Skip to content
Monday, 2 November 2026
भोपाल

भोपाल का गो-काष्ठ अन्य राज्यों का भी बचा रहा वन एवं पर्यावरण

3 min read
Text Size:

देश में मशहूर हो रहा है भोपाल का गो-काष्ठ मॉडल

डॉ. सक्सेना ने बताया कि गो-काष्ठ के जलने से 24.80 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइन का उत्सर्जन कम होता है। नमी कम होने के कारण गो-काष्ठ जल्दी जल जाता है और आम की लकड़ी देर तक जलती रहती है। सामान्य लकड़ी से शव दहन को 8 से 9 घंटे लगते हैं, जबकि गो-काष्ठ से यह प्रक्रिया 4-5 घंटे में पूरी हो जाती है। सामान्य लकड़ी की खपत 4 से 5 क्विंटल के विरूद्ध गो-काष्ठ केवल ढ़ाई से 3 क्विंटल ही लगता है। हिन्दु मान्यता के अनुसार यह पवित्र होने के साथ सस्ता भी पड़ता है।

भोपाल के 10 श्मशान घाट में आमजन गो-काष्ठ का प्रयोग स्वेच्छा से करने लगे हैं। भोपाल ही नहीं दिल्ली, बनारस, कानपुर, नागपुर, मुम्बई, जयपुर, अमरावती, रोहतक, रायपुर, इंदौर, कटनी, छिंदवाड़ा, नासिक, प्रयागराज आदि शहरों में भी भोपाल के गो-काष्ठ का प्रयोग अंतिम संस्कार के लिये किया जा चुका है।

भोपाल गो-काष्ठ पूरे देश में एक मॉडल के रूप में स्थापित हो चुका है। केन्द्र शासन द्वारा राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर भोपाल मॉडल को आधार बनाते हुए गो-काष्ठ निर्माण और उपयोग के लिये दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं।

भोपाल में साढ़े 3 लाख क्विंटल गौ-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। इसमें से 80 हजार क्विंटल गो-काष्ठ होलिका दहन में उपयोग हुआ। गो-काष्ठ के एवज में लगभग 85 हजार पेड़ कटने से बचे हैं।

डॉ. सक्सेना की देख-रेख में बुधनी की वर्धमान इंडस्ट्रीज में केप्टिव पॉवर प्लांट में फेबरिक के निर्माण में ईंधन के रूप में गो-काष्ठ का प्रयोग हुआ। इससे 19 मेगावॉट की बिजली बनाई गई, जो बिल्कुल कोयले की तरह जली। गो-काष्ठ के उपयोग से 30 प्रतिशत प्रदूषण भी कम होता है। केप्टिव पॉवर प्लांट मं 135 टन प्रति घंटे क्षमता का बायलर है, जिससे अधिकतम 115 टन प्रति घंटे भाप का उत्पादन किया जाता है और 24 मेगावॉट के प्लांट में अधिकतम 19 मेगावॉट बिजली बनती है, जिसके लिये रोज 360 टन कोयला इस्तेमाल होता है। डॉ. सक्सेना द्वारा किये गये ट्रायल में मात्र 36 टन गो-काष्ठ का उपयोग किया गया। इससे भाप, बिजली और फेबरिक के उत्पादन में कोई अन्तर नहीं देखा गया। कंपनी 100 प्रतिशत तक गो-काष्ठ उपयोग पर विचार कर रही है।

135 Views
What do you think?

Leave a Reply