गणेश पांडे, भोपाल। अंतररा चौहान ष्ट्रीय चीता प्रोजेक्ट के अंतर्गत दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से कूनो राष्ट्रीय उद्यान श्योपुर लाए गए चीतों की हो रही लगातार मौतों के बाद प्रबंधन और वातावरण को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि क्या कूनो का वातावरण सूट नहीं कर रहा है? या फिर प्रबंधन में ही कहीं चूक हो रही है? भारत के एकमात्र चीता एक्सपर्ट डॉ. वायपी झाला को इस प्रोजेक्ट से क्यों दूर किया गया? कूनो नेशनल पार्क के डीएफओ प्रकाश वर्मा का कहना है कि चीता को यहां का आबोहवा सूट नहीं कर रही है। कूनो में गर्मी का तापमान भी अधिक रहता है और अत्यधिक उमस भी। उन्होंने बताया कि अत्यधिक उमस का चीता पर विपरीत असर पड़ रहा है। सूरज की मौत के लिए भी तमाम कारणों में से एक कारण यह भी बताया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि चीता के गर्दन में कॉलर आईडी लगा है। अत्यधिक उमस के कारण चीता अपनी गर्दन को रगड़ते है। वहीं उनकी गर्दन पर टिक्स नामक कीड़ा के कारण गर्दन पर बैठने और उसे रगड़ने के कारण गर्दन पर घाव होने लगे थे। वर्मा ने बताया कि यह समस्या अन्य चीता को झेलनी न पड़े इसके लिए नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के डॉक्टरों से दवाई ली गई है। अब उसे डांट गन से चीता को दिया जाएगा। सूरज की मौत के बाद मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक जेएस चौहान भी कूनो पहुंच गए हैं।
बाड़े में अधिक सुरक्षित हैं चीता
वन पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, वे बाड़ों के अंदर सुरक्षित हैं जहां तेंदुए या भेड़िये जैसे शिकारियों का कोई खतरा नहीं है। इसके अलावा, बाड़ों के अंदर भोजन की भी गारंटी है। उन्होंने कहा, खुले जंगल में सूरज की मौत तेंदुए से लड़ने के कारण हो सकती है। उन्होंने कहा उसकी पीठ और गर्दन के आसपास चोट के निशान थे। कूनो की निगरानी टीम ने सुबह करीब 9 बजे सूरज को मृत पाया गया।
एड्रियन टॉर्डिफ़ भारत सरकार के अफसरों से नाखुश
चीता परियोजना संचालन समिति के सदस्य प्रोफेसर एड्रियन टॉर्डिफ़, जो प्रिटोरिया विश्वविद्यालय में पशु चिकित्सा शैक्षणिक अस्पताल के निदेशक पिता प्रोजेक्ट से जुड़े भारत सरकार के अधिकारियों की कार्यशैली से खफा है। उन्होंने सूरज की मौत पर अफसोस जताया। उन्होंने बताया कि मुझे चीता परियोजना संचालन समिति की बैठक के बारे में सूचित किया गया था जो 14 जुलाई शुक्रवार को नई दिल्ली में होगी। मैंने वस्तुत: बैठक में भाग लेने के लिए कहा, लेकिन मेरे अनुरोध का कोई जवाब नहीं मिला। कुल मिलाकर दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के चीता प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोजेक्ट से जुड़े भारत सरकार के अधिकारियों की लापरवाही के कारण ऐसी स्थिति कूनो में निर्मित हो रही है।
डॉ. झाला को चीता प्रोजेक्ट से क्यों हटाया
देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान डब्ल्यूआईआई के पूर्व डीन और भारत में चीता एकमात्र विशेषज्ञ डॉ.वाईवी झाला को चीता परियोजना से अलग कर दिए जाने के बाद से सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि एनटीसीए के सदस्य सचिव एसपी यादव, डॉ.झाला को पसंद नहीं कर रहे थे। यही वजह रही डॉक्टर झाला को अलग कर चीता प्रोजेक्ट से एमपी कैडर के सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी राजेश गोपाल को जोड़ दिया। डॉ झाला को अफसोस है कि चीता परियोजना में उनका कार्यकाल कम कर दिया गया था। गोपाल वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट है किंतु चीता प्रोजेक्ट का ककहरा भी नहीं जानते हैं। समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए झाला ने कहा, कूनो में चीतों की मौत परियोजना की सफलता के लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। जिस चीज की तत्काल आवश्यकता है वह है अन्य की तैयारी चीतों की रिहाई के लिए स्थल। झाला ने कहा, भारत में चीता प्रजनन परियोजना को सफल बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उचित बजट आवंटन के साथ कूनो जैसी कम से कम तीन से पांच साइटों की आवश्यकता है।
Views Today: 2
Total Views: 144

