जिसके लिए सारा जग तरसता है यहां वह राम रस बरसता है

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अनोखा तीर, हरदा। श्रीराम कथा जिसके आयोजक भी सीताराम जी हंै और प्रायोजक भी सीताराम। वहां भला किस बात की कमी हो सकती है। करोड़पतियों की कल्पना से भी परे है यह आयोजन। प्रभु श्रीराम ने माध्यम बनाया है अपने ब्रम्हलीन मस्तरामदास जी त्यागी महाराज और ब्रम्हलीन त्रिलोचनदास जी त्यागी महाराज को तथा समूचे आयोजन की पंचभूत शरीर के साथ बागडोर सौंपी है। महाराष्ट्र मुंबई के महामंडलेश्वर बाल योगी बालकदास जी महाराज के हाथों में। जिनका हरदा से कभी कोई वास्ता ही नहीं रहा है। जब कभी भी आएं तो मस्तराम बाबा के आश्रम और वही सीताराम जी की नाम मस्ती में मस्त रहते हुए वापस चलें गये। मैं बात कर रहा हूं स्थानीय कच्छकड़वा पाटीदार भवन में चल रही नो दिवसीय श्रीराम कथा की, जिसके लिए शहर या जिले में कोई चन्दा वसूली करने नहीं निकला था। किसी एक का व्यक्तिगत आयोजन भी नहीं है। लेकिन सुबह आठ बजे संतों की भाषा में बालभोग और हमारी भाषा में नाश्ता, वह भी हर दिन तीन चार प्रकार के नवीन व्यंजनों का होता है। ग्यारह बजे तक बालभोग और उसके बाद भोजन प्रसादी का जो सिलसिला चलता है तो वह रात बारह बजे तक निरंतर जारी रहता है। हां इतना जरूर है कि दोपहर की भोजन प्रसादी शाम पांच बजे तक चलती रहेगी और उसके बाद शाम की दूसरी प्रसादी प्रारंभ हो जाती है। दोनों समय अलग अलग अनूठे व्यंजनों तथा मिष्ठान के साथ होती है जो साधारण तौर पर हमारे घरों में या ऐसे भंडारे में देखने को नहीं मिलती हैं। बड़े से बड़े परिवार में भी एक साथ 20 पीपे शुद्ध घी नहीं उठाया जाता। यहां जलेबी भी शुद्ध घी में बनाई जाती है। व्यासपीठ से निरंतर फल प्रसादी तथा हर दिन कथा विश्राम दौरान अलग-अलग तरह का व्यवस्थित प्रसाद वितरण किया जाता है। इन तमाम व्यवस्थाओं के चलते जिसके लिए सारा जग तरसता है वह राम रस यहां बरसता है। वह भी अनूठे अंदाज में, जिसमें केवल पुराणों में वर्णित गुरु वाणी ही नहीं बल्कि व्यासपीठ पर विराजमान वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक मदनमोहन व्यासजी महाराज द्वारा समाज में व्याप्त कुरीतियों, शासन व्यवस्था में व्याप्त खामियों के साथ ही एक आदर्श समाज और राष्ट्र की अवधारणा को लेकर शास्त्रोक्त बातें सहज भाषा शैली में कहीं जाती हैं। वास्तव में देखा जाएं तो प्रभु सीताराम जी द्वारा संतों के माध्यम से व्यासपीठ पर अपने पार्षद के रूप में श्री व्यासजी महाराज को विराजमान करते हुए दिशाहीन होते समाज को सदमार्ग पर चलने का हितोपदेश दिया जा रहा है। प्रभु चाहते हैं कि अभी भी समय है आप लोग कलयुग के कुप्रभावों से दूर होकर मेरी शरण में आ जाओ तथा मेरे बताए मार्ग पर चलते हुए अपना कल्याण करो। प्रभु इच्छा है कि मैंने तुम्हें जो मानव शरीर प्रदान किया है उसका सदुपयोग कर लो, यही बातें समझाने के लिए मैंने आप लोगों के लिए यह आयोजन रखा है। यहां हमें याद रखना चाहिए कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी विभीषण से हनुमान जी की मुलाकात को लेकर लिखा है कि अब मोहि भा भरोस हनुमंता, बिनु हरि कृपा मिलहि नहि संता। हरदा में इतने संतों का आगमन और संतों के द्वारा संतों के सानिध्य में श्रीराम कथा का आयोजन भी अप्रत्यक्ष नहीं बल्कि प्रत्यक्ष रूप से यही संदेश देता है कि प्रभु मिलन से पहले इन संतों के सानिध्य में प्रभु प्राप्ति का मार्ग समझ लो। वैसे भी जब हमें किसी दूसरे देश या क्षेत्र में जाना होता है तो कुछ जानकारों से वहां का सीधा मार्ग, वहां की रीति-रिवाज और अन्य जानकारी प्राप्त करते हैं, ठीक उसी तरह इन संतों द्वारा इस श्रीराम कथा के माध्यम से हमें तमाम जानकारियां दी जा रही है। अब भी अगर हम उन तक नहीं पहुंच पाते हैं तो यह हमारा दुर्भाग्य और कलयुग का प्रभाव ही माना जा सकता है।

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