निकाला घर से जब बेटों ने तो मां-बाप ये बोले, कहां जाते बुढ़ापे में अगर बेटी नहीं होती

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खंडवा। किसी के वास्ते सीने में हमदर्दी नहीं होती अगर यह दिल नहीं होता तो चाहत भी नहीं होती,

निकाला घर से जब बेटों ने तो मां-बाप ये बोले, कहां जाते बुढ़ापे में अगर बेटी नहीं होती। दिल को छू लेने वाली रिश्तों की कविता जब कवि व शायर गोविंद गीते ने पढ़ी तो सारा माहौल तालियों से गूंज उठा। मां नवचंडी मंदिर के मंच पर फागुन की फुहार रंगों की बौछार कवि सम्मेलन में शायर अकबर ताज ने अपना कलाम पड़ा मुझे तो राम के जैसा या फिर लक्ष्मण बना देना सिया के मन के जैसा मन मेरा दर्पण बना देना, मुझे अंधा बनाया है तो कोई गम नहीं इसका, मेरी संतान को भगवान मगर शरवण बना देना। इसके बाद आए कवि सुनील चौर उपमन्यु ने हास्य का रंग फिजाओं में घोला। वीर रस के कवि संतोष चौरे चुभन ने भारत मां के रक्षक सैनिकों की प्रशंसा करते हुए अपनी कविता पढ़ी। श्रंगार रस के कवि संतोष तिवारी ने अपने मुक्तक और कविताएं सुनाकर माहौल में प्रेम का रंग घोल दिया। शायर सूफियान काज़ी ने कुछ में इतना जुनून होता है पा के मंजिल सुकून होता हैै, पहले होते थे खून के रिश्ते अब तो रिश्तो का खून होता है। सूत्रधार प्रफुल्ल मंडलोई ने संचालन करते हुए सभी कवियों का परिचय सदन को दिया और रंग पंचमी का धार्मिक महत्व बताया। उन्होंने अपनी कविता पढ़ी

मेरा मंदिर तेरी मस्जिद इसका गुरुद्वारा उसका चर्च क्या फर्क पड़ता है अगर इरादे नेक है, रास्ते अलग-अलग सही मंजिल तो एक है। इस अवसर पर डॉक्टर दिनेश लोवंशी, लव जोशी, प्रशांत बारचे, संतोष मोटवानी, राकेश दशोरे, गणेश वर्मा, शानू वर्मा,गणेश भावसार,रजत सोहनी,विवेक माहेश्वरी,सत्येंद्र सोहनी सहित बड़ी संख्या में शहर के काव्य प्रेमियों ने रात 12 बजे तक चले कवि सम्मेलन का आनंद लिया।

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