नाटक ‘संबोधन’ का किया मंचन

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अनोखा तीर, हरदा। राष्ट्रीय नाट्य समारोह की दूसरी संध्या पर अविराम नाट्य संस्था द्वारा नाटक संबोधन का मंचन किया गया। जिसमें मानवीय पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी का चित्रण देखने को मिलता है। संबोधन नाटक शुरू होता है , जब एक 22 वर्षीय बेटी अपने पिता से पहली बारमिल रही है। इससे पहले उसने सिर्फ अपनी मां से सुना है पिता के बारे में, पिता को यह नहीं पता है की ये उसकी बेटी है, सवाल जवाब का सिलसिला शुरू होता है तो अंजाने ही दोनों को समझ आता है कि जीवन की किताब को इतने नज़दीक से पढ़ लिया कि शब्द धुंधले हो गए .. एक दूसरे को इतना करीब ले आए थे की खुद को भी नहीं पहचान पाए। राज युवती को बताता है कि श्रद्धा रंगमच की अभिनेत्री है। उसके पास असीमित उड़ाने है वो अपने भविष्य और परिवार को लेकर कन्फ्यूज थी और राज समाजसेवी.. जिसे समाज को भी अपना परिवार समझा था, राज श्रद्धा से एक बेटी चाहता है। पर श्रद्धा अपना करियर बनाना चाहती है, दोनों अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहते है, पर कहीं रिश्तों का अहंकार या अधूरापन आड़े आ रहा था। इन्ही गुत्थियों को सुलझाते हुए दोनों का रिश्ता उलझ जाता है। दोनो की बेटी 22 सालों के बाद राज को मिलती है और बताती है की वो उसी की बेटी है। राज हैरान रह जाता है, जब वो बेटी के सामने पत्नी से मिलने की इच्छा जताता है तो वो बेटी उसे बताती है कि उसकी मां, अब इस दुनिया में नही है। राज जब यह सच सुनता है तो टूट जाता है, पुत्री अपने पिता के चेहरे पर उस दर्द को महसूस करती है, जिसमे उसने अपनी मां को जीवन भर देखा, उसे अपने पिता में भी एक सच्चा इंसान नजर आता है। पिता के मुख से एक विलाप के साथ कुछ शब्द निकलते है। किसी के मर जाने से अगर रिश्ते खत्म हो जाते तो दुनिया रिश्तों की आपाधापी में नहीं जी रही होती वो हमेशा जिंदा रहेगी मुझमे मेरे अस्तित्व की तरह । पिता के भीतर अपनी मां के लिए इतना गहरा प्रेम और जुड़ाव देखकर, बरसो से भरे ढेरो सवाल और गुस्सा आंसुओं के सैलाब में बह जाते हैं.. नाटक के अंत में पुत्री अपने पिता को पापा कहकर पुकारती है और एक और संबोधन का जन्म होता है। नाटक के दृश्य अत्यंत प्रभावोत्पादक थे। एक ही पात्र को अलग अलग भूमिकाओं में सुनील राज एवं आरती विश्ववकर्मा ने अपने अभिनय से लोहा मनवाया। आज हम थियेटर गु्रप भोपाल द्वारा गिरीश करनार्ड के नाटक ययाति का मंचन किया जाएगा। यह नाटक पौराणिक कथावस्तु को आधार बनाकर लिखा गया है। जिसका निर्देशन जाने माने निर्देशक बालेंद्र सिंह ने किया है।

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