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Sunday, 18 October 2026
मध्य प्रदेश

राज- काज

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दिनेश निगम ‘त्यागीÓ
भाजपा में आकर अपना असर खोते जा रहे सिंधिया….!
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर प्रदेश में लगातार सिमटता जा रहा है। जब वे कांग्रेस में थे तब उनका अलग जलवा था। लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद वे प्रदेश भर में अपने समर्थकों को सरंक्षण देने में सक्षम थे। उनके समर्थक का टिकट काटने की हिम्मत किसी में नहीं थी। भाजपा में आने के बाद भी शुरू में उनकी खूब तूती बोली। वे भाजपा में 22 विधायकों के साथ आए थे। इसमें से एक दर्जन से ज्यादा मंत्री बनाए गए थे। शेष में से अधिकांश को निगम-मंडलों में एडजस्ट किया गया था। लेकिन अब उनमें से आधा दर्जन ही विधायक हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री सिर्फ तीन। भाजपा में वे अपने लोकसभा क्षेत्र गुना-शिवपुरी तक ही सीमित होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं अभी निगम-मंडलों, प्राधिकरणों, आयोगों आदि में की गईं 60 से ज्यादा नियुक्तियों में सिंधिया के समर्थक सिर्फ 2 हैं। इमरती देवी सहित उनके लगभग एक दर्जन समर्थक परदे के पीछे से सरकार में हिस्सेदारी मिलने का इंतजार ही करते रह गए। खबर है कि इससे सिंधया नाराज है। इसे लेकर वे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से मिल चुके हैं। इस पेंच के कारण ही लगभग दो दर्जन निगम-मंडलों में नियुक्तियों का काम रोक दिया गया है। इनके लिए फिर नए सिरे से मंथन होगा।
भाजपा में फिर छोटों पर कार्रवाई, बड़ों को माफी…
भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भेदभावपूर्ण कार्रवाई की अपनी परंपरा से उबर नहीं पा रहा। इसे लेकर पार्टी के अंदर असंतोष है। इस परंपरा के तहत जिला और मंडल स्तर का कोई नेता गलती करता है तो इस्तीफा लेने और कार्रवाई करने में देर नहीं की जाती लेकिन वही गलती कोई बड़ा नेता, सांसद अथवा विधायक कर दे तो उसे माफी दे दी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पेट्रोल-डीजल की बचत के आह्वान का पालन न करने वालों पर कार्रवाई के मसले पर भी भाजपा ने इसी परंपरा को कायम रखा। भिंड के किसान मोर्चे का जिलाध्यक्ष चूंकि सबसे छोटा था, उनके समर्थन में भीड़ जुटी तो उन्हें पद से हटाने में देर नहीं की गई। इसके विपरीत अन्य कई काफिले के साथ निकले, मंत्री प्रभार के जिले में वाहनों की लंबी कतार के साथ घूमे, एक मंत्री ने सवाल करने वाले पत्रकार को ही झिड़क दिया। पंरपरा के अनुसार इन बड़े नेताओं को माफी दे दी गई। इन्हें तलब करने अथवा नोटिस देने की खानापूर्ति की गई। पार्टी द्वारा की गई इस पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को आम कार्यकर्ता पसंद नहीं कर रहा है। उनका कहना है कि नेता बड़ा हो या छोटा, पार्टी के अंदर कार्रवाई एक तरह की होना चाहिए। क्या प्रदेश का भाजपा नेतृत्व ऐसा कर पाएगा?
भोजशाला मसले पर दिग्विजय ने बरती सावधानी…
जिस तरह अयोध्या से समूचे हिंदू समाज की आस्था जुड़ी थी, मप्र के हिंदुओं के लिए धार की भोजशाला का लगभग वैसा ही महत्व था। हाईकोर्ट से विवाद का निबटारा भी अयोध्या की तर्ज पर हुआ। भोजशाला को मंदिर बता कर हिंदुओं को सौंप दिया गया और मुस्लिमों को नमाज का अधिकार खत्म कर कह दिया गया कि वह इसके लिए अलग से जमीन की मांग कर सकता है। सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखी गई थी पर न अयोध्या का फैसला आने के बाद कोई विवाद हुआ था, न भोजशाला का निर्णय आने के बाद शांति भंग हुई। साफ है कि मुस्लिम समाज भी कोर्ट के निर्णय पर सवाल नहीं उठा रहा। अपील का उसके पास संवैधानिक अधिकार है और इसका उपयोग वह करेगा। इसमें किसी को बुराई भी नहीं होना चाहिए। हमेशा की तरह कांग्रेस खास कर दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं से विरोध की उम्मीद थी लेकिन उन्होंने भी सावधानी बरती। कांग्रेस ने निर्णय का विरोध नहीं किया और दिग्विजय ने सिर्फ इतना कहा कि वे फैसले का अध्ययन करेंगे। निश्चिततौर पर फैसले से मुस्लिम समाज खुश नहीं होगा और हिंदू समाज खुश होकर जश्न मना रहा है। कॉश, दोनों समाज सांप्रदायिक सद्भभाव के साथ मिल-जुल कर रहें तो यह देश सच्ची-मुच्ची का स्वर्ग बन जाए।
अब भी मंत्री शाह को बचा पाएगा भाजपा नेतृत्व…!
प्रदेश भाजपा का आदिवासी चेहरा और राज्य सरकार में मंत्री विजय शाह पार्टी नेतृत्व के लिए गले की फांस बन गए हैं। आपरेशन सिंदूर के दौरान उनके द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिया गया आपत्तिजनक बयान जनमानस ने भले विस्मृत कर दिया हो और भाजपा नेतृत्व किसी तरह की कार्रवाई करने के पक्ष में न हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट शाह को बख्शने के मूड में नहीं दिखता। हालांकि कोर्ट के निर्देश पर शाह बयान के लिए माफी मांग चुके हैं। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ज्यादा कड़ा रुख अपनाया। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि दो सप्ताह में अभियोजन को मंजूरी दी जाना थी लेकिन नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि ‘इनफ इज इनफ (बस बहुत हुआ), अब हमारे आदेश का पालन कीजिए।Ó सीजेआई की बेंच ने यह कहकर प्रदेश सरकार को 4 हफ्ते में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। इससे भाजपा में खलबली है। भाजपा वैसे भी अपने किसी नेता पर कार्रवाई करने से परहेज करती है। शाह तो पार्टी का आदिवासी चेहरा हैं। इस वर्ग में विपरीत मैसेज न जाए, इसलिए पार्टी लगातार कार्रवाई से बच रही है। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद मामला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के पाले में पहुंच गया है। अब जो होगा वहां के निर्देश पर।
भाजपा की केंद्रीय टीम में मप्र का जलजला संभव…
प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए अभी दो साल से ज्यादा का समय है, लेकिन भाजपा ने सांगठनिक तौर पर अभी से तैयारी शुरू कर दी है। इसी रणनीति के तहत प्रदेश सरकार में राजनीतिक नियुक्तियां हो रही हैं। प्रदेश संगठन के पद भरे जा रहे हैं। पार्टी की केंद्रीय टीम में भी इसे ध्यान में रख कर ही प्रदेश के नेताओं को जगह दी जाएगी। भाजपा प्रदेश में हमेशा से मजबूत रही है। इसलिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के साथ केंद्रीय टीम में भी प्रदेश के नेताओं को अच्छी जगह मिलती रही है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवनी अपनी टीम तैयार करने की कसरत कर रहे हैं। मप्र से भी केंद्रीय टीम के लिए दावेदार नेताओं की कमी नहीं है। इस बार भी टीम में मप्र का जलजला रह सकता है। संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति में भी प्रदेश से एक-एक बड़े नेता को शामिल किया जा सकता है। एक पद पर कैलाश विजयवर्गीय की जगह पक्की बताई जा रही है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और महामंत्री के लिए वीडी शर्मा, कविता पाटीदार, नरोत्तम मिश्रा और राकेश सिंह जैसे नामों की चर्चा है। नरोत्तम को जगह तभी मिलेगी जब उन्हें दतिया का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा और राकेश को राज्य मंत्रिमंडल से हटाया जाएगा। राष्ट्रीय मंत्री के लिए अरविंद भदौरिया और रामेश्वर शर्मा के नामों की चर्चा है।
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