपा सरकार में मंत्री थे। सरकार के साथ भाजपा का मजबूत संगठन उनके साथ था लेकिन कांग्रेस के युवा नेता मुकेश मल्होत्रा ने उन्हें पटकनी दे दी थी। पर राम निवास हार स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। नामांकन में आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने को आधार बना कर उन्होंने मुकेश का चुनाव रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। हाईकोर्ट ने याचिका पर फैसला देते हुए मुकेश का निर्वाचन शून्य घोषित कर दिया और दूसरे नंबर पर रहे राम निवास को विधायक बनाने का आदेश दे दिया। फैसला आने के बाद राम निवास के समर्थकों में मिठाईयां बंट गईं। लेकिन यह खुशी सिर्फ मुंह मीठा करने तक ठहर सकी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। राम निवास विधायक बनने की बजाय अपने निवास में ही बैठे रह गए। राम निवास के अंदर मंत्री बनने की भूख इस कदर थी कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने तब तक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था जब तक उन्हें मंत्री पद की शपथ नहीं दिला दी गई। जनता जनार्दन को यह अच्छा नहीं लगा और उप चुनाव में उसने राम निवास को धूल चटा दी।
राजनीतिक नियुक्तियों की फाइल फिर लापता….!
प्रदेश के निगम-मंडलों, आयोगों आदि में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर हो-हल्ला एक बार फिर जम कर मचा, पर नतीजा रहा सिफर। परदे के पीछे से सरकारी सुख-सुविधाएं भोगने की आस में बैठे दावेदार राजनेताओं के अरमानों पर पानी फिर गया। खबर है कि यह मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के कार्यकाल को लगभग सवा दो साल पूरे हो चुके हैं, पर राजनीतिक नियुक्तियां लगातार टलती जा रही हैं। खुद डॉ यादव ने इस संदर्भ में अब तक कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल कार्यभार संभालने के बाद से कई बार जल्दी नियुक्तियों की बात कह चुके हैं। नियुक्तियों को लेकर कसरत और केंद्र से हरी झंडी मिलने की खबर पहले से चल रही थीं, इस बीच जयभान सिंह पवैया को राज्य योजना आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। इससे राजनीतिक नियुक्तियों को और बल मिला। कहा जाने लगा कि नियुक्तियों पर केंद्रीय नेतृत्व की मुहर लग गई है और कभी भी सूची जारी होने वाली है। कुछ मीडिया समूहों ने नियुक्त पाने वाले नेताओं के नाम तक छाप दिए। फिर कहा गया कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सूची रुकवा दी क्योंकि उनके लोगों को जगह नहीं मिल रही थी। सच जो भी हो लेकिन फिलहाल नियुक्तियों संबंधी फाइल लापता है और मसला फिर टॉय-टॉय फिर होता नजर आ रहा है।

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