जीव को आत्मतत्व का बोध कराती है भागवत कथा : पंडित प्रमोद महाराज

WhatsApp Image 2025-09-19 at 11.24.35 PM

अनोखा तीर, सोडलपुर। ग्राम स्थित मोती बाबा देवस्थान पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन गुरुवार को भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा के विश्राम दिवस पर दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जिससे पूरा पंडाल भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया। कथा स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण के जयकारों, भजनों और कीर्तन से वातावरण गूंजायमान रहा। कथा व्यास प्रमोद महाराज ने श्रीमद्भागवत महापुराण की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि भागवत कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीव को आत्मतत्व का बोध कराने वाला दिव्य माध्यम है। उन्होंने कहा कि यह पवित्र ग्रंथ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप है, जो मनुष्य को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक सात दिनों तक इस कथा को सुनकर उसे अपने चित्त में धारण करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाता है। महाराज ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य धन, वैभव और सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हुए अपने वास्तविक उद्देश्य को भूलता जा रहा है। ऐसे समय में भागवत कथा मनुष्य को उसकी आत्मा और परमात्मा के संबंध का बोध कराती है तथा जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि यह कथा केवल इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं, बल्कि कलियुग में पापों का नाश कर आत्मा को शुद्ध और पवित्र बनाने का सर्वोत्तम मार्ग है। कथा के दौरान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग सुनाया गया। उन्होंने बताया कि सच्ची मित्रता स्वार्थ से परे होती है और इसमें केवल प्रेम और समर्पण का भाव होता है। जब सुदामा अपने बचपन के मित्र भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे, तो उनकी दरिद्र अवस्था को देखकर भी भगवान ने तनिक भी भेदभाव नहीं किया। जैसे ही द्वारपाल ने सुदामा का नाम लिया, भगवान श्रीकृष्ण नंगे पैर दौड़ते हुए द्वार पर पहुंचे और अपने सखा को गले लगाकर उनका सम्मान किया। उन्होंने सुदामा को अपने राजसिंहासन पर बैठाया, उनके चरण धोए और बड़े प्रेम से उनका सत्कार किया। उन्होंने कहा कि भगवान केवल प्रेम के भूखे होते हैं, वे भक्ति में भाव देखते हैं, न कि बाहरी आडंबर या धन-दौलत। सुदामा ने भगवान से कुछ नहीं मांगा, फिर भी श्रीकृष्ण ने उनकी गरीबी दूर कर उन्हें अपार वैभव से विभूषित कर दिया। यह प्रसंग सिखाता है कि सच्चे भाव से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। कथा के अंत में श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा गया कि जीवन में धर्म, सेवा और परमार्थ के कार्यों को अपनाना चाहिए तथा अपने धन और समय का उपयोग सत्कर्मों में करना चाहिए। मनुष्य का शरीर नश्वर है, लेकिन उसके द्वारा किए गए पुण्य कार्य उसे अमर बना देते हैं। समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण के भजनों पर भावपूर्वक नृत्य किया और आरती में भाग लेकर धर्म लाभ प्राप्त किया। आयोजन समिति द्वारा सभी श्रद्धालुओं के लिए प्रसादी की व्यवस्था की गई। पूरे आयोजन ने ग्राम में आध्यात्मिक चेतना का संचार किया और वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
——————————

0 Views

Leave a Reply

लेटेस्ट न्यूज़

MP Info लेटेस्ट न्यूज़

error: Content is protected !!