जाति और धर्म, मप्र की राजनीति के दो बड़े फैक्टर हैं। चुनाव तो इन पर आधारित होता ही है, लेकिन सरकार में भी धर्म और जाति को आधार बनाकर संतुलन साधने की बाजीगरी दिखाई जाती है। शनिवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार पर भी इस फैक्टर की छाया साफ दिखाई देती है। वजह अलग-अलग हैं, रीवा के राजेंद्र शुक्ला इसलिए मंत्री बनाए गए ताकि सीधी पेशाब कांड डेमैज कंट्रोल से नाराज विंध्य के ब्राह्मणों को साधा जा सके। बिसेन व राहुल लोधी को मंत्री बनाए जाने की वजह भी उनकी जाति ही है। वर्ना चुनाव से महज डेढ़ महीने पहले इस दरियादिली की जरूरत तो यूं भी नहीं थी। अगर होती तो रामपाल सिंह को सिर्फ कैबिनेट मंत्री के दर्जे से काम नहीं चलाना पड़ता। बहरहाल यहां विषय ब्राह्मण वर्ग का है। जिसे एक पार्टी विशेष मानती है कि ये उसकी जेब में हैं। यह अर्धसत्य हो सकता है। एक दौर था, जब प्रदेश की सियासत में इस वर्ग का दबदबा रहा। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश में ब्राह्मण वर्ग के करीब 60 लाख से अधिक मतदाता हैं, जो कुल वोटर्स की संख्या के दस प्रतिशत से अधिक है। चुनावी गणित के जानकारों की मानें तो प्रदेश की करीब 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। विशेषकर विंध्य में ब्राह्मण मतदाताओं की बाहुल्यता है। यहां की ज्यादातर सीटों पर चुनाव ही ब्राह्मण वर्सेज ठाकुर हुआ करता है। शायद यही वजह है कि रीवा को साधकर बीजेपी ने पिछले चुनाव में उसकी झोली भरने वाले विंध्य को साधने का जतन किया। एक दौर था, जब प्रदेश की सियासत में ब्राह्मण का दबदबा था। नवंबर 1956 में मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद साल 1990 तक पांच ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने लगभग 20 वर्षों तक शासन किया। राज्य के पहले मुख्यमंत्री ही कांग्रेस के पंडित रविशंकर शुक्ल थे। जबकि कांग्रेस के ही श्यामा चरण शुक्ल वर्ष 1990 में ब्राह्मण समाज से आने वाले प्रदेश के आखिरी मुख्यमंत्री थे। इस बीच में कांग्रेस के कैलाश नाथ काटजू और द्वारका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री रहे,जबकि 1977 में कैलाशचंद्र जोशी ने पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया। कमोबेश, यही स्थिति तब के मंत्रिमंडल की भी होती थी। वर्ष 1957 से 1967 तक कांग्रेस के आधे से ज्यादा विधायक उच्च जाति के थे। इनमें भी 25 फीसद से ज्यादा अकेले ब्राह्मण हुआ करते थे। वर्ष 1967 में 33 फीसदी विधायक ब्राह्मण समाज से थे। वर्ष 1969 में श्यामाचरण शुक्ल के 40 सदस्यीय मंत्रिमंडल में तो 23 मंत्री ब्राह्मण थे। 1980 में अर्जुन सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उस समय 320 की विधान सभा में 50 ब्राह्मण विधायक थे जो कि अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। 15 वीं विधानसभा की ही बात करें तो पिछले चुनाव में ब्राह्मण वर्ग से तीस विधायक चुने गए। इनमें बीजेपी से 18,कांग्रेस से 11 व सपा का एक विधायक शामिल है। सियासत में ब्राह्मणों को हाशिए पर लाने की शुरुआत 80 के दशक में हुई। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह जो सिर्फ कमलनाथ व पर्यवेक्षक रहे प्रणव मुखर्जी के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे,जबकि विधायक दल आदिवासी नेता शिवभानु सोलंकी के पक्ष में था। ऐसी ही स्थिति वर्ष 1993 में बनी,जब अर्जुनसिंह, सुभाष यादव को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन बने दिग्विजय सिंह। ने पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल का कद कम करने दो ब्राह्मण नेताओं को आगे बढ़ाया। कालांतर में यह नेता भी स्वयं को शुक्ल के मुकाबले स्थापित नहीं कर सके। लगातार सवर्ण नेतृत्व पर सवाल उठने पर 80 के दशक में ही महाजन आयोग बनाकर ओबीसी वर्ग को आगे बढ़ाने की सियासत शुरू हुई। ओबीसी के साथ ही आदिवासी व ठाकुर का भी गठजोड़ किया गया। इसे बाद के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी आगे बढ़ाया। 90 के दशक में श्रीनिवास तिवारी, सत्यव्रत चतुर्वेदी, राकेश चतुर्वेदी बड़े नेता के तौर पर उभरे लेकिन 20वीं सदी के अंतिम वर्ष में मप्र के विभाजन ने ब्राह्मण नेतृत्व को कमजोर किया और इसके बाद तो यह पूरे तरीके से हाशिए पर आ गया। इस तरह प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण पिछड़ते चले गए। मप्र में नई सदी अब तक बीजेपी की रही। लेकिन इसमें भी ब्राह्मणों को हाशिए पर रखते हुए ओबीसी नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया। नतीजतन, स्व. कैलाश जोशी, रघुनंदन शर्मा, प्रभात झा, अनूप मिश्रा, स्व. लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे स्थापित नेता भी उपेक्षा व बुजुर्गियत के कारण नेपथ्य में चले गए। चुनाव या मंत्रिमंडल में स्थान की बात करें तो उमा भारती मंत्रिमंडल में 3 गोपाल भार्गव, रमाकांत तिवारी व अनूप मिश्रा, गौर मंत्रिमंडल में 5 गोपाल भार्गव, रमाकांत तिवारी, अनूप मिश्रा, अर्चना चिटनिस व नरोत्तम मिश्रा। ब्राह्मण मंत्रियों की कैबिनेट में जगह मिली। इसके बाद के मंत्रिमंडल में भी यह संख्या वर्ष 2008 में 5, 2013 में 6 और 2020 में 3 तक सीमित रही, जो मंत्रिमंडल सदस्यों की कुल संख्या का करीब 8 से 9 फीसद ही है। जबकि वर्तमान मंत्रिमंडल में ही ठाकुर व ओबीसी सदस्यों की संख्या 29-29 फीसद, एसटी की 12 व एससी की 9 फीसद है। चुनाव में टिकट पाने के मामले में भी ब्राह्मण दावेदारों का कमोवेश यही हाल है। पिछले चुनाव में सपाक्स का जोर देखते हुए बीजेपी ने 230 में से 29, जबकि कांग्रेस ने 229 में से 30 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवारों पर भरोसा जताया। वहीं ठाकुरों के मामले में बीजेपी ने 33 तो कांग्रेस ने 32 को टिकट दिए।
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