अनोखा तीर, हरदा। चुनावी साल में प्रदेश सरकार तमाम जतन करते हुए मतदाताओं के बीच अपनी छवि सुुधारने में जुटी हुई है। लेकिन सरकार के ही नगरीय प्रशासन विभाग की लचर कार्यशैली और अदूरदर्शिता के चलते आगे पाठ पीछे सपाट की स्थिति निर्मित होती जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जहां एक ओर नित नई योजनाओं और नवाचारों के माध्यम से भाजपा के पक्ष में वोट प्रतिशत बढ़ाने की कवायद कर रहे है तो वहीं प्रदेश के नगरीय निकाय आर्थिक तंगी से जूझते हुए जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहे है। समय रहते अगर सरकार ने इन हालातों को नहीं सुधारा तो आने वाले दिनों में जहां यह निकाय कंगाली के कगार पर पहुंच जाएंगे तो वहीं विकास की गति अवरुद्ध होने के कारण आने वाले चुनाव में भी सत्ताधारी दल को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उल्लेखनीय है कि नगरीय निकायों में कर्मचारियों के वेतन, सार्वजनिक विद्युत व्यवस्था तथा जल आपूर्ति में उपयोग आने वाली बिजली का खर्च एवं सफाई व्यवस्था में लगे वाहनों के डीजल इत्यादि की व्यवस्था इन्हें मिलने वाली चुंगी क्षतिपूर्ति राशि तथा १५ वें वित्त आयोग की राशि से की जाती है। अन्य कार्यों के लिए संस्था के स्थायी आय स्त्रोतों से तथा संपत्ति कर, जल कर इत्यादि स्थानीय करों के माध्यम से संपादित किया जाता है। इन संस्थाओं को दी जाने वाली चुंगी की राशि तथा १५वें वित्त आयोग की राशि संबंधित नगरीय निकाय की जनसंख्या के आधार पर प्रदाय की जाती है। यहां उल्लेखनीय पहलू यह है कि प्रदेश सरकार आज भी २०११ की जनगणना के आधार पर इन निकायों के लिए उपरोक्त मदों की राशि का निर्धारण करती है। जबकि बीते १२ वर्षों में जहां नगरीय क्षेत्रों की जनसंख्या में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं नए परिसीमन के तहत विभिन्न नगरीय निकायों में शहरी सीमा से जुड़ी ग्राम पंचायतों को भी नगरीय निकाय का ही हिस्सा बना लिया गया है। जिसके चलते ऐसे निकायों की जनसंख्या स्वत: ही बढ़ गई है। बावजूद इसके नगरीय प्रशासन विभाग द्वारा १२ वर्ष पहले की जनसंख्या के मापदंड पर उपरोक्त राशि निर्धारित करते आ रहा है। इतना ही नहीं बल्कि बीते ७ वर्षों से इन मदों में की जाने वाली १० प्रतिशत की वृद्धि भी रोक दी गई है। जानकारी के अनुसार नगरीय निकायों को प्रतिमाह दी जाने वाली चुंगी की राशि का भुगतान भी माह के प्रथम सप्ताह में किए जाने के बजाय अंतिम सप्ताह में किया जाता है। उसमें भी संपूर्ण राशि का भुगतान न करते हुए प्रतिमाह कटौती की जाती है। पिछले वित्तीय वर्ष में की गई कटौती का जहां करोड़ों रुपया इन निकायों का शासन से लेना बकाया बना हुआ है, वहीं बीते ४ माह से १५ वें वित्त आयोग की राशि का भुगतान भी प्रदेश के नगरीय निकायों को नहीं किया गया है। कैसी विडम्बना है कि जहां एक ओर प्रदेश सरकार स्वयं नगरीय निकाय के कर्मचारियों को दैनिक वेतनभोगी से स्थायी कर्मचारी बनाने का आदेश जारी करती है तो ७वां वेतनमान लागू कर कर्मचारियों के वेतन में इजाफा करती है। वहीं इन संस्थाओं को दी जाने वाली चुंगी और १५ वें वित्त आयोग की राशि में कोई इजाफा नहीं करती। जिसके चलते आज प्रदेश के लगभग सभी स्थानीय निकाय आर्थिक तंगी से जूझ रहे है। चूंकि इन संस्थाओं को शासन की विभिन्न योजनाओं में भी अपनी ओर से अनुदान राशि दिया जाना होता है ऐसी स्थिति में वित्तीय संकट के दौर से गुजरती यह संस्थाएं उन जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन भी नहीं कर पा रही है जिसमें इन्हें अपनी अनुदान राशि प्रदान करना है। हालात यह है कि शहरी क्षेत्रों में रोजमर्रा के आवश्यक कार्य भी सुव्यवस्थित रुप से संचालित नहीं हो पा रहे है। जिसके चलते नगरीय क्षेत्र की जनता सीधे तौर पर स्थानीय व प्रादेशिक सत्ताधारी दल से खफा होते जा रही है। ऐसी स्थिति में सत्ताधारी दल भाजपा और प्रदेश सरकार द्वारा चुनाव को दृष्टिगत किए जाने वाले वह तमाम प्रयास जमीनी स्तर पर आकर असफल साबित हो जाएंगे। सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश के तमाम शहरी क्षेत्रों की विकराल रुप लेती इस समस्या का समय रहते समाधान किया जाना चाहिए। अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब या तो अधिकांश नगरीय निकायों में तालाबंदी की स्थिति निर्मित हो जाएगी या वहां के पार्षद, परिषद और जनता आक्रोषित होकर सरकार के विरूद्ध बड़ा जनआंदोलन करने पर विवश।
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