निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥ श्रीराम चरित मानस की यह चौपाई बताती है कि सिर्फ निर्मल मन वाला ही प्रभु तक पहुंच पाता है। इधर, प्रदेश के कुछ राजनेता, धर्मगुरू अयोध्या राम मंदिर में रामलला मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ रहे हैं। कोई आमंत्रण नहीं मिलने से खफा है, तो किसी को इस बात का गिला है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समारोह के मुख्य यजमान क्यों? अर्थात, करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़े इस धार्मिक समारोह में भी सियासत का पुट! तर्क तो यह भी कि राम तो सर्वत्र हैं। निष्काम भक्ति से उन्हें तो कहीं भी पाया जा सकता है। फिर अयोध्या ही क्यों? लेकिन इन तर्क, कुतर्कों के बीच इस बात को भुलाया जा रहा है कि ऐसा महान व पावन अवसर क्या दोबारा आएगा?
चुनौती अपार
विधानसभा चुनाव में साढ़े आठ प्रतिशत मत बढ़ाकर उत्साहित बीजेपी अपना वोट शेयर 51 फीसद तक करने का जी-तोड़ जतन कर रही है। इसके उलट कांग्रेस अभी योजना बनाने में मशगूल है और कार्यकर्ता आस्तीन के सांप गिनाने में। लोकसभा के बीते तीन चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो वर्ष 2009 में 3.31 प्रतिशत, 2014 में 19.11 प्रतिशत व 2019 में 23.50 प्रतिशत अधिक मत बीजेपी को मिले। यानी कांग्रेस का वोट शेयर चुनाव-दर-चुनाव घटता रहा। तीसरा मोर्चा कहे जाने वाले क्षेत्रीय दल यहां पहले से फेल हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में तो इनकी दशा और बुरी हुई। तब गठबंधन का सहारा भी नहीं। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 23 प्रतिशत की लीड के साथ वोट शेयर बढ़ाना व अधिकाधिक सीट जीतना कांग्रेस के लिए किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं।
एक और नया घर
सूबे के सियासी हलकों में राजधानी का अब तक एक ही घर चर्चित रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व.अनिल माधव दवे जी का नदी का घर। अब एक नया घर भी चर्चा में है। मामा का घर।
‘नदी का घरÓ बीजेपी व संघ के चिंतकों का ठिकाना रहा है। जहां प्रदेश की सियासत से लेकर भविष्य की योजनाओं व रोडमैप को लेकर भी मंथन होते रहा है। अब ‘मामा का घरÓ सियासत में कौन सा मुकाम हासिल करेगा? यह भविष्य के गर्त में। फिलहाल तो इसे मामा के एक और सियासी इमोशनल कार्ड से जोड़कर देखा जा रहा है।
शिवराज का अनिश्चित वनवास
अपने गृहग्राम पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजतिलक होते-होते वनवास मिलने की बात के साथ ही इसकी वजह भी उजागर की। उन्होंने कहा, हो सकता है, कोई बड़ा एजेंडा व मिशन रहा हो। अब, किसी भी मिशन की कार्ययोजना एक दिन में तो बनती नहीं। यह भी संभव नहीं कि 17 सालों तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज को इसका भान न हो। नेतृत्व का भरोसा हासिल करने की कवायद में भी उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी। तब बड़ा सवाल यही कि वह एजेंडा क्या, जिसे पूरा करने में शिवराज हिचकते रहे और अंतत: उन्हें अनिश्चित वनवास भोगने को मजबूर होना पड़ा।
प्रबोधन की जरूरत
बीते सप्ताह स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री जबेरा के धर्मेंद्र लोधी खुद को निरकुंश बताकर चर्चा में रहे। इस सप्ताह एक अन्य विधायक प्रहलाद लोधी ने सार्वजनिक मंच से अधिकारियों को गरियाकर अपनी खूबी बताई। बुंदेलखंड अंचल के ही एक अन्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने अपने ही दल के पूर्व मुख्यमंत्री पर निशाना साधकर पार्टी को मुसीबत में डाल दिया। बात बढ़ी और बवाल मचा तो यू-टर्न लिया, लेकिन तब तक तो गेंद विपक्ष के पाले में पहुंच ही चुकी थी। इससे पहले एक अन्य नेता प्रीतम लोधी ब्राह्मणों के खिलाफ बयान देकर पार्टी की नाराजगी का शिकार हुए। हाल ही में उनके बेटे ने उपद्रव किया तो वह उसे स्वयं थाने ले गए। पुलिस अधिकारियों से उसे सबक सिखाने की बात भी कही। बेटों के कारनामों से कुछ राजनेताओं का हश्र देख विधायक बन चुके प्रीतम तो संभले हुए नजर आ रहे हैं लेकिन बाकी को शायद प्रबोधन की जरूरत है।
रूड हूं, टॉक्सिक नहीं
आपे कितने भी योग्य व महत्वपूर्ण क्यों न हों, लेकिन लोक व्यवहार में फिट नहीं तो फिर हिट भी नहीं। जीएमसी से फिर बेआबरू होकर लौटीं चिकित्सा शिक्षा विभाग की एक महिला प्राध्यापक इसकी बानगी है। उनके रूखे व्यवहार से तंग आए मातहत उन्हें रूड के साथ ही टॉक्सिक बताते रहे हैं। हाल ही मीडिया से चर्चा में प्राध्यापक ने यह तो स्वीकार किया कि वह रूड हैं, लेकिन टॉक्सिक नहीं। पद के मद में तो कई इनटॉक्सीकेट हो जाते हैं। इस पर रूड होना, टॉक्सिक होने से कम है क्या? बहरहाल, उनकी इस स्वाकारोक्ति ने यह तो साबित कर दिया कि पूर्ववर्ती सुल्तानिया अस्पताल में दाखिल होने वाली महिलाएं चिकित्सकों पर रूखेपन व दुर्व्यवहार के जो आरोप लगाती रहीं, वह गलत नहीं। जब विभाग का मुखिया ही बेरुखी का आदी हो तो उसके मातहतों से इससे अलग क्या उम्मीद की जा सकती है।
चट मंगनी पट ब्याह
भाप्रसे के नए अधिकारियों का पहला सपना होता है, किसी बड़े जिले का कलेक्टर बनना। ऐसा मौका अव्वल तो मुश्किल से आता है। आए और हाथ से फिसल जाए तो इससे अधिक अखरने वाली बात और क्या होगी? इसके चलते वर्ष 2010 बैच के आईएएस कौशलेंद्र विक्रम सिंह का ज्यों ही भोपाल कलेक्टरी का आदेश निकला, दो घंटे बाद ही उन्होंने इस पद पर अपनी आमद दे डाली। उनकी यह फुर्ती, चर्चा का विषय रही। हो भी क्यों न, नौ महीने पहले भी उनके पास यह मौका आया था, लेकिन आमद देने में दो दिन लेट क्या हुए, तब तक आदेश ही बदल गया। सिंह इस बार सरकार को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते थे।
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