मध्यप्रदेश गठन के बाद …

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हरदा विधानसभा पर रहा कांग्रेस-भाजपा का बराबर कब्जा

– बीते 30 वर्षों में मतदाता तो बढ़े लेकिन भाजपा का वोट प्रतिशत घटा

हरदा विधानसभा क्षेत्र में पिछले 50 वर्षों में 1 लाख 66 हजार 584 मतदाताओं की वृद्धि हुई है। 1972 में इस विधानसभा में मात्र 61 हजार 711 मतदाता थे, जबकि 2023 में अभी तक की मतदाता सूची अनुसार 2 लाख 28 हजार 895 मतदाता है। जिसमें पिछले 2018 की तुलना में 13 हजार 936 नए मतदाता बढ़े है। इस क्षेत्र में हुए कुल 15 विधानसभा चुनाव में 7 बार कांग्रेस, 6 बार भाजपा तथा 1 बार किसान मजदूर प्रजा पार्टी एवं 1 बार जनता पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की है। 1980 में भाजपा के अस्तित्व में आने के पश्चात 3 बार कांग्रेस और 6 बार भाजपा जीती है। यहां 1993 से भाजपा द्वारा लगातार कमल पटेल को ही अपना उम्मीदवार बनाया जाता रहा है। जबकि कांग्रेस हर बार नए चेहरे पर दांव लगाती रही है। जिसमें केवल एक बार डॉ. रामकिशोर दोगने विजयी रहे, जबकि 5 बार भाजपा के कमल पटेल ने जीत हासिल की है। परंतु विगत 30 वर्षों में जहां विधानसभा के नए मतदाता बढ़े है, वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत कम हुआ है।

अनोखा तीर, हरदा। प्रदेश की हरदा विधानसभा क्षेत्र का मध्यप्रदेश गठन से आज तक कांग्रेस और भाजपा ने बराबर समय नेतृत्व किया है। १ नवंबर १९५६ को मध्यप्रदेश का गठन होने के पश्चात इस विधानसभा सीट पर भाजपा के अस्तित्व में आने तक अधिकांश समय कांग्रेस उम्मीदवार ही विजय होते रहे। परंतु जब १९८० में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो उसके बाद महज तीन बार ही कांग्रेस को जीतने का अवसर मिल पाया। इस क्षेत्र से मध्यप्रदेश गठन से पहले १९५१ में जहां किसान मजदूर प्रजा पार्टी से महेशदत्त मिश्र ने प्रतिनिधित्व किया था, वहीं मध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने के पश्चात १९५७ में कांग्रेस से गुलाब रामेश्वर और १९६२ में कांग्रेस के ही लक्ष्मणराव नाईक ने नेतृत्व किया। इसी तरह १९६९ में कांग्रेस के नन्हेलाल पटेल तथा १९७२ में हुए मध्यावर्ती चुनाव में फिर कांग्रेस के ही नन्हेलाल पटेल ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार वीरेन्द्र कुमार आनंद को ८ हजार ८५४ मतों से पराजित करते हुए जीत हासिल की थी। परंतु १९७७ के विधानसभा चुनाव में कुल ३६ हजार २३० मतदाताओं के मताधिकार उपरांत जनता पार्टी के उम्मीदवार बाबूलाल सिलारपुरिया ने १५ हजार ८१३ वोट हासिल कर निर्दलीय चुनाव लड़े वीरेन्द्र कुमार आनंद को ६ हजार १०२ मतों से पराजित किया था। जब १९८० में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो इस विधानसभा क्षेत्र से पहली बार भाजपा ने शिवनारायण टांक को अपना उम्मीदवार बनाया था। तब इस विधानसभा क्षेत्र में कुल ६८ हजार २३९ मतदाता थे, जिसमें ३८६३१ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इसी चुनाव में हरदा से प्रदेश की राजधानी भोपाल में बतौर पत्रकार पत्रकारिता करने गए विष्णु राजौरिया ने कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। श्री राजौरिया को तब कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह का कट्टर समर्थक माना जाता था। प्रदेश गठन के बाद यही पहला अवसर था जब इस विधानसभा क्षेत्र से सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले ब्राम्हण उम्मीदवार विष्णु राजौरिया चुनाव मैदान में उतरे थे। जिन्होंने मात्र १९ हजार ८३६ वोट हासिल कर भारतीय जनता पार्टी के शिवनारायण टांक को २११४ मतों से पराजित किया था। श्री राजौरिया ने १९८५ के विधानसभा चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार वीरेन्द्र कुमार आनंद को ५०५२ मतों से पराजित कर अपना कब्जा बरकरार रखा था। इस चुनाव में श्री राजौरिया को कुल वैध ४७ हजार ३२८ मतों में से २५ हजार ४८० मत हासिल हुए थे। परंतु जब १९९० में विधानसभा चुनाव हुए तो नामांकन दाखिल होने के अंतिम समय में कांग्रेस के इस कद्दावर नेता और अर्जुन सिंह की नाक का बाल कहलाने वाले विष्णु राजौरिया का टिकिट काटकर कांग्रेस ने राजपूत समाज के लखन सिंह मौर्य को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। यहां उल्लेखनीय है कि विष्णु राजौरिया के विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री रहते हुए हरदा के ही कद्दावर कांग्रेस नेता एकनाथ अग्रवाल से पटरी नहीं बैठ पाने के कारण कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई थी। यही कारण था कि कांग्रेस नेता एकनाथ अग्रवाल विष्णु राजौरिया को टिकिट देने के पक्ष में नहीं थे। जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह दो बार के विजयी विधायक विष्णु राजौरिया का टिकिट पक्का करा चुके थे। ऐसी स्थिति में उस समय राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा थी कि विष्णु राजौरिया से खफा चल रहे एकनाथ अग्रवाल ने ही अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए भारतीय जनता पार्टी से अपने स्वजातीय बंधु बद्रीनारायण अग्रवाल को टिकिट दिलाने में भीतरखाने से मदद की थी। यह पहला अवसर था जब हरदा विधानसभा के खिरकिया क्षेत्र से किसी राजनीतिक दल द्वारा अपना उम्मीदवार बनाया गया हो। हकीकत चाहे जो भी हो लेकिन माना जाता था कि बद्रीनारायण अग्रवाल को भाजपा द्वारा अपना उम्मीदवार घोषित करने के बाद कांग्रेस ने नामांकन दाखिल होने वाले दिन अंतिम समय में अपना उम्मीदवार बदलते हुए लखनसिंह मौर्य को उम्मीदवार घोषित कर दिया था। चूंकि विष्णु राजौरिया की दावेदारी का विरोध करते हुए उस समय स्वर्गीय एकनाथ अग्रवाल द्वारा अपनी ओर से लखनसिंह मौर्य का नाम ही प्रस्तावित किया था।

 

अब जबकि कांग्रेस ने श्री अग्रवाल द्वारा प्रस्तावित नाम को ही उम्मीदवार घोषित कर दिया तो ऐसी स्थिति में श्री अग्रवाल खेमे के समक्ष दुविधा की स्थिति निर्मित हो गई थी। चूंकि एक ओर भाजपा उम्मीदवार बद्रीनारायण अग्रवाल को भी उन्हीं की पसंद माना जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर लखनसिंह मौर्य भी उन्हीं के समर्थक थे। इस चुनाव में जहां श्री राजौरिया खेमे ने श्री अग्रवाल के समर्थक लखनसिंह मौर्य का विरोध किया तो वहीं श्री अग्रवाल के समर्थक भी उतना खुलकर अपने उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार नहीं कर पाए थे। परिणामस्वरुप इस चुनाव में कुल ६० हजार १३७ मतों में से ३१ हजार ११ मत भाजपा उम्मीदवार बद्रीनारायण अग्रवाल ने हासिल करते हुए कांग्रेस के लखनसिंह मौर्य को ५ हजार १९२ मतों से पराजित करते हुए भाजपा की विजय पताका लहराई थी। भारतीय जनता पार्टी के गठन पश्चात हरदा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की यह पहली जीत थी। बहरहाल अयोध्या बाबरी मस्जिद मुद्दे को लेकर १९९३ में मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों की सरकार भंग कर केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। जिसके चलते १९९३ में हुए मध्यावर्ती चुनाव में जहां कांग्रेस ने पुन: अपने अपराजित नेता विष्णु राजौरिया को उम्मीदवार बनाया था तो वहीं भारतीय जनता पार्टी ने विद्यार्थी परिषद से निकलकर आए युवा नेता कमल पटेल को चुनाव मैदान में उतारा था। इस चुनाव में विष्णु राजौरिया के पक्ष में कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह स्वयं जनसभा लेने हरदा आए थे। तब उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा था कि भाजपा ने कांग्रेस के शेर विष्णु राजौरिया के सामने कमल पटेल के रुप में मेमना उतार दिया है। वहीं उन्होंने अपनी ही पार्टी कांग्रेस के स्थानीय नेता स्वर्गीय एकनाथ अग्रवाल को भी मंच से भला बुरा कहा था। अर्जुन सिंह इस दौरान अपने उम्मीदवार की जीत को लेकर इतने ज्यादा आशान्वित थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया था कि अगर भाजपा के सुंदरलाल पटवा भी यहां आकर चुनाव लड़ते है तो हार जाएंगे। यह वह दौर था जब हरदा क्षेत्र कपास उत्पादन और खरीदी का बड़ा केन्द्र हुआ करता था। यह कारोबार कांग्रेस के कद्दावर नेता एकनाथ अग्रवाल द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता था। मंडी में बिकने वाले कपास का तौल श्री अग्रवाल की जीनिंग फैक्ट्री में ही होता था और कहा जाता था कि यहां किसान तौल में की जाने वाली गड़बड़ी को लेकर आरोप प्रत्यारोप लगाते है। तब भाजपा के युवा नेता कमल पटेल ने इसे ही अपनी राजनीति का मुद्दा बनाते हुए किसानों के हित में तौल कांटों की जांच कराने को लेकर एक बड़ा आंदोलन किया था। किसानों के बीच निडरता के साथ श्री अग्रवाल का विरोध करने और किसानों का पक्ष लेने के कारण कमल पटेल युवा नेतृत्व के रुप में चर्चित हो गए थे। इस दौरान हर समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद करने वाले कमल पटेल को स्थानीय मीडिया ने भी अच्छा कवरेज देते हुए जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया था। यही कारण था कि बहुत ही कम समय में कमल पटेल न केवल हरदा विधानसभा क्षेत्र में बल्कि उस समय अविभाजित रहे पूरे होशंगाबाद जिले में चर्चित हो गए थे। वैसे तो श्री पटेल ने कांग्रेस नेता श्री अग्रवाल का व्यवसायिक तौर पर विरोध करते हुए अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में श्री अग्रवाल अपने राजनैतिक विरोधी विष्णु राजौरिया को पुन: जीत तक वजनदार नहीं होने देना चाहते थे।

 

वहीं अर्जुन सिंह को भी वह इस पराजय से राजनीतिक तौर पर प्रदेश स्तर पर शिकस्त देने का कार्य करना चाहते थे। जिसके परिणामस्वरुप इस विधानसभा चुनाव में जहां भारतीय जनता पार्टी अपने युवा नेता कमल पटेल के पक्ष में तन-मन और धन के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी तो वहीं परदे के पीछे से श्री अग्रवाल के समर्थकों ने भी श्री पटेल का ही साथ दिया था। जिससे कांग्रेस के विष्णु राजौरिया को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में कुल ७२ हजार ६५४ मतदाताओं में से भाजपा के कमल पटेल को ४१ हजार १०७ वोट मिले थे। उन्होंने कांग्रेस के श्री राजौरिया को ११ हजार ५६५ मतों से पराजित करते हुए ५७ प्रतिशत मत हासिल किए थे। इस हार के बाद विष्णु राजौरिया ने हरदा विधानसभा क्षेत्र से लगभग अपना संपर्क कम कर लिया था। लेकिन कांग्रेस की राजनीति में अब भी राजौरिया गु्रप और सेठ गु्रप के रुप में दो धड़े बने हुए थे। जब १९९८ में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने अपने युवा नेता कमल पटेल को ही उम्मीदवार बनाया था, लेकिन कांग्रेस ने जाट समाज के कमल पटेल का तोड़ जाट समाज के अनिल पटेल को अपना उम्मीदवार बनाया। अनिल पटेल कांग्रेस नेता स्वर्गीय एकनाथ अग्रवाल के कट्टर समर्थक माने जाते थे। लेकिन इस चुनाव में राजौरिया गुट ने जहां अनिल पटेल का विरोध किया तो वहीं जाट समाज भी दो धड़ों में विभाजित हो गई थी। वहीं क्षेत्र के मतदाताओं ने भी दोनों जाट उम्मीदवारों में से अपने देखे परखे और विगत ५ वर्षों से विधानसभा क्षेत्र का नेतृत्व करते हुए हरदा को जिला घोषित कराने वाले नेता कमल पटेल पर अधिक भरोसा जताया। जिसके चलते इस चुनाव में कुल ७७ हजार २०८ मतदाताओं में से ४४ हजार ३५७ मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवार कमल पटेल को वोट दिए थे। जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस के अनिल पटेल को १४०६९ वोटों से पराजित करते हुए पुन: ५७ प्रतिशत वोट हासिल किए थे। इस चुनाव में लगभग ५ हजार नए मतदाता तो जुड़े थे लेकिन कमल पटेल को हासिल होने वाले मतों का प्रतिशत पिछले चुनाव की तुलना कम नहीं हुआ था। वहीं जीत का अंतर भी पिछले चुनाव से बढ़ गया था। परंतु इस चुनाव के बाद हुए लगभग हर चुनाव में कमल पटेल का वोट प्रतिशत नीचे खिसकता चला गया। वहीं जीत का अंतर भी कम होता गया। २००३ के विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा ने तीसरी बार कमल पटेल को अपना उम्मीदवार घोषित किया था वहीं कांग्रेस ने फिर विष्णु राजौरिया को चुनाव मैदान में उतार दिया। इस चुनाव में भी १९९३ वाली राजनीतिक स्थितियां दोहराई गई और कांग्रेस के अग्रवाल खेमे ने श्री राजौरिया का परदे के पीछे विरोध करते हुए पराजय में महती भूमिका निभाई। जिसके चलते भाजपा के कमल पटेल कुल ९७ हजार ७६१ वैध मतों में से ४६३९८ मत हासिल कर कांग्रेस के श्री राजौरिया से ५४७५ मतों से जीत गए थे।

 

इस चुनाव में जहां जीत का अंतर बीते चुनाव की तुलना आधे से भी कम रहा तो वहीं प्राप्त मतों का प्रतिशत भी खिसक कर ४७ प्रतिशत रह गया था। इसके पश्चात जब २००८ में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने चौथी बार कमल पटेल को ही अपना उम्मीदवार बनाया। इस दौरान कमल पटेल प्रदेश में बनी भाजपा सरकार के मंत्री के रुप में चुनाव लड़े थे। वह स्वर्गीय बाबूलाल गौर के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में चिकित्सा शिक्षा एवं धर्मस्व न्याय मंत्री रहे। तत्पश्चात शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार में बतौर राजस्व मंत्री की भूमिका निभाते हुए यह चुनाव लड़ रहे थे। इस चुनाव में कांग्रेस ने फिर अपना उम्मीदवार बदलते हुए हरदा नगरपालिका के अध्यक्ष रहे हेमंत टाले को चुनाव मैदान में उतारा था। हरदा विधानसभा क्षेत्र में जातिगत समीकरणों के मान से गहरा प्रभाव रखने वाले गुर्जर समुदाय के हेमंत टाले ने न केवल कमल पटेल की जीत का अंतर बढ़ा दिया बल्कि राजनीतिक दृष्टि से इस चुनाव को पहले से ही भाजपा की झोली में जाता माना जा रहा था। यहां कमल पटेल ने १ लाख ११ हजार ९४५ विधिमान्य मतों में से ४५ हजार १२३ मत हासिल करते हुए कांग्रेस के हेमंत टाले को ८८६३ मतों से पराजित किया था। पिछले चुनाव की तुलना इस चुनाव में जहां १४१८४ नए मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, लेकिन कमल पटेल को जहां २००३ के चुनाव में ४६३९८ मत हासिल हुए थे और वह कुल मतदान का ४७ प्रतिशत मत हासिल करने में कामयाब रहे थे वहीं इस चुनाव में उन्हें बढ़े हुए मतदाताओं के बावजूद महज ४५ हजार १२३ मत हासिल हुए और प्रतिशत की दृष्टि से वह खिसककर ४१ प्रतिशत पर आ गए थे। पिछले चार चुनावों पर नजर डाली जाए तो जहां १९९३ और १९९८ के चुनाव में उन्होंने मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखते हुए ५७ प्रतिशत मत हासिल किए थे तो वहीं २००३ में यह खिसककर ४७ पर और २००८ में ४१ प्रतिशत पर आ गया था। प्राप्त मतों की घटती संख्या और खिसकता मतदाता प्रतिशत यह स्पष्ट संदेश दे रहा था कि भाजपा के कमल पटेल की पकड़ क्षेत्र के मतदाताओं में घटती जा रही है। लेकिन इस समय तक चार बार के विधायक और दो बार युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष का दायित्व निभाने के साथ ही सरकार में मंत्री रह चुके कमल पटेल ने अपनी इस कमजोर होती जमीनी पकड़ को उतनी गंभीरता से नहीं लिया। परिणामस्वरुप २०१३ के विधानसभा चुनाव में भाजपा से ही दावेदारों की लम्बी कतार पार्टी के समक्ष अपनी दावेदारी प्रस्तुत करती नजर आने लगी तो वहीं कमल पटेल को भी अपना टिकिट पक्का कराने में काफी मशक्कत करना पड़ी। इस चुनाव में कांग्रेस ने फिर नए चेहरे के रुप में गुर्जर समुदाय से ही डॉ. रामकिशोर दोगने को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस की स्थानीय राजनीति से दूर सभी को साधने और साथ लेकर चलने की कवायद के चलते श्री दोगने चुनाव प्रचार दौरान ही अपनी पकड़ मजबूत करते नजर आ रहे थे। वहीं लम्बी राजनीतिक पारी खेल चुके कमल पटेल जहां अतिआत्मविश्वास और अपनी ही पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी के चलते कमजोर प्रतीत हो रहे थे। बहरहाल इस चुनाव में उनके बढ़े हुए राजनीतिक कद के साथ ही जीत के प्रति जरुरत से ज्यादा आशान्वित होने तथा मतदाताओं के बीच कहीं जाने वाली बातों ने वोटों के अंतर को कम करना शुरु कर दिया था। जिसके चलते इस चुनाव में कुल १ लाख ५४ हजार ८२३ विधिमान्य मतों में से कमल पटेल मात्र ६९ हजार ९५६ मत ही प्राप्त कर पाए जबकि कांग्रेस के डॉ. रामकिशोर दोगने ने ७४ हजार ६०७ मत हासिल कर कमल पटेल को ४ हजार ६५१ मतों से पराजित कर दिया था। इस पराजय ने जहां भाजपा के कमल पटेल को आत्ममंथन करते हुए अपने अभेद गढ़ में सेंध लगाने वाले डॉ. दोगने की तुलना जनता के समक्ष खुद को पुन: स्थापित करने का अवसर दिया। जिसके परिणामस्वरुप २०१८ के विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा पुन: उम्मीदवार बनाए जाने का कमल पटेल ने कोई कोर कसर बाकी न रखते हुए जीत हासिल करने के तमाम प्रयास किए। कांग्रेस ने इस चुनाव में अपने वर्तमान विधायक डॉ. रामकिशोर दोगने को ही उम्मीदवार बनाया था। लेकिन तब तक कांग्रेस फिर धड़ों में विभाजित हो चुकी थी। इस बार श्री दोगने के साथ कांग्रेस का अग्रवाल गुट तो चुनाव मैदान में था लेकिन जिलाध्यक्ष लक्ष्मीनारायण पंवार एवं राजपूत समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले खिरकिया क्षेत्र के कांग्रेस नेता बद्री पटेल सांगवा भीतरखाने से समर्थन नहीं कर रहे थे। राजनीतिक दृष्टि से माना जा रहा था कि विधानसभा क्षेत्र के विश्नोई बाहुल्य मतदान क्षेत्रों में जहां लक्ष्मीनारायण पंवार के विरोध चलते भाजपा का पलड़ा भारी बना हुआ था तो वहीं खिरकिया क्षेत्र में राजपूत समाज के मतदाताओं ने भी कमल पटेल का साथ दिया था। इसी तरह नर्मदा के तटवर्तीय क्षेत्रों में जाट समाज एक बार फिर कमल पटेल के पक्ष में मैदान पकड़ चुकी थी।

 

जिसके फलस्वरुप श्री पटेल अपनी खोई हुई सीट को ६६६७ मतों से जीत हासिल कर प्राप्त करने में कामयाब रहे। इस चुनाव में उन्होंने १ लाख ७४ हजार ७८२ मतदाताओं में से ८५ हजार ६५१ मत हासिल किए थे। जो प्रतिशत के मान से ४९ प्रतिशत थे। २००३ से २०१३ तक के चुनाव में कमल पटेल का जो मत प्रतिशत निरंतर खिसक रहा था वह इस चुनाव में पुन: ऊपर जाते हुए एक मजबूत स्थिति में पहुंच गया था। अब आने वाले विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा अपने कद्दावर नेता कमल पटेल को ही उम्मीदवार बनाती है तो ऐसी स्थिति में कांग्रेस क्या फिर डॉ. रामकिशोर दोगने को मैदान में उतारती है या वर्तमान में कांग्रेस से दावेदारों की उभरकर आ रही लम्बी फेहरिस्त में से किसी नए चेहरे को मौका देती है यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है। कमल पटेल वर्तमान प्रदेश सरकार में बतौर कृषि मंत्री इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे है तो ऐसी स्थिति में वह अपने क्षेत्र के मतदाताओं को अपनी कार्यशैली, व्यवहार और विकास कार्यों से कितना प्रभावित कर पाएंगे यह भी भविष्य के गर्भ में छुपा है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना अनुचित नहीं है कि आने वाला विधानसभा चुनाव किसी भी राजनीतिक दल के लिए परसी हुई थाली के समान न होकर कड़े मुकाबले वाला होगा।

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