पटाखा फैक्ट्री में भयाभय विस्फोट ने जहां कई परिवारों को डेढ़ दशक पीछे धकेल दिया है, वहीं इस अवैध कारोबार में संलिप्त दर्जनभर लोग असमय काल के गाल में समां गए। इतना ही नही, हादसे के वक्त अपनी जान बचाने में सफल कई लोगों के हाथ केवल जीवनभर का घाव लगा है। इन सबके बीच शासन-प्रशासन राहत राशि देकर प्रभावितों के जख्म भरने में जुटा है।
अनोखा तीर, हरदा। हादसे के समय हम करीब 18 लोग गोदाम के सबसे ऊपर वाले हॉल में काम कर रहे थे। जहां सुतली बम की फाइनल पेकिंग याने स्लीप चिपकाकर डिब्बे में जमाये जा रहे थे, तभी धमाकों की आवाज आने लगी। जिससे सभी लोग घबराकर भागने लगे। गोदाम के बाहर निकलते ही धमाकों ने जोर पकड़ लिया था। इधर-उधर भाग रहे मजदूरों को उड़ते पत्थरों से चोटलग रही थी। यह दर्द पीड़ित सहायता केन्द्र में प्रेमवती पति श्रीराम निवासी जिरूढ़ाना जिला बैतूल ने बयां किया। हादसे में प्रेमवती का सीधा हाथ फे्रक्चर हो गया है। हालांकि मुख्यालय स्थित एक निजी अस्पताल में प्रेमवती के हाथ का ऑपरेशन हो चुका है, जो कि सबसे जरूरी था। उसके पास मौजूद आयुष्मान कार्ड संपूर्ण इलाज में सहायक रहा। पति श्रीराम ने बताया कि बैतूल जिले में गुरवा पिपरिया के पास जिरूढ़ाना से कुल 17 मजदूर पटाखा फैक्ट्री में मजूदरी करते थे। कुछ लोग एक साल तो कुछ महिने चार महिने पहले यहां आए थे। हादसे के बाद 12 लोग वापस गांव लौट गए हैं। बाकि पांचों श्रीराम परते, प्रेमवती परते, शुक्कल इवने, सेवंती इवने और अलका पति गोरेलाल यहीं घायलों के साथ रूके हैं।
महिला का हाथ फ्रेक्चर, पुरूष चोटिल
चर्चा दौरान मजदूरों ने बताया कि हादसा दौरान भागते समय प्रेमवती का हाथ फे्रक्चर हो गया था। वहीं शुक्कल के उल्टे पैर में चोट आई है। अन्य तीन मजदूरों ने अंदरूनी चोट लगने की बात कही है। फिलहाल प्रशासन की तरफ से मिलने वाली सहायता से उन्हें आस बंधी है, ताकि काम के अभाव में महिने दो महिने का सहारा मिल जाए।
क्षतिपूर्ति राशि दे चुके, कार्रवाई जारी
राहत को लेकर एसडीएम केसी परते ने बताया कि शासन की ओर से राहत स्वरूप ५४०० रूपए मुआवजा दिया है। वहीं ५९ लोगों को शत प्रतिशत तथा 23 एवं 38 लोगों को उनकी क्षति अनुरूप सहायता मुहैया कराई है। आगे एनजीटी द्वारा राजेश अग्रवाल और सोमेश अग्रवाल की प्रापर्टी राजसात कर प्रभावितों को राशि वितरण की जाएगी।
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ओर बारूद के खेल में झोंक दिया
मुख्यालय से लेकर दूरस्थ गांवों तक बारूद का खेल यूं ही नही फैल गया। शहरी क्षेत्र की बात करें तो यहां मोटी कमाई या यूं कहें कि जरूरत के आगे विवश कई लोग सबकुछ जानकर भी इस अवैध कारोबार से जुड़े रहे। इन्हीं जरूरतों ने बारूद के खेल को घरोंघर पहुंचा दिया। फलस्वरूप एक-एक करके कईयों ने जान भी गंवा बैठे। बावजूद , बारूद के इस गोरखधंधे पर कोई अंकुश नही लगा। उसकी जड़े दूरस्थ ग्रामों तक फैल गईं। इसका मुख्य कारण दूरस्थ मजरे-टोलों के भोले भाले एवं गरीब ग्रामीणों को कामकाज से जोड़ना मुख्य आरोपियों के लिए फायदेमंद था। इन सबके बीच ज्यादातर मजदूर बारूद के दुष्परिणामों से अच्छी तरह वाकिफ नही थे। वहीं आपात स्थिति से निपटने में दक्ष भी नही थे, जो नियमों के विपरीत होने के साथ साथ नासमझ लोगों को जानलेवा काम में झोंक देने के बराबर है। मजदूरों के मुताबिक पटाखा फैक्ट्री में महिलाओं को 9 हजार रूपये तथा पुरूषों को साढ़े 10 हजार रूपये महिना मजदूरी देते थे। हर रोज जो भी काम बताया जाता था, उसे पूरा करते थे। जिरूढ़ाना से सबसे पहले शुक्कल इवने सहित अन्य मजदूर यहां आए थे।



