मौसम की मार व कीट प्रकोप का असर
वर्ष 2017-18 की तरह सडक़ पर विचरण करती नजर आ रही इल्लियां
भैरूंदा। इस वर्ष खेतों में लहलहा रही फसल को लेकर किसान खुश था और सोयाबीन फसल के बंपर उत्पादन को लेकर वह पूरी तरह आश्वस्त था। लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। इसका अंदाजा स्वयं किसान को भी नहीं था। खेतों में फसलों की स्थिति को देखकर किसान की खुशी गायब हो चुकी हैं। चेहरों पर शिकन और चिंता की लकीरे खिच गई हैं। वह अपनी परेशानी बताएं तो किसे, एक तरह से किसान के आसपास चारों और अंधेरा छा गया हैं। 5/6 वर्ष पहले के हालात एक बार फिर निर्मित हो गए हैं। अब किसान न तो जीने की स्थिति में हैं और ना ही मरने की। अब तो केवल सरकार से ही राहत की उम्मीद बनी हुई हैं। कुछ ऐसे हालात भैरुंदा क्षेत्र में देखने को मिल रहे हैं। क्षेत्र में अगस्त माह बीतने के बाद भी बरसात औसत के आधे आंकड़े तक ही पहुंच सकी हैं। बरसात नही होने से हाहाकार के हालात बनने लगे हैं। खेतों में खड़ी फसल मुरझा रही हैं तो बरसात के अभाव में सूखे की आहट भी सुनाई देने लगी हैं। यदि मौसम का मिजाज ऐसा ही बना रहा तो किसान अपने खेतों में खड़ी फसल को काटेगा ही नहीं बल्कि वह खेतों में मवेशियों को छोड़ देगा। जिस मात्रा में फसल की ग्रोध व फल लगने की स्थिति बनना थी उसमे बरसात के अभाव व तेज गर्मी ने फसलों को रोग ग्रस्त कर दिया। अब तो फसल समय से पहले ही पकने की स्थिति में पहुंच गई हैं। मौसम परिवर्तन की स्थिति भी किसानों के पक्ष में नहीं होने अब उम्मीद नाउम्मीद में बदल गई हैं।
उपचार के सारे प्रयास नाकाम, अब भगवान भरोसे फसल
मौसम अनुकूल न होने के कारण सोयाबीन फसल पर रोग नियंत्रण के सभी प्रयास फेल हो चुके हैं। अब तो हालत ऐसे बन गए हैं कि कीटनाशक दुकानदार भी दवा देते समय किसान को समझाईश दे रहे हैं कि दवा तो दी जा रही है लेकिन इसका खेत में कितना असर होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में अब क्षेत्र की फसल पूरी तरह भगवान के भरोसे हैं। दूसरी और कृषि विभाग का अमला भी खेतों में घूम कर सर्वे की सलाह व फसलों का उपचार करने की जानकारी उपलब्ध करा रहा है। लेकिन गर्मी के इस दौर में दवा भी वे असर साबित हो रही है। क्षेत्र की सोयाबीन फसल पर इस समय एक नहीं बल्कि चार-चार रोगों व्हाईटफ्लाई, स्टेमिना फ्लाई, रिंग कटर, तंबाखू जैसी इल्ली का अटैक है। ऐसे में महंगी से महंगी दवा और खाद का उपयोग करने के बावजूद भी कोई फायदा नहीं होने पर किसान अब फसल को अपने भाग्य और भगवान के भरोसे छोड़ चुका है।

एक सप्ताह की खेच के बाद चौपट हो जाएगी फसल
क्षेत्र में पिछले एक पखवाड़े से भी अधिक समय से बरसात नहीं हो सकी है। जिससे तापमान में लगातार बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। वर्तमान मैं दिन का पार 32 से 35 डिग्री सेल्सियस तक बना हुआ है। जबकि आमतौर पर सोयाबीन फसल के अच्छे उत्पादन के लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती हैं। लेकिन मौसम का मिजाज यही रहा तो फसल चौपट होने से कोई नहीं रोक सकता। हालांकि मौसम विभाग के द्वारा सितंबर माह में बरसात होने की जानकारी दी है। लेकिन यदि समय रहते बरसात नहीं होती है तो हालत बाद से बदतर होंगे।

खेतों के साथ सडक़ों पर घूम रही इल्लियां
इल्लियों का प्रकोप भी क्षेत्र के कई खेतों में देखने को मिला हैं। इल्लियां खेत में खड़ी फसलों को चौपट करने के बाद सडक़ पर घूमती हुई दिखाई दे रही हैं। क्षेत्र के गांव पांचौर,रिठवाड़,ढांडिया सहित एक दर्जन से अधिक गांव में फसलों पर इल्लियों का अटैक देखने को मिला है। किसान ओमप्रकाश, रघुवीर राजपूत, विजय पंवार, पवन पंवार, राजू जाट का कहना हैं कि क्षेत्र में एक बार फिर 2017-18 के हालात देखने को मिल रहे हैं। इस दौरान तंबाखू इल्ली का प्रकोप खेतों में देखने को मिला था।
अब सरकार से ही आस
सोयाबीन फसल की दयनीय स्थिति होने के बाद अब किसान की आस सरकार पर टिकी हुई हैं। जिसके चलते किसान प्रतिदिन तहसील कार्यालय में पहुंचकर अधिकारियों के सामने फसलों की स्थिति को बयां कर रहे हैं। सरकार की और से अभी तक आधिकारिक रूप से फसलों के सर्वे को लेकर कोई निर्देश जारी नहीं हुए हैं।
इनका कहना है
मौसम के अनुकूल न रहने से फसल के बचाव के सारे प्रयास असफल हो रहे हैं। लेकिन सुबह शाम ठंडा मौसम में उपचार जारी रखें शायद यह असरकारक हो जाए। यदि मौसम का मिजाज बदलता है और तेज बरसात आती है तो सारे रोग अपने आप ही दूर हो जाएंगे। वी एस राज वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी भैरुंदा।
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