शैलेन्द्र कुमार, नर्मदापुरम। जिले में रबी और खरीफ के सीजन के बीच गर्मी के दिनों में तीसरी नकद फसल का विकल्प बन चुकी ग्रीष्मकालीन मूंग कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से जहरीली होती जा रही है। मूंग जिसे पोषक तत्वों का खजाना भी कहा जाता है। अब अंधाधुंध और असंतुलित कीटनाशकों के इस्तेमाल के चलते जहर बनती जा रही है। जिससे जमीन भी खराब हो रही है। ज्ञात हो कि जिले में इस वर्ष ग्रीष्म कालीन मूंग का रकबा बीते वर्ष 2022 की तुलना में करीब 62295 हेक्टेयर अधिक बढ़ा है। इस बार 2023 में मूंग की फसल की बोवाई करीब 2 लाख 95 हजार हेक्टेयर में होने का लक्ष्य रखा गया है। ग्रीष्म कालीन मूंग की फसल लेने में जिला नर्मदापुरम प्रथम स्थान पर है। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जा सकता कि जिस मूंग दाल को सबसे पौष्टिक माना जाता है, वो अब जहरीली होती जा रही है। अधिकतम उत्पादन लेने के फेर में अधिकतर किसान कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। किसानों ने बताया कि पूरी फसल को 2 महीने में पकाने के लिए चार बार और 12 घंटे में सुखाने के लिए एक बार कीटनाशक का छिड़काव करना पड़ता है। इससे फसल का दाना तो हरा बना रहता है, लेकिन वो हार्वेस्टर से आसानी से कट जाती है। कृषि वैज्ञानिक इस फसल को स्वास्थ्य के लिए सही नहीं बता रहे हैं। वहीं किसानों का दावा है कि मूंग के पत्ते नरम और हरे होने के कारण इनमें इल्लियों का प्रकोप सर्वाधिक होता है। जो फसल को 50 प्रतिशत से अधिक तक तबाह कर सकती हैं। इसलिए दवा का छिड़काव करना जरूरी होता है।
2 लाख 95 हजार हेक्टेयर है रकबा
अप्रैल से मई के बीच बोई जाने वाली मूंग का वर्तमान रकबा जिले में करीब 2 लाख 95 हजार हेक्टेयर है। जिससे अच्छा उत्पादन होने का अनुमान है। दरअसल किसान जल्द पकने वाली और बेहतर उत्पादन के चलते अप्रेल से मई के दौरान खेतों और जमीन को आराम देने की बजाए मूंग की फसल उगाने लगे हैं। इन दिनों फसल को कीट व्याधियों से बचाने से लेकर चिलचिलाती गर्मी में हरी भरी बनाए रखने और अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए मूंग की बुआई से लेकर कटाई तक महज दो माह में 4 से 6 बार तक कीटनाशकों का जमकर उपयोग करते हैं। जिससे भीषण गर्मी में भी हरी भरी और लहलहाती नजर आती है। किसान कीटनाशकों का दुष्प्रभाव जानते हैं इसलिए इसका उपयोग स्वयं वे अपने परिवार के लिए नहीं करते।
इनका कहना है…
मूंग की फसल में कीटनाशकों का बहुत इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे उत्पादन तो बढ़ सकता है लेकिन क्वालिटी प्रभावित होगी। अभी तो फसल आने में देरी है लेकिन अगर अंतिम 20 दिन तक कोई छिड़काव न हो तो जो इम्पेक्ट हैं वे शून्य हो जायेंगें पूरा असर तो नहीं जाएगा। हानिकारक प्रभाव कम हो जाएगा। बीते वर्ष भी इसकी जांच की गई थी।
-केके मिश्रा, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, नर्मदापुरम
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