– नवीन उपाध्याय
ब्यूरो-यूएनआई

बड़े भैया के साथ हरदा में पुराने घर के ओटले पर बैठकर उनकी लंबी गुफ्तगु होती, जिसका मैं साक्षी भी रहा,उनकी सहज-सरल और विनम्र प्रवृति से यह जाना कि व्यक्ति को सफलताऐं और उपलब्धियां बड़ा नहीं बनाती, उसकी संवेदना और संस्कारों में रची बसी सोच उसे महान बनाती हैं।
अजातशत्रु जी की साहित्यिक यात्रा बड़ी अद्भुत और रोमांचक रही है। हर विषय पर उन्होंने बड़ी बेबाकी से मुखर होकर अपनी राय व्यक्त की है। अखबारों में हर तरह के संदर्भो में उनके लेखन को मैं बड़ी उत्सुकता से पढ़ता रहा हूँ। यहाँ विशेष रूप से जिक्र करना चाहूंगा स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी का जिन पर नईदुनिया में उन्होंने अद्भुत आलेख लिखें। लताजी के कंठ से निकले सुरों और राग-रागनियो पर उन्होंने बड़ा जीवंत लिखा है। लताजी की संगीत साधना को शब्दों के मार्फत उन्होंने जो अभिव्यक्ति में पिरोया वो बेमिसाल है। लताजी पर मैंने भी स्टोरी की हैं, विशेष कर लताजी और मदनमोहन की जुगलबंदी पर। संगीत और सुरों की गूंज को शब्दों के आवरण में ढालना बड़ा दुरूह और दुष्कर कार्य है। ये जहां शब्दों के सामथ्र्य की अग्नि परीक्षा है, वहीं लेखक के सृजन के पैमाना का आंकलन।
अजातशत्रु जी के शब्दकोष और उनके लेखन की बारीकियों पर जानें कितनी किताबें आकार ले सकती हैं। उनको पढऩा और सुनना जितना सुखद है उससे कहीं अधिक आनंद उनके सानिध्य में है। उनकी उदारता, संजीदगी और सहजता एक कर्ममय व्यक्तित्व की सार्थक परिभाषा को रेखांकित करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के हिमालयी पड़ाओ अनवरत यूँ ही इतिहास रचते रहें, उनका सानिध्य और सृजन सदैव हमारा पथ प्रशस्त करता रहे।
आज 5 मई को उनके सुखद जन्मदिवस पर आत्मिक बधाई और शुभकामनाएँ। जीवन का हर पल खुशियों की बयार लेकर आए, प्रण जीवंत रहें, संकल्प सार्थक हो। अनंत-अशेष मंगल-कामनाएं दादा।
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