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Thursday, 15 October 2026
हरदा

भारतीय कला का अद्भुत संगम बना दुर्गा सांस्कृतिक कला केंद्र का पंडाल

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-68 वर्षों से अनवरत जारी है मां दुर्गा की आराधना
-भव्य शाही दरबार में विराजित हैं मां भगवती

अनोखा तीर, खिरकिया। खिरकिया की नवरात्रि केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि नगर की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा और सामूहिक सेवाभाव का प्रतीक भी है। आकर्षक दुर्गा पंडालों, भव्य साज-सज्जा और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के चलते खिरकिया का दुर्गोत्सव क्षेत्र में विशेष पहचान रखता है। इसी परंपरा को 68 वर्षों से निरंतर आगे बढ़ा रहा दुर्गा सांस्कृतिक कला केंद्र इस वर्ष भी अपने अनूठे मंदिरनुमा पंडाल के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। समिति द्वारा इस वर्ष तैयार किया गया भव्य शाही दरबार अपनी अद्भुत नक्काशी, आकर्षक बनावट और बारीक कलाकारी के चलते लोगों का ध्यान खींच रहा है। उत्तर भारत की नागर मंदिर स्थापत्य शैली और दक्षिण भारत की मंदिर कला से प्रेरित इस पंडाल में भारतीय वास्तुकला की विविध परंपराओं का सुंदर समन्वय देखने को मिल रहा है। दूर से ही अपनी भव्यता का एहसास कराने वाला यह पंडाल मां दुर्गा के दर्शन के साथ-साथ कला और शिल्प को करीब से देखने का अवसर भी प्रदान कर रहा है। यही वजह है कि खिरकिया के अलावा हरदा और खंडवा जिले के विभिन्न क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। दो महीने की मेहनत और सेवाभाव से साकार हुआ भव्य पंडालदुर्गा सांस्कृतिक कला केंद्र के इस आकर्षक पंडाल को तैयार करने में कार्यकर्ताओं ने करीब दो महीने तक मेहनत की। कलात्मक डिजाइन, बारीक नक्काशी और रंगों के सटीक संयोजन के जरिए इसे एक भव्य राजमहल जैसा स्वरूप दिया गया है। पंडाल की विशेषता यह है कि इसकी सजावट में पारंपरिक भारतीय मंदिरों की स्थापत्य शैली की झलक मिलती है, वहीं इसकी भव्यता श्रद्धालुओं को शाही दरबार का आभास कराती है। नगर में दुर्गोत्सव की परंपरा को स्थापित करने वाले इस प्राचीन केंद्र की शुरुआत वर्ष 1958 में हुई थी। पूर्व विधायक बद्रीनारायण अग्रवाल के बाद उनके पुत्र प्रवीण अग्रवाल ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में उनके भतीजे जयंत अग्रवाल सहयोगियों के साथ आयोजन की व्यवस्थाओं में योगदान दे रहे हैं। वर्षों से जारी यह आयोजन आज भी धार्मिक आस्था, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। समिति से जुड़े राकेश अग्रवाल के अनुसार, पंडाल को सोशल मीडिया पर भी काफी लोकप्रियता मिल रही है। इसकी कलात्मक बनावट और भव्यता लोगों को आकर्षित कर रही है। समिति के सदस्यों का कहना है कि स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग मां दुर्गा के दर्शन करने पहुंच रहे हैं।
दक्षिण और उत्तर भारतीय मंदिर स्थापत्य का अनूठा संगम
इस वर्ष के पंडाल की सबसे बड़ी विशेषता उत्तर भारत की प्रसिद्ध नागर शैली और दक्षिण भारतीय मंदिरों की बारीक अलंकरण परंपरा से प्रेरित इसकी बनावट है। पंडाल के विभिन्न हिस्सों में मंदिर स्थापत्य की झलक दिखाई देती है। कलाकारों ने पारंपरिक वास्तुकला के स्वरूप को आधुनिक सजावटी सामग्री के माध्यम से उकेरने का प्रयास किया है।
पंडाल की प्रमुख विशेषताएं श्रद्धालुओं को कर रही हैं आकर्षित
गर्भगृह जैसा भव्य ऊपरी मुकुट : पंडाल के ऊपरी हिस्से में बनाया गया विशाल मुकुटनुमा अलंकरण इसे प्राचीन मंदिर के गर्भगृह जैसा स्वरूप प्रदान करता है। इसकी भव्य बनावट पूरे पंडाल की सुंदरता को विशेष रूप देती है।
झरोखेदार मेहराबी तोरण : प्रवेश द्वार पर बनाए गए विशाल स्तंभ और बाहर की ओर उभरे झरोखेनुमा हिस्से इसकी स्थापत्य सुंदरता को बढ़ाते हैं। मेहराबदार तोरण के साथ तैयार किया गया मुख्य प्रवेश द्वार शाही महल जैसी भव्यता का एहसास कराता है।
होयसल मंदिर कला से प्रेरित प्रभावल : मां दुर्गा की प्रतिमा के पीछे बनाया गया गोलाकार, जालीदार प्रभावल विशेष आकर्षण का केंद्र है। दक्षिण भारत की प्रसिद्ध होयसल मंदिर कला से प्रेरित यह आभामंडल मां भगवती की प्रतिमा की दिव्यता को और निखारता है। इसकी बारीक बनावट श्रद्धालुओं का ध्यान सहज ही अपनी ओर खींचती है।
लकड़ी पर उकेरी गई नक्काशी जैसा आभास
पंडाल का निर्माण थर्माकोलयुक्त फोम जैसी सजावटी सामग्री से किया गया है, लेकिन कलाकारों ने रंगों और उभरी हुई आकृतियों का ऐसा संयोजन किया है कि इसकी सतह सागौन की लकड़ी पर की गई बारीक नक्काशी जैसी दिखाई देती है। यही कलात्मक कौशल इस पंडाल को विशिष्ट बनाता है।भव्य दरबार में विराजित मां दुर्गा, प्रतिदिन मिल रही अलग-अलग प्रसादीदुर्गा सांस्कृतिक कला केंद्र में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा शाही दरबारनुमा पंडाल में विराजित है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु मां के दर्शन करने के साथ पंडाल की कलात्मक सजावट को भी निहार रहे हैं। समिति द्वारा दर्शनार्थियों के लिए प्रतिदिन अलग-अलग प्रकार की प्रसादी वितरित की जा रही है, जो आयोजन की सेवा भावना को दर्शाती है। समिति के प्रियेश मेहता ने बताया कि दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को प्रतिदिन अलग-अलग प्रसादी वितरित की जाती है। वहीं समिति के सदस्य नीरज चंद्रवंशी, नितेश प्रजापत, देवेंद्र दरबार, रितेश मूंदड़ा, मोहित लूनिया, राघव ओझा, राघव अग्रवाल, कैलाश लूनिया, पंकज अग्रवाल, भागवत लूनिया, भूरू प्रजापत और सत्यम अग्रवाल सहित अन्य कार्यकर्ता आयोजन को सफल बनाने में जुटे हुए हैं।
68 वर्षों की परंपरा, आस्था और कला का प्रतीक
दुर्गा सांस्कृतिक कला केंद्र का यह आयोजन बताता है कि परंपराएं केवल वर्षों की निरंतरता से नहीं, बल्कि पीढ़ियों के समर्पण, सामूहिक सहयोग और सेवाभाव से जीवित रहती हैं। वर्ष 1958 से चली आ रही मां दुर्गा की आराधना आज भी उसी उत्साह के साथ जारी है। भव्य शाही दरबार पंडाल इसी परंपरा में कला और नवाचार का नया अध्याय जोड़ रहा है। अपनी विशिष्ट वास्तुशैली, आकर्षक नक्काशी और भव्य स्वरूप के चलते यह पंडाल खिरकिया के दुर्गोत्सव की पहचान को और मजबूत कर रहा है। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भारतीय मंदिर कला की सुंदरता का यह संगम नवरात्रि के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बना हुआ है।

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