सक्रिय हो गए राजनैतिक इन्वेस्टर्स

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थ्री पी की चाहत में पकडऩे लगे मैदान

– प्रहलाद शर्मा

प्रदेश में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। जिसके चलते भूतपूर्व हो चुके नेता भी अपनी सक्रियता दिखाते हुए दड़बों से बाहर आने लगे है। उन्हें सत्ता सुंदरी के सपने रात-दिन सता रहे है। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं कि जनता के बीच उनकी व्यक्तिगत छवि कैसे है या वह अब समय अनुकूल प्रासंगिक है अथवा अप्रासंगिक हो गए। वर्षों से जिस राजनीतिक दल का बैनर थाम कर कई मलाईदार पदों पर रहने के बावजूद आज उन्हें अपने ही दल की रीति नीति और नेताओं में खोट नजर आने लगी है। कल तक जिन्हें अपने आदर्श मानते हुए पार्टी को माँ की संज्ञा देते थे आज उसी आदर्श का अपने राजनैतिक स्वार्थ की प्रतिपूर्ति के लिए अनादर करने में भी नहीं चूक रहे है। स्वयं के सक्रिय राजनीति में रहते हुए चाहे इन्होंने आम जनता की समस्याओं को कभी गंभीरता से न लिया हो, लेकिन आज जब उम्रदराज होकर या जनता द्वारा नकारे जाने के पश्चात अथवा अपने ही दल द्वारा विश्राम का रास्ता दिखाए जाने पर वह जनता के हमदर्द बनकर सामने आ रहे है। स्वयं का प्रभाव चाहे ऐसा न रहा हो कि अपने वार्ड का पार्षद या पंचायत का सरपंच जितवा सके लेकिन आज जो नेतृत्वकर्ता पार्टी को वटवृक्ष बनाने के लिए जुटे है उनके कार्यों में कमी और उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े करना अब इन श्रीमानों की नियति बन गई है। इस तरह के भूतपूर्व श्रीमान लगभग सभी दलों में पाए जाते है। लेकिन सत्ताधारी दल में यह बहुतायत में होते है। चूंकि मध्यप्रदेश विधानसभा का चुनाव अब नजदीक आ रहा है और ऐसी स्थिति में हर दिन किसी न किसी कोने कुचड़े से यह दहाड़ मारने की कवायद करते दिखाई दे रहे है। फिर चाहे वह जिसे दहाड़ समझ रहे है वह जनता की नजर में मिमियाना ही हो। ऐसा लगभग हर चुनाव के समय होता आया है। फिर चाहे स्थानीय निकायों के चुनाव हो या विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में वार्ड, मोहल्लों तथा सीमित क्षेत्रों में अपनी पहचान रखने वाले यह श्रीमान बरसाती मेंढक की तरह अचानक प्रगट हो जाते है। आम जनता इनकी उन राजनैतिक चालों को नहीं समझ पाती है जिस हेतु के लिए यह सक्रिय होते है। जनता के समक्ष वह ऐसा ताना बाना बुनते है जिससे यह प्रतीत हो कि वर्षों तक जिस दल के लिए इन श्रीमान ने संघर्ष किया आज उन्हें हासिए पर लाकर डाल दिया गया है। वह जनता की भावनात्मक सहानुभूति बंटोरने का कार्य करते है। जबकि वास्तव में यह राजनैतिक इन्वेस्टर्स होते है, जो अल्पकालीन इन्वेस्ट कर बड़ा लाभ अर्जित करना चाहते है। चूंकि वह पहले किसी न किसी राजनैतिक दल के बैनर तले निर्वाचित होकर या मनोनीत होकर किसी मलाईदार पद पर रह चुके है। सत्ता का स्वाद चख चुके है। इस दौरान उन्हें यह भली भांति ज्ञात हो चुका है कि पद पर रहकर किस-किस तरह से मलाई खाई जा सकती है। उन्होंने अपने पदासीन रहते इतना तो अवश्य अर्जित कर ही लिया है कि स्वयं और उनकी कुछ पीढिय़ां आराम से जीवन बसर कर सकती है। लेकिन श्रीमान की दाढ़ को पद पर रहते जो स्वाद लग गया वह भला कैसे चैन से बैठने दें। यही कारण है कि चुनाव के समय वह पार्टी और जनता के ऐसे हमदर्द बनकर सामने आते है जैसे उन्हीं के कंधों पर सवार होकर पार्टी आज यहां तक पहुंची हो अथवा जनता उनके बगैर स्वयं को अनाथ महसूस कर रही हो। यह भूतपूर्व श्रीमान इस दौरान ऐसा इन्वेस्ट करते है जिसकी भनक भोली भाली जनता को नहीं लग पाती है। अपनी दावेदारी का दंभ भरते हुए वह जनता के बीच हर उस अवसर पर सक्रिय आने लगते है जिससे उनकी चर्चाएं आम हो। इस दौरान वह निरंतर जनता के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए सार्वजनिक और धार्मिक आयोजनों में भी बगैर बोले वह आर्थिक सहयोग प्रदान करने या उस आयोजन का पूरा बीड़ा ही अपने सिर उठाने से भी नहीं चूकते जिसके लिए पद पर रहते हुए उन्होंने कभी फूटी कौड़ी भी न दी हो। प्रत्येक समाज के आदर्श महापुरूषों और ईष्टदेवों को इतनी आस्था और श्रद्धा के साथ मानने या पूजने का प्रदर्शन करते है जैसे वह वर्षों से उनके अनुयायी हो। वास्तव में चाहे श्रीमान के जन्मदाता खुद अभावों का जीवन यापन करते हुए अपने तथाकथित कपूत के नाम पर अकेले में आंसू बहाते हो। आम जनता को तो इन श्रीमान की सक्रियता और यह आस्था के वशीभूत नजर आता स्वरुप प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में श्रीमान के स्वर्णिम काल में जो अनुयायी किसी न किसी रुप में उपकृत हुए थे वह पुन: सक्रिय हो जाते है। उन्हें लगता है कि भाईसाहब या श्रीमान फिर पॉवर में आने वाले है। लम्बे समय से जिन भाईसाहब या श्रीमान की तस्वीर किसी राजनैतिक या सार्वजनिक आयोजनों के बैनर पोस्टरों में लगाना भी मुनासिब नहीं समझते थे अब उन्हीं के बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर उनके अटूट समर्थक होने का प्रदर्शन किया जाने लगता है। श्रीमान अपने क्षेत्र में व्याप्त इस सक्रियता और तथाकथित लोकप्रियता को सोशल मीडिया तथा मीडिया के माध्यम से प्रचारित कराते हुए अपने राजनैतिक आकाओं तक पहुंचाने में सफल हो जाते है। ऐसी स्थिति में श्रीमान के भूतपूर्व होने के पश्चात जो पार्टी की दूसरी पीढ़ी पॉवर में आकर पदासीन होती है उसे कहीं न कहीं अपने रास्ते में भूतपूर्व श्रीमान की सक्रियता खटकने लगती है। चूंकि वर्तमान श्रीमान जिस दल का ध्वज थामे है कभी भूतपूर्व भी उसकी सक्रिय कड़ी हुआ करते थे। इसलिए वह उन तमाम घर घाट और चालाकियों से भली भांति वाकिफ है जिसका उपयोग वर्तमान श्रीमान द्वारा किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में संबंधित दल के शीर्ष नेतृत्व और क्षेत्र के वर्तमान श्रीमान द्वारा इन भूतपूर्व श्रीमान की मान मनौव्वल की जाने लगती है। चूंकि जनता के बीच यह संदेश जाने से भी रोका जाना है कि संबंधित दल द्वारा अपने ही दल के वरिष्ठ की अवहेलना की जा रही है या उसका अनादर किया जा रहा है। इसलिए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जब मनाने की कवायद करता है तो यह भूतपूर्व श्रीमान स्वयं अथवा अपने उत्तराधिकारी के लिए कोई न कोई पद का प्रस्ताव रख देते है। फिर चाहे वह राजनैतिक दृष्टि से संगठन में कोई पद हो अथवा किसी निगम मंडल में नियुक्ति जैसा प्रस्ताव हो। इसी के साथ संगठन द्वारा जिसे उम्मीदवार बनाकर चुनाव मैदान में उतारा जाता है उसे भी यह हिदायत दी जाती है कि वह संबंधित भूतपूर्व श्रीमान से संपर्क कर उन्हें संतुष्ट कर दें। बस यही इनके द्वारा वह राजनैतिक इन्वेस्ट कई गुना लाभांश के साथ इन्हें अर्जित हो जाता है। यह अपना समर्थन देने या मौन रहने के नाम पर उन तमाम धार्मिक, सामाजिक आयोजनों तथा क्षेत्र में अपनी सक्रियता के दौरान अपने कार्यकर्ताओं और दौरा कार्यक्रमों पर किए गए खर्चों का बढ़ा चढ़ाकर पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत कर देते है। अब चूंकि वर्तमान श्रीमान को अपने रास्ते के इस कांटे को दूर करना है तो उनकी इन शर्तों को भी स्वीकार करना ही होगा। इसलिए वह भूतपूर्व श्रीमान का बहीखाता क्लीयर करने के लिए उनके द्वारा बताई गई उन समूची सूची को सहज स्वीकार कर लेते है। यह राजनीति में शार्ट टर्म इन्वेस्ट का सबसे बेहतरीन तरीका होता है। जिसका दौर अब प्रदेश की राजनीति में शुुरू हो चुका है। हम अगर अपने इर्दगिर्द नजर दौड़ाएंगे तो ऐसे राजनैतिक इन्वेस्टर हमें सहज ही नजर आने लगेंगे जिन्हें हम आगामी विधानसभा का प्रबल दावेदार मान रहे है। वास्तव में यही राजनीति की थ्री पी है पद, पैसा और पॉवर जिसके लिए अपनी दावेदारी के साथ यह भूतपूर्व श्रीमान अब मैदान में नजर आने लगे है। अगर इनकी सक्रियता और इनके शार्ट टर्म निवेश के तहत राजनीति के खेत में बोई गई फसल पर कहीं ओले पडऩे का खतरा मंडराता नजर आता है तो इन श्रीमान के लिए इस दल की रीति नीति और नेता जनविरोधी और भ्रष्टाचारी नजर आने लगते है। जिसके चलते वह अपनी उपरोक्त आर्थिक आकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति के लिए दूसरे दल के प्रति अटूट निष्ठा के साथ दल बदलने से भी कोई गुरेज नहीं करते। वास्तव में इन राजनीतिक श्रीमानों की न तो दल के प्रति कोई निष्ठा होती है और ना ही जनता के प्रति। यही कारण है कि अब चुनाव जनबल पर नहीं धनबल पर लड़ा जाने लगा है। मतदाताओं के समक्ष क्षणिक लाभ का ऐसा मायाजाल बिछाया जाता है जिसके प्रभाव में आकर मतदाता भविष्य को भूल जाते है। सत्ता सुंदरी का वरण करने के बाद भाईसाहब, श्रीमान और माननीय बन जाते है, वहीं जनता बेचारी।

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