
अनोखा तीर, हरदा। ग्राम पलासनेर में रहने वाले रामविलास पटेल की रातों की नींद ही उड़ गई है। उनकी पककर तैयार हुई गेहूं की फसल में बांझपन आ गया है। जिसके कारण गेहूं की बालियों में दाना ही नहीं बैठा है और बालियां पूरी तरह सूखकर कटने को तैयार हैं। उनके खेत में यह कोई बीमारी का असर नहीं है, बल्कि खरपतवार नाशक का दुष्परिणाम है। अपनी मुख्य फसल गेहूं को बचाने के लिए रामविलास पटेल आज से ही नहीं, बल्कि जब से उन्होंने पारिजात इंडस्ट्रीज प्रायवेट लिमिटेड की कंट्रोलर नामक खरपतवार नाशक का अपने खेतों में उपयोग किया है, तभी से प्रयास कर रहे हैं। पूर्व सरपंच रामविलास पटेल ने बताया कि उन्होंने गेहूं की फसल पर ३५-४० दिन होने पर कंट्रोलर नामक दवाई का प्रयोग खरपतवार नाशक के रूप में लगभग २७ एकड़ गेहूं की फसल पर किया था। दवा का उपयोग करने के २-३ दिन बाद ही गेहूं के हरे-भरे पौधे सूखने लगे। तब उन्होंने इसकी शिकायत कंपनी के प्रतिनिधि को की। जिस पर प्रतिनिधि द्वारा कहा गया कि कई बार ऐसी शिकायतें आ जाती हैं, कोई दिक्कत नहीं है। आप नेनो यूरिया, जेबरेलिक एसिड का छिड़काव कर दें, आपकी फसल को कोई दिक्कत नहीं आएगी। कंपनी प्रतिनिधि की बात पर विश्वास कर हमारे द्वारा फसल को बचाने के लिए टानिक एवं यूरिया का उपयोग किया गया। तात्कालिक रूप में फसल में कुछ सुधार दिखा, उसमें बालियां भी आ गई, लेकिन अब उसमें दाना ही नहीं बना है। बालियां बांझ हो गई है। मैंने दूसरे अपने ४० एकड़ रकबे में भी गेहूं बोया है। घर ही का बीज सारे रकबे में उपयोग किया है। इस दवाई के कारण ही मेरी फसल बर्वाद हुई है। जिसके कारण मुझे लाखों का नुकसान हो गया है। इस संबंध में श्री पटेल ने बताया कि मैंने कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों को भी अवगत कराया था, जिन्होंने मौके पर पहुंचकर फसल का निरीक्षण किया। लेकिन उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि वह सिर्फ खानापूॢत करने आए हैं।
कृषि वैज्ञानिकों के बेतुके तर्क
मंगलवार को रामविलास पटेल की बर्बाद हुई फसल को देखने कृषि वैज्ञानिकों का दल पलासनेर पहुंचा था। उनके द्वारा मौके पर ही एक पंचनामा भी तैयार किया गया। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए तर्क ग्राम के उपस्थित ग्रामीणों के गले नहीं उतर रहे थे। कृषि वैज्ञानिकों का कहना था कि आपने जो ३०३ वैरायटी का गेहूं बोया है, वह अपने क्षेत्र के लिए अधिसूचित नहीं है। आपने क्यों बोया, इसी कारण से यह समस्या आई है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि ग्राम पलासनेर ही नहीं, बल्कि हरदा जिले में लगभग ५० प्रतिशत किसानों ने ३०३ वैरायटी का ही गेहूं बोया है, तो फिर एक किसान के खेत में ही यह समस्या क्यों आई है। कृषि वैज्ञानिक दवाई कंपनी को इस तरह से पाक साफ साबित करने में लगे हुए थे, कि जैसे पहले से ही कंपनी के अधिकारियों से इनकी तगड़ी सेटिंग हो गई है और यह उस कंपनी को बचाने के लिए ही खेत का दौरा करने आए हैं। जो किसान आज इस कंपनी की खरपतवार नाशक के कारण लाखों रुपए के नुकसान का भागी बन गया है, उस किसान की पीड़ा को लेकर इन अधिकारियों में कोई भी हमदर्दी नहीं दिखाई दे रही है। किसान रामविलास पटेल ने बताया कि यदि बीज वैरायटी और अन्य कारणों से मेरी फसल खराब होती तो लगभग ८० एकड़ में ही मैंने एक ही वैरायटी का गेहूं बोया था। वह सब खराब हो जाता। उन्होंने कहा कि वह इस मामले को कृषि मंत्री तक ले जाएंगे और इस गेहूं की फसल की विधिवत अनावारी कराकर उपभोक्ता फोरम में शिकायत करेंगे।
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