श्री रामकथा – राम वनवास प्रसंग में छलक आई श्रोताओं की आंखें

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मुक्ति सस्ती और भक्ति महंगी है : श्रद्धेय मदनमोहन महाराज
 देश के कोने-कोने से संत, महंत और महात्मा का लग रहा मेला
अनोखा तीर, हरदा। नर्मदा के पावन तट पर स्थित हरदा वास्तव में यह शब्द ही हरि और हर का प्रतीक है। हर अर्थात् भगवान भोलेनाथ और हरि भगवान विष्णु को अपने में समाहित किए हरदा ह्रदय नगर है। ऐसी ह्रदय नगरी में श्रीरामकथा और वह भी संत समागम के बीच यह तो ऐसा लग रहा है जैसे कुंभ में संतों के आश्रमों के बीच कथा की जा रही हो। मैं जहां ठहरा हूं उस कमरे के चारों ओर भी सिवाय संत महात्मा के कोई नजर नहीं आता। गोस्वामी तुलसीदास जी से जब पूछा गया कि सबसे बड़ा सुख क्या है और दुख क्या है? तो उन्होंने कहा है कि दरिद्रता जैसा कोई दुख नहीं और संत मिलन जैसा कोई सुख नहीं। यहां दरिद्रता का अभिप्राय भौतिक सम्पत्ति से नहीं है बल्कि मानसिकता से है। भागवत पुराण में भी लिखा है कि ऐसे महापुरुषों के दर्शन मात्र से हमारे अध्यदूतों की निवृत्ति होती है। उक्त विचार वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने श्री रामकथा के प्रारंभ में व्यक्त किए। ब्रम्हलीन मस्तराम बाबा और ब्रम्हलीन त्रिलोचनदास जी महाराज की असीम कृपा से संत सानिध्य में चल रही ९ दिवसीय श्रीरामकथा का शुभारंभ मुंबई से पधारे महामंडलेश्वर बालयोगी श्री बालकदास जी महाराज एवं राजस्थान से पधारे संत श्री रामसेवक दास जी महाराज द्वारा श्रीरामचरित मानस ग्रंथ की पूजा कर किया गया। सातवें दिन की कथा का प्रारंभ शब्द ब्रम्ह के माध्यम से प्रभु आराधना करते हुए मेरे तो दो आधार सीताराम के चरणबिंद संगीतमयी कीर्तन से हुआ। कथावाचक श्री मदनमोहन व्यास जी महाराज ने कहा कि हमारा उपनिषद कहता है कि एक नाम एक ही रुप को अलग-अलग तरह से पूजा जाता है, माना जाता है, जाना जाता है और गाया जाता है। हम परमात्मा को अलग-अलग नामों से जाने यह हमारी श्रद्धा हो सकती है, लेकिन अलग-अलग माने यह अज्ञान है। एक को अनेक में दिखा देना विज्ञान है और अनेक को एक में दिखाना तत्वज्ञान है। उन्होंने कहा कि तुम्हारे जीने का तरीका ही तुम्हारी अवस्था बता देता है। जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है वह चलता, बोलता और व्यवहार कैसे करता है यह भगवत प्रेमी महात्माओं को देखकर पता चलता है। श्री व्यास जी ने मिथिला में प्रभु श्रीराम जानकी के विवाह उपरांत उनके विदाई के प्रसंग का आध्यात्मिक और धार्मिक वृतांत सुनाया। वहीं उन्होंने जानकी जी द्वारा श्रीराम के चरण न छूने वाले प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि जानकी जी ने श्रीराम के चरण क्यों नहीं छूए थे यह भी एक बड़ा संदेशवाहक विषय है। जानकी जी ने कहा कि जिन चरणों की रज से अहिल्या का उद्धार हुआ हो, उसे सद्गति मिली हो मैं भला उन्हें कैसे छू। मुझे सद्गति नहीं पति चाहिए। मैं मुक्ति नहीं भक्ति चाहती हूं। यहां श्री व्यास जी ने कहा कि सामान्य तौर पर व्यक्ति प्रभु से मुक्ति की कामना करता है। लेकिन भक्त मुक्ति नहीं भक्ति चाहता है। इसके लिए वह पुर्नजन्म की अभिलाषा भी रखता है। वास्तव में मुक्ति सस्ती है और भक्ति महंगी है। इसी बीच व्यास जी ने श्रीराम की अभी तक की जीवन यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विश्वामित्र मुनि के यज्ञ की रक्षा करना मन की शुद्धि है। अहिल्या का उद्धार करना बुद्धि की शुद्धि है और धनुष का टूट जाना अहंकार की तथा परशुराम का शरणागत होना चित्त की शुद्धि है। श्रीराम ने अपने इन कार्यों से समाज को जो संदेश दिया है वह वास्तव में आत्मसात करने वाला है। जब अंर्तकरण शुद्ध हो जाता है तो जनकराज भी कह उठते है कि मोहि कृत्य कृत्य किन्हीं दोई भाई। व्यास जी कहते है कि काम रस बड़ी बात नहीं है, राम रस के लिए आंतरिक यात्रा करना पड़ता है। जब भक्ति पकती है तो दो ही चीज बचती है- आश्रय और आंसु। गंगा के साठ मन पानी से ज्यादा महत्व रखते है भक्ति के आंसु। भक्ति के पौधे को समय-समय पर सत्संग से सिंचित करते रहना चाहिए। उन्होंने अयोध्या कांड के प्रसंग का वर्णन करते हुए राम के विवाह कर अयोध्या लौटने पर राजा दशरथ सहित राजदरबार और अयोध्या में जो खुशी का वातावरण निर्मित हुआ था उसका कथा सार के माध्यम से सुंदर वर्णन किया। वहीं राम वनवास वाले प्रसंग को लेकर कहा कि अक्सर व्यक्ति प्रकृति की भाषा को नजरअंदाज कर जाता है। वास्तव में प्रकृति हमें हर अवस्था के संकेत देती है। जब राजा दशरथ दर्पण देख रहे थे तो उन्होंने देखा कि कान के पास कुछ बाल पक गए है। तभी उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाकर श्रीराम को राजा बनाने का निर्णय लिया। ऋषि मुनि से शुभ मुहूर्त पूछा तो मुनि वशिष्ठ ने कहा कि ऐसे कार्य के लिए हर मुहूर्त शुभ है और अगले दिन ही राज्याभिषेक की घोषणा कर दी गई। यहां हमारे संत महात्माओं और विद्वानों ने भी कहा है कि काल करें सो आज कर आज करें सो अब पल में प्रलय होएगी बहुरी करेगा कब जैसी बातें लिखी है। वह चरितार्थ हुई और राजा दशरथ के जीवन में वह कल कभी नहीं आया जब वह राम का अभिषेक कर पाए। कथा को गति देते हुए श्री व्यास जी ने कहा कि जब कैकयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरो में भरत को राजा बनाने और राम को १४ वर्ष के लिए वनवास भेजने की बात कही तब यहां जिस मूल किरदार मंथरा का उल्लेख मिलता है वह आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। उन्होंने कहा कि ऐसी मंथराओं से बचकर रहने की आवश्यकता है, चूंकि उनके मरने का उल्लेख कहीं नहीं है। राम के राज्याभिषेक को लेकर देवताओं में खलबली मचना और जिस हेतु को लेकर श्रीराम का मानव अवतार हुआ है उसे पूरा करने के लिए राम का वन जाना आदि प्रसंगों का जिस मार्मिक शब्दावली में श्री व्यास जी ने कथा पाठ किया उसके चलते श्रोताओं की आंखों में आंसु छलक आए। उन्होंने कहा कि रामकथा जीना सिखाती है और भागवत कथा मरना। इस बीच उन्होंने समुद्र मंथन दौरान महादेव के विष पीने का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि काफी देर इंतजार के बाद भी भोलेनाथ को विष का कोई प्रभाव नहीं हुआ तब देवताओं ने पूछा कि महादेव आप पर विष का कोई असर नजर नहीं आ रहा है। महादेव ने कहा मेरे अंदर श्रीराम विराजमान है और ऊपर से जब मैनें विष पीया तो मेरे राम और विष का मिलन होकर मुझे विश्राम मिला है। इसी तरह इन संत महात्माओं ने भी अपने अंदर श्रीराम को विराजमान कर लिया है। साधु कभी अभाव में, प्रभाव में जीवन नहीं जीता वह अपने स्वभाव में जीता है और स्वभाव में जीना ही साधना है। अगर आपका उद्देश्य अच्छा है तो आपका भोजन भी भजन है। लोग मंदिर तक पहुंच जाते है, लेकिन मालिक तक नहीं। चूंकि वह मंदिर में भी भगवान को नहीं मूर्ति को देखते है और उसे मूर्ति ही मानते है। अगर वह भक्तिभाव से भगवान के स्वरुप को निहारे और जिस छवि को देखा है उसको अपने ह्रदय में बसा लें तो वह आत्मा भी परमात्मा स्वरुप हो जाएगी। इसी अज्ञानता का ज्ञान देती है श्रीराम कथा। परिस्थितियां कुछ भी हो मनोस्थिति ठीक होना चाहिए, वही महापुरुष कहलाता है। श्रीराम ने अपने हर कार्य से समाज को यही संदेश देने का प्रयास किया है। हमें उनके जीवन चरित्र से प्रेरणा लेना चाहिए। आप देखे जब कैकयी ने राजा दशरथ से अपने वचन लिए थे तब दशरथ ने अपने विश्वासपात्र सुमन को श्रीराम को बुलाने का संदेश लेकर भेजा था और जब सुमन श्रीराम के पास पहुंचे तो श्रीराम ने उनका पितातुल्य सम्मान किया था। इसी तरह जब रानी कैकयी ने श्रीराम को अपने वचनों के बारे में बताया तब श्रीराम ने उन्हें जननी संबोधित किया था। यह सारे प्रसंग बताते है कि हर परिस्थिति में मनोस्थिति को ठीक रखते हुए कैसे संयमित व्यवहार करना चाहिए। अक्सर हम लोग सत्संग या भजन के लिए यही कहते है कि अभी इन सबकी उम्र नहीं है। लेकिन भजन और सत्संग के लिए कोई उम्र नहीं होती। बल्कि यह जीवन का सार बताने वाली चीजें हमें जीवन जीना शुरु करने से पहले ही पढ़ना, सुनना और सीखना चाहिए तभी हम श्रीराम के बताए सद्मार्ग पर चलते हुए एक आदर्श स्थापित कर सकते है। रामकथा विश्राम के अवसर पर हुई आरती दौरान झालावाड़ मंडल गुजरात से पधारे महंत श्री महावीरदास जी महाराज, गुजरात लख्तर से पधारे महंत श्री रामदासजी महाराज, श्री राम के धाम अयोध्या से पधारे महंत श्री जगरामदास जी सहित हिमाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान आदि स्थानों से आए बड़ी संख्या में संत महात्मा मौजूद थे।

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