पूरे 19 साल के बाद शुक्रवार को पुरूषोत्तम मास में महिलाओं ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर भगवान श्रीगणेश की पूजा-अर्चना की। वहीं सायं का चन्द्रमा के दर्शन कर प्रथम पूज्य गणराज से सुखमय जीवन की प्रार्थना की। इस विशेष मौके पर धार्मिक स्थलों के अलावा घर – घर चतुर्थी की पूजा हुई। इस दौरान महिलाओं ने संकष्टी चतुर्थी की कथा भी सुनी। साथ ही ऐसे खास मौके पर चतुर्थी की पूजा का महत्व जाना है।
अनोखा तीर, हरदा। 19 साल के बाद पुरूषोत्तम मास के पावन मौके पर जगह-जगह पूजन-पाठ एवं अनुष्ठानों का दौर जरी है। इस बीच पुरूषोत्तम मास अंतर्गत शुक्रवार को संकष्टी चतुर्थी के मौके पर महिलाओं ने भगवान श्रीगणेश की विशेष पूजा-अर्चना कर सुखमय जीवन एवं क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। इस दिन धार्मिक स्थलों के अलावा घरों में भी यह पूजा संपन्न हुई है। महिलाओं ने इसकी पहले से तैयारियां कर रखी थी। हालांकि इसी दिन कुछ समय के लिये भदरा का पहर रहा। किंतु पंडितों के मुताबिक भदरा चतुर्थी की पूजा में किसी तरह की बाधक नही है। बावजूद इन सब बातों को ध्यान में रखकर महिला श्रद्धालुओं ने अपना व्रत एवं उसकी पूजा को संपन्न किया है। इस बारे में पंडित मुरलीधर व्यास ने बताया कि पुरूषोत्तम मास में आई संकष्टी चतुर्थी का खासा महत्व है। इसे पहले यह योग वर्ष २००४ में बने थे। पंडित श्री व्यास ने बताया कि 12 माह में 12 चतुर्थी आती है। इनमें कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी एवं शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी इन दोनों तिथियों का विशेष महत्व रहता है। इस दिन महिलाओं ने निराहार रहकर भगवान लंबोदर की विधिपूर्वक पूजा की। वहीं शाम को चन्द्रमा के दर्शन एवं जल अर्पित कर पूजा का समापन किया।
पुरूषोत्तम मास का महत्व
उन्होंनें कहा कि श्रावण का महिना साथ ही पुरूषोत्तम मास में सभी मुहुर्त शुभ रहते हैं। चतुर्थी के मौके पर शुक्रवार को सुबह से ही दर्शन एवं पूजा का सिलसिला प्रारंभ हो गया था।
सुखमय जीवन की कामना
पंडित श्री व्यास ने बताया कि महिलाओं ने संकष्टी चतुर्थी की पूजा कर परिवार की खुशहाली एवं सुखमय जीवन की कामना की है। कई जगहों पर महिलाओं ने एकत्रित होकर संयुक्त रूप से पूजा की।
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