– रमेश सुगंधी
कवि व साहित्यकार, हरदा
प्रोफेसर आर.एस. यादव से मेरी मुलाकात या परिचय मेरे मित्र शिवलाल यादव के माध्यम से हुआ था। शिवलाल यादव घड़ीसाजी एवं फोटो फ्रेमिंग का काम करते है। प्रोफेसर यादव शिवलाल यादव के भांजे थे, इसलिए वह मुझे भी मामा कहने लगे। वह जब भी मुम्बई से अक्सर छुट्टियों में हरदा आते थे तो उनसे मुलाकात और बातचीत होते रहती थी। चूंकि मुझे पढऩे लिखने का शुरु से ही शौक रहा है तो मैं अक्सर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अजातशत्रु के लेख पढ़ा करता था। लेकिन तब तक मुझे पता नहीं था कि मैं जिन अजातशत्रु के लेख काफी उत्साह से पढ़ता हूं यह वही प्रोफेसर आरएस यादव है। उनकी रचनाओं में हास्य व्यंग्य मुझे बहुत पसंद आता था। जब मुझे पता चल गया कि जो मुझे मामा कहते है वही वास्तव में अजातशत्रु है तो मेरा उत्साह चौगुना हो गया। मैनें सोचा कि क्यों नहीं ऐसा ही कुछ लिखा जाए और मैनें कहानियां लिखना शुरु कर दिया। जब वह अजातशत्रु को बताई तो वो बहुत खुश हुए। उन्होंने लिखने के कुछ गुर बताए और मैं अजात मित्र के नाम से लिखने लगा। मैनें अपनी रचनाएं अखबार और पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भी भेजी जिसमें ७५ प्रतिशत नहीं छपी। लेकिन लिखना नहीं छोड़ा। फिर धीरे-धीरे कलम सही हुई और मेरी रचनाएं छपने लगी। हमारे साथ हरदा के अन्य साहित्यकार मित्र भी अक्सर बैठकर लेखन और पाठन पर बातचीत करते हुए विचार विमर्श किया करते थे। इसी दौर में हरदा के कवियों की गोष्ठियों में भी जाने का अवसर मिलने लगा। जहां मैं अपनी रचनाओं का पाठ करता था। इस दौरान हमने एक संस्था बनाई जिसका नाम नवचेतना साहित्य सदन रखा गया। जिसके मूल प्रेरणास्त्रोत अजातशत्रु थे। इस संस्था में चंद्रकांत, शिवशंकर वशिष्ट, श्रीकृष्ण टेमने और भी कवि थे। हम सभी ने इसी मंच के तहत लिखना शुरु किया और अन्य समाचार पत्र-पत्रिकाओं से भी इसी नाम से पत्राचार करने लगे। एक दिन सभी ने गोष्ठी में निर्णय लिया कि एक वार्षिक पत्रिका निकाली जाए। इस संबंध में चार-पांच बैठकें हुई। लोगों से रचनाएं बुलाकर यह कार्य प्रारंभ किया गया। सारे आर्टिकल एकत्र करने के बाद बाम्बे में प्रिंटिग कराना तय हुआ। प्रूफ रीडिंग के लिए प्रो. जीवितराम सेजपाल को नियुक्त किया गया। इस तरह पत्रिका प्रकाशन का कार्य पूरा हुआ। जब इसके विमोचन पर बात हुई तो बाम्बे के प्रोफेसर रामौतार चेतन का नाम तय किया गया। मैं और अजातशत्रु श्री चेतन से मिलने बाम्बे गए। उनके फ्लेट पर रंग नामक पत्रिका देखने को मिली। यह पत्रिका वार्षिक होती थी। इसके लिए चकल्लस नाम बाम्बे में एक वार्षिक कार्यक्रम होता है, जिसमें श्री चेतन जी को जाना था। परंतु हमारे निवेदन पर उन्होंने हरदा आना स्वीकार किया। इस तरह मारवाड़ी धर्मशाला हरदा में पत्रिका निष्ठा का विमोचन कार्यक्रम हुआ। इस तरह नवचेतना साहित्य सदन द्वारा निष्ठा पत्रिका का प्रकाशन काफी समय तक किया जाता रहा। जिसके पूर्णत: मार्गदर्शक अजातशत्रु ही रहे। अजातशत्रु जी के साथ मेरे वैसे तो अनेक संस्मरण है, लेकिन उम्र का तकाजा है कि अब लेखन नहीं बन पाता।
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