राजनीति के मानचित्र पर हरदा के अस्तित्व के बिन्दु का रंग पहले भले ही हल्का रहा हो, मगर अब आकर्षक है। इस संवेदनशील नगर ने अनेक त्रासदियों को झेला, मगर अपनी सांस्कृतिक विरासत को कभी बदनाम नहीं होने दिया। हरदा की राजनीति में कलह और सुलह के समीकरण बनते और बिगड़ते रहे, लेकिन यहां नेताओं की निजी मान्यताएं ज्यादा प्रासंगिक रही हैं। यहां कांग्रेस के तत्कालीन विधायक स्व.नन्हेलाल पटेल के दौर से लेकर भाजपा के मौजूदा विधायक कमल पटेल तक राजनेताओं के व्यक्तित्व और कृतित्व का साक्षी यह क्षेत्र रहा है। स्व.नन्हेलाल पटेल का दौर कांग्रेस के लिए स्वर्ण युग का दौर रहा, उनकी विनम्रता और सहजता की मिसाल राजधानी भोपाल के गलियारों से लेकर इस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे पर मानों चस्पा रही। लेकिन दस वर्षों के ऐतिहासिक विधायकी कार्यकाल के बाद अचानक पटेल साहब का राजनीति से मोह भंग हो गया और उन्होंने चुनाव ना लड़ने का फैसला ले लिया। कांग्रेस संगठन के आला नेताओं ने पटेल साहब से चुनाव लड़ने के लिए बड़ी मनुहार की, लेकिन पटेल साहब ने उसे बड़ी विनम्रता से ठुकरा दिया और अपनी जगह कांग्रेस से विष्णु राजोरिया को आगे कर उनके लिए पूर्ण समर्पण के भाव से साथ देने का पार्टी से वादा किया। स्व. नन्हेलाल पटेल की बेदाग छबि को यहां कांग्रेस ने भरपूर भुनाया और विष्णु राजोरिया यहां कांग्रेस से विधायक-मंत्री बनकर एक स्थापित नेता बन गए। लेकिन हरदा और भोपाल की आबो-हवा तासीर में बड़ा फर्क हैं। विष्णु राजोरिया उस फर्क उस तासीर को नहीं भांप पाएं और नन्हेलाल पटेल जैसी ग्रामीण प्रष्ठभूमि से आए युवा कमल पटेल से चुनाव हार बैठे। उस दौर में कांग्रेसी शासन काल में हरदा की जनता इस बात से दु:खी थी कि एक आम आदमी के दर्द को बांटने के लिए नेता-मंत्री अपने चमचमाते बंगले से क्यों नहीं निकल रहा। वास्तव में एक ऐसा जनप्रतिनिधि जिसे जनता ने अपने दर्द, अपनीं छटपटाहट की आवाज बनाकर भेजा हो, अगर वो सत्ता की झिलमिलाहट में खो जाए तो बेचारी निरीह जनता के भाग्य पर यह बिजली गिरने जैसी बात है। 90 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राजनीति से भाजपा युवा मोर्चा में आए कमल पटेल ने हरदा में जनता की उसी पीढ़ा को बड़ी बारीकी से समझा-जाना और सबसे पहले यहां किसानों के हो रहे वर्षो से शोषण और दोहन के खिलाफ कमर कस कर मोर्चा खोल दिया। हरदा कृषि उपज मंडी, जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार को हिलाकर रख दिया। किसानों के लिए उनके इस संघर्ष का ही परिणाम उन्हें किसान नेता से कृषि मंत्री के मुकाम तक ले आया। कमल पटेल की सबसे बड़ी राजनैतिक उपलब्धी हरदा जिले को शत-प्रतिशत सिंचित करवाने की रही। हरदा जिले की संपूर्ण अर्थव्यवस्था का आधार ही कृषि है। कमल पटेल ने इसी पर अपनी राजनीति का पूरा फोकस कर वो कर दिखाया जो कल्पना से परे था। कमल पटेल की इस उपलब्धि ने उन्हें दौहरा फायदा पहुंचाया, जहां अपनी पार्टी में उनका कद बढ़ा, वहीं अपनी जनता के बीच वे जन-जन के नायक और लाडले बन गए। राजनीति के बदलते परिवेश में एक राजनेता से जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा उसके और जनता के बीच जीवंत संवाद और उसकी उपस्थिति अपने बीच निश्चित तौर पर सुनिश्चित करने को लेकर होती है।
चुनाव राजनेताओं के लिए ही नहीं जनता के लिए भी अग्नि परीक्षा के समान हैं। जनता का एक बोट ही उसकी तकदीर और तस्वीर बदलने के लिए काफी है। क्रोध, आक्रोश और बेबुनियाद बातों से किया गया जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन बहुत घातक होता है। एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और एक जिम्मेदार नेतृत्व वाली सरकार ही जनता के भाग्य का आले, उसका लेखा-जोखा तैयार करतें हैं। अगर ये मजबूत और कुशल कर्णधारों के हवाले है तो जनता के हर सपनें उसके अपने हैं। वास्तव में जनता वह आईना है जिसमें सत्ता और विरोधी दल अपनें-अपनें लोकतांत्रिक चेहरे निहारते हैं। देश-प्रदेश की सरकारों के कामकाज की उपलब्धिया ही जनता के सुनहरे भविष्य को रेखांकित करतीं हैं।
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