अनोखा तीर, मसनगांव। हरी सब्जियों के दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। जो सब्जियां आठ दिन पहले 25 से 30 रुपए किलो बिक रही थीं, वे अब 60 से 80 रुपए किलो तक पहुंच गई हैं। भिंडी, टमाटर, बैंगन, मैथी सहित मौसमी सब्जियों के महंगे होने से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों का बजट बिगड़ने लगा है। ठंड का मौसम शुरू होने से मुली, टमाटर, गाजर जैसी सब्जियों और सलाद वाली वस्तुओं की मांग बढ़ी है। बढ़े दामों का असर शादी-विवाह की तैयारियों पर भी पड़ रहा है। इस साल अधिक बारिश के कारण सब्जियों की बेलें खराब होने से लौकी, गिलकी जैसी सब्जियों की कमी बनी हुई है। सब्जी उत्पादक किसानों ने बताया कि अधिक बारिश की वजह से शुरुआती फसल नष्ट हो गई। अब नई फसल तैयार होने में एक से दो माह का समय लगेगा, जिसके चलते दामों में राहत की संभावना फिलहाल कम है।
पिछले साल सही भाव न मिलने से हुआ नुकसान
सब्जी उत्पादक किसानों के अनुसार, सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब एक साथ कई क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर सब्जियां बाजार में पहुंचती हैं, जिससे भाव गिर जाते हैं। पिछले साल टमाटर, बैंगन और मिर्च जैसी फसलों के उचित दाम नहीं मिलने से किसानों को भारी नुकसान हुआ था। हरदा के राजेंद्र राठौर और मसनगांव के राकेश पाटिल ने बताया कि बीते वर्ष उनकी टमाटर और मिर्च की फसलें अच्छी थीं, लेकिन मंडी में दाम न मिलने के कारण उन्हें घाटा उठाना पड़ा। इसी वजह से कई किसान इस वर्ष सब्जी लगाने से पीछे हट गए हैं। लागत वसूल न होने से किसान कर्ज में डूबे और इस बार मक्का, गेहूं जैसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सब्जियों के भंडारण की व्यवस्था न होने से भाव टूट जाते हैं
जिले में हरी सब्जी, आलू, टमाटर, लहसुन, प्याज और अदरक जैसी वस्तुओं के भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। ऐसे में किसानों को फसल आते ही तुरंत बाजार में बेचना पड़ता है। एक साथ बड़ी मात्रा में सब्जियों के पहुंचने से मंडी में भाव टूट जाते हैं। जो सब्जी इस समय 60 से 80 रुपए किलो बिक रही है, वही सीजन में 15 से 20 रुपए किलो तक रह जाती है। थोक में तो कई बार 8 से 10 रुपए किलो भी नहीं मिल पाता, जिससे किसानों को उम्मीद के अनुसार लाभ नहीं मिल पाता। इसी स्थिति को देखते हुए कुछ किसान सब्जियों की जगह दूसरी फसलों का विकल्प चुन रहे हैं, जिससे बाजार में सब्जियों की उपलब्धता कम होने पर दाम और बढ़ गए हैं।
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