बच्चों की उम्र और उम्मीद पर जिम्मेदारी हावी

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कानून के अनुसार 14 साल से कम आयु के बच्चों को किसी व्यवसाय या काम धंधे में नियुक्त करना अथवा किसी तरह का श्रम करवाना अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसा पाये जाने पर संबंधितों के विरूद्ध कठोर कार्रवाई करने का प्रावधान भी है। इसके बावजूद यहां लोग नियमों का उल्लंघन करने से बाज नही आ रहे हैं। वे अब भी कम आयु के बच्चों को अल्प मानदेय का झांसा देकर मजदूरी करवा रहे हैं।

अनोखा तीर, हरदा। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर जहां पूरा देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, वहीं दूसरी ओर बाल श्रम से देश को मुक्ति नहीं मिल पाई है। वर्तमान समय में भी 14 साल तक के बच्चे ठेले, होटल, रेस्टोरेंट और दुकानों में काम कर अपना बचपन खो रहे हैं। सरकारी और सामाजिक स्तर पर बाल श्रम को रोकने के लिए लगातार जागरूकता अभियान जारी है। बावजूद इस पर अंकुश नहीं लग पाया है। उल्लेखनीय है कि बाल श्रम निषेध कानून बनने के 36 साल बाद भी बाल मजदूरी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। हाल यह है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में बालश्रम के विरूद्ध चलाए जा रहे अभियान नाकाफी साबित हो रहे हैं। ऐसा ही कुछ हाल हरदा जिला मुख्यालय पर देखने को मिलेगा। जहां बेखौफ होकर कम उम्र के बच्चों को काम थमाया जा रहा है। हैरानी की बात यह कि शिक्षित व जागरूक नागरिक ये सब देखकर चुप्पी साधे हुये हैं। इसके पीछे कहीं ना कहीं बच्चों के दो जून की रोटी का मामला इस कृत्य पर पर्दा डाल देता है।

– दृश्य एक

शहर के घंटाघर बाजार क्षेत्र में संचालित दुकान पर एक नही दो-दो बच्चें काम कर रहे हैं। जिनके हाथ सुबह से लेकर शाम तक बंद नही रहते हैं। इस बच्चों को देखकर ग्राहकों के मन में ये ख्याल जरूर आता है कि जिम्मेदारी या यू कहें कि मजबूरी उम्र और उम्मीद दोनों पर हावी है।

– दृश्य दो

यह नजारा शहर के नारायण टॉकीज चौक के आसपास दिखेगा। जहां चाय की गुमटी व ठेलों पर छोटे-छोटे बच्चें काम करते हैं। दिनभर में कई लोगों को चाय परोसते हैं। ऐसे समय उनकी उम्र एवं काम के प्रति तत्परता हर कोई को हैरान कर देती है।

 

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