जयराम शुक्ल

बिन पग चले सुने बिन काना

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साँच कहै ता/जयराम शुक्ल

लक्ष्मी मैय्या को जिस दिन से ये खबर लगी कि आर्यावर्ते भारतखण्डे देश में कोई महाधुरंधर अलौकिक शक्ति का अवतरण हुआ है और उसकी महिमा भगवान की भांति सर्वव्यापी होती जा रही है उस दिन से उनकी नींद गायब हो गई।

वे विष्णुलोक की प्रभुसत्ता के भविष्य को लेकर अज्ञात आशंका से कांप उठती थीं। लक्ष्मी मैय्या की समस्या का भान होते ही देवर्षि नारद क्षीरसागर पहुंच गए।

पूछा- माते आपकी परेशानी का कारण क्या है?
वे बोलीं- ज्यादा मत पूछ पुत्र, मृत्युलोक में किसी अलौकिक शक्ति का अवतरण हुआ है, जिसके बारे में एक न्यायाधीश महोदय ने बताया कि वह तुम्हारे प्रभु से ज्यादा सर्वव्यापी और ताकतवर हैै।

लक्ष्मी मैय्या बोलीं-पुत्र इन सब तथ्यों का पता तुम्हारे अलावा और कौन लगा सकता है।

नारद ने कहा- माते कुछ खर्चने पड़ेंगे सबकुछ मिल जाएगा। उस महाधुरंधर के अवतरण के बाद उसकी संहिता की यह पहली धारा है। चाहे उसके बारे में ही क्यों न कागज कोई निकालवाना हों, कुछ देने का दस्तूर है, आप उसे चढ़ावा भी कह सकती हैं।

लक्ष्मी मैैय्या बोली- क्या अपने चित्रगुप्तजी भी कुछ लेते होंगे?
नहीं माते- चूंकि यहां आपकी कृपा से प्रभु ने किसी को बेटी की शादी में दहेज और बेटे के एडमीशन में कैपिटेशन फीस देने पर प्रतिबंध लगा रखा है इसलिए लेनदेन का चलन यहां नहीं शुरू हुआ है।
माते आप चिंता न करेेंं मैं यूं गया और सबकुछ पता करके यूं आया।

नारद वीणा बजाते हुए ऐसे अंर्तध्यान हुए कि सीधे हस्तिनापुर पहुंचे। सोचा पहले घूमफिर कर आर्यावर्त का हाल जान लूँ फिर रिपोर्ट तैयार करू। वे वहां से मथुरा, काशी, अवंतिका होते हुए पाटिलपुत्र में प्रगट हुए जहां कभी लालू परसाद नाम के महापुरुष अपने सखी-सखों के साथ चारा चरा करते थे।

नारद जी ने राजधानी के सभी प्रमुख चारागाहों सैर की, लोगों से मिले, दफ्तरों में गए, लेले-देदे संहिता का पूरा पालन किया, जरूरी दस्तावेज जुटाए। वास्तविकता का जैसे-जैसे पता चलता गया वैसे-वैसे वे मुरझाते गए।

वे अनमने से विष्णुलोक लौट ही रहे थे कि एक कड़कदार आवाज ने उनके कदम रोक लिए।
– ऐ…. साधू रुक, तुझे चेक करना है।

वह शहर के एक थाने का दरोगा था।
नारदजी की कनपटी में रिवाल्वर सटाकर बोला- आजकल बाबा लोग बड़ी फ्राड़गीरी कर रहे हैं, चल अपनी आईडी निकाल।

नारद ने कहा-ये वीणा ही मेरी पहचान है, सम्पूर्ण जगत में मुझे इसी रूप में जानता है।

दरोगा बोला- तेरे जगत की ऐसी-कम-तैसी, पहले ये बता कि ये वायलिन कहां से चुराई है?

सकपकाए नारदजी ने कहा- ये तो ब्रह्माजी ने दी है। मैं चोर-वोर नहीं मुनि हू, मुनि।

दरोगा गरजते हुए बोला- जानता नहीं आदर्श आचार संहिता लगी है जब तक बरनी भर ‘अचार’ के लिए तेरा तेल नहीं निकाल लेता कुछ भी नहीं सुनूंगा।

चलो सिपाहियों इसके वायलिन की जप्ती बनाओं और तलाशी लो।

सिपाही जानते थे कि ये दरोगा अपनी बेटी के लिए वीणा जब्त करवा रहा है, वो म्यूजिक क्लास जाती है न।

एक सिपाही की नजर नारद के गले में पड़ी रुद्राक्ष की मालाओं पर गई। टीवी में वह एक बाबा को यह कहते हुए सुन रखा था कि रुद्राक्ष धारण करने से शंकरजी प्रसन्न होते हैं और मन चाहा वरदान देते हैं, सिपाही जब से सिपाही हुआ तब से ही उसे थानेदारी के सपने आने लगे थे। सो उसने माला उतरवाकर अपने जेब में रख ली।

नारद के पास सिर्फ लंगोटी बची। दरोगा को लगा कि अब इसे कस्टडी में रखने से क्या फायदा, सों यह कहते हुए नारद को छोड़ दिया कि जाओ याद करोगे कि किसी रहमदिल से पाला पड़ा था वरना जेल में ही सड़ते रहते।

कुछ और अनहोनी हो इससे पहले ही नारद वहां से विष्णुलोक के लिए भाग चले।

इधर नारद की मृत्युलोक यात्रा का पता सभी देवताओं को लग चुका था। वे सब नारद के आगमन का इंतजार कर रहे थे …तभी कहीं दूर नारदजी भागते हांफते आते हुए नजर आए।

हाथ में वीणा नहीं थी, तन में कपड़े के नाम पर सिर्फ लंगोटी। नारद की दशा देख कर लक्ष्मी मैय्या का दिल धक्क हो गया। चिंतातुर देवगण मृत्युलोक की उस धुरंधर अलौकिक शक्ति के बारे में जानना चाहते थे, जिसके बारे में कहा गया था कि वह भगवान की भांति सर्वव्यापी है।

देवताओं की सभा जुट चुकी थी। त्रिमूर्ति याानी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश विराजमान थे। नारद सीधे सभा में पहुंचे। बिना वक्त गवांए बोलना शुरू किया- मैं सीधे मृत्युलोक से आ रहा हूं अभी मेरे हाल पर मत जाइए, जो बोलता हूं सुनिए।

उस महापराक्रमी धुरंधर को लेकर लक्ष्मी मैय्या की चिंता सही है। मृत्युलोक में वह वाकर्ई भगवान से ताकतवर और सर्वव्यापी होता जा रहा है। अपनी यात्रा के दौरान न सिर्फ महसूस किया अपितु उसे भोगा भी है, मेरा हुलिया देखकर आप लोग अंदाज लगा सकते हैं।

भगवान के लिए आप लोगों ने जो परिभाषएं गढ़ी हैं वह उसके लिए भी लागू होती है। तुलसीदास ने लिखा- बिनु पग चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करै कर्म विधि नाना।। उस पर भी हूबहू फिट बैठती है।

गीता के अनुसार आप पशुओं में सिंह हैं तो वह चूहा है जो करोड़ों टन अन्न पल भर में चट कर जाता है। वृक्षों में आप पीपल हैं तो वह अमरबेलि है जो दूसरों को चूसकर फलता फूलता है।

आप इंद्र के बज्र हैं तो वह पुलिस का डंडा है। सभी गुण प्राय: आप से मिलते जुलते हैं और क्या-क्या बताएं।

आप मंदिरों में पूजे जाते हैं या कभी कभार अटके वक्त पर लोग याद कर लेते है, मंदिरों पर उसका पूरा कब्जा हो चुका है और वह चौबीसों घंटे भजा जाता है।

आप कण-कण में क्षण-क्षण में व्याप्त हैं इस पर अब शक है, वह पूरी तरह है यह सत्य है।

अब आगे कहने से जीभ लड़खड़ाने लगी है, क्या कहेंं अपनी लक्ष्मी मैय्या प्रभु को भी प्रिय हैं और…

नारद आगे कुछ कह पाते कि लक्ष्मी मैय्या चीखते हुए सभा में पहुंचीं… नहीं…नारद नहीं..।

सभा में सन्नाटा छा गया, ब्रह्माजी माथे का पसीना पोछने लगे, शंकरजी ने दुख के मारे चिलम सुलगा ली… प्रभु अपलक लक्ष्मी मैय्या को देख रहे थे ओर देवगण जड़वत हो गए।

… देवसभा में एक स्वर उभरा …ओ माई फ्राड..OMF।

संपर्क:8225812813

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