जिलाध्यक्ष को लेकर दावेदारों की लम्बी फेहरिस्त





उपेन्द्र गद्रे






अनोखा तीर, हरदा। भारतीय जनता पार्टी में इस समय संगठनात्मक चुनाव का दौर चल रहा है। पार्टी जमीनी स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक चुनावी मोड़ में नजर आ रही है। लम्बे समय से मध्यप्रदेश में सत्तासीन भाजपा में पिछले कुछ वर्षों से पार्टी के प्रति समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं के बजाय पट्ठावाद को बढ़ावा मिला है। वहीं पार्टी विस्तार के नाम पर आयातित कार्यकर्ताओं के कारण पार्टी के मूल केण्डर के कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे। इसका अहसास अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी हो चला है। जिसके चलते अब पार्टी बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक पीढ़ी परिवर्तन के दौर में चल रही है। इस बात का संकेत वैसे तो पिछले विधानसभा चुनाव दौरान तीन राज्यों के मुख्यमंत्री चयन के साथ ही दे दिया गया था। लेकिन संगठनात्मक स्तर पर अब राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री शिवप्रकाश ने हाल ही में राजधानी भोपाल में आयोजित पार्टी कार्यकर्ताओं की कार्यशाला दौरान अपनी मंशा सार्वजनिक रुप से प्रगट कर चुके है। पार्टी कार्यशाला दौरान शिवप्रकाश ने एक लोक कहावत को उल्लेखित करते हुए स्पष्ट किया है कि अब गोबर गणेश या शोभा की सुपारी से काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा है कि पार्टी के प्रति समर्पित, निष्ठावान और जुझारू कार्यकर्ताओं को तराशकर उन्हें आगे लाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री शिवप्रकाश यह भली भांति जानते है कि जिला स्तर पर बूथ, मण्डल और जिलाध्यक्षों के निर्वाचन में पार्टी के वह पुराने नेता जो कभी सांसद, मंत्री, विधायक या बड़े पदों पर रह चुके है उनकी मंशा और हस्तक्षेप के चलते सक्रिय व समर्पित युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता है। इसी कारण उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि अब भाजपा को पट्ठावाद से मुक्ति दिलाने का समय आ गया है। अपनी इस कार्ययोजना को जमीनी स्तर पर पहुंचाने के लिए उन्होंने क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल, पर्यवेक्षक सरोज पांडे सहित अन्य चुनाव अधिकारियों को संभागीय व जिला स्तर पर भेजना भी प्रारंभ कर दिया है। वहीं जिला स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की कार्यशाला आयोजित करते हुए संगठन पदाधिकारी निर्वाचन के कार्य को पारदर्शी और मैदानी कार्यकर्ताओं की मंशानुरुप करने की कवायद शुरु की है। ऐसी स्थिति में निश्चित ही पार्टी के उन समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे आने का अवसर मिलेगा जो लम्बे समय से स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। वैसे तो शिवप्रकाश ने यह बातें प्रदेश के सभी जिला और मण्डल अध्यक्षों के निर्वाचन को लेकर कही है, लेकिन इसे हरदा जिले के परिपेक्ष्य में देखा जाए तो यहां लम्बे समय से वास्तव में पार्टी की बागडोर कमजोर हाथों में ही नजर आती रही है। हरदा जिले के प्रथम जिला पंचायत अध्यक्ष रहे गौरीशंकर मुकाती के हाथों में जब संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा जिलाध्यक्ष की कमान थी तो उन्होंने संगठनात्मक शक्ति से सभी को अवगत करा दिया था। वहीं दूसरे जिलाध्यक्ष रमेश पटेल का कार्यकाल भी ठीक ठाक ही आंका गया है। लेकिन इसके बाद जिलाध्यक्ष पद पर संतोष पाटिल और अमरसिंह मीणा लगभग १५-२० वर्षों के कार्यकाल में संगठन को वह मजबूती नहीं प्रदान कर पाए जिसके लिए भाजपा पहचानी जाती है। परिणामस्वरुप निष्ठावान कार्यकर्ता पार्टी से दूर होते गए और गणेश परिक्रमा करने वाले कार्यकर्ताओं की फौज तैयार होती गई। अब अगर वास्तव में पार्टी शीर्ष नेतृत्व की मंशानुरुप सक्षम और समर्पित हाथों में संगठन की कमान सौंपती है तो उसके लिए भारी मशक्कत करने की आवश्यकता होगी। चूंकि पार्टी लम्बे समय से सत्तारूढ़ है ऐसी स्थिति में दावेदारों की कतार भी लम्बी ही होती है। वर्तमान में जिलाध्यक्ष पद को लेकर कई नाम चर्चा में बने हुए है, जिसमें पिछले दो विधानसभा चुनाव से विधायक उम्मीदवार के लिए अपनी दावेदारी करने वाले डॉ. विशाल बघेल, वर्तमान जिलाध्यक्ष राजेश वर्मा, दो बार जिला महामंत्री का दायित्व संभाल चुके अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से निकलकर आए उदय चौहान, संगठन में लम्बे समय से छात्र राजनीति के माध्यम से सक्रिय भूमिका में बने रहने वाले सिद्धार्थ पचौरी, उपेन्द्र गद्रे, नितेश बादर, किसान संघ के राजेश गोदारा, वर्तमान पार्टी जिला उपाध्यक्ष प्रदीप पटेल, सरपंच संघ के जिलाध्यक्ष ललित पटेल, भारतीय मजदूर संघ के दो बार जिलाध्यक्ष रहे तथा वर्तमान में संभाग प्रभारी जितेन्द्र सोनी के नाम प्रमुख रुप से चर्चाओं में बने हुए है। इसी के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ही युवा चेहरा बसंत राजपूत को भी प्रबल दावेदार के रुप में देखा जा रहा है। वैसे तो और भी ऐसे दावेदार है जो किसी न किसी के सहारे अपनी नैय्या को इस चुनावी समर में उतारे हुए है। लेकिन इसमें पार्टी की पसंद तथा मैदानी पकड़ के रुप में कौन प्रबल दावेदार बनकर उभरेगा यह कहना जल्दबाजी होगी। चूंकि वर्तमान में भाजपा हरदा जिले की दोनों विधानसभा सीटों पर पराजय का सामना कर चुकी है। इस दौरान संगठन में फूट का खामियाजा स्पष्ट रुप से भाजपा को भुगतना पड़ा है। इन चुनावों में यह भी स्पष्ट देखने को मिला था कि पार्टी में व्यक्तिवादी और पट्ठावाद हावी था। जिसके चलते चुनाव दौरान जितना खामियाजा विपक्षी दल के कार्यकर्ताओं से नहीं भुगतना पड़ा उससे ज्यादा भाजपा में घर के डांडे से ही सिर फूटने वाली कहावत चरितार्थ हुई। वैसे तो जिले में पांच बार के विधायक और तीन बार के मंत्री पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार कमल पटेल हाल ही में सांसद प्रतिनिधि का दायित्व स्वयं अपने पास रख चुके है। ऐसी स्थिति में वह जिलाध्यक्ष पद के लिए अपने कट्टर समर्थक से हटकर किसी अन्य नाम पर सहमत होंगे यह टेढ़ी खीर ही नजर आती है। वहीं जिले की टिमरनी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी रहे संजय शाह भी तीन बार विधायक रह चुके है, वहीं वर्तमान में उनके ही ज्येष्ठ भ्राता विजय शाह प्रदेश सरकार में मंत्री है। आज जब भाजपा प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक आदिवासी वोट बैंक को साधने में जुटी हुई है ऐसी स्थिति में स्वयं संजय शाह भी जिलाध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर सकते है। वैसे संगठन इस बात पर सहमत हो यह थोड़ा असहज ही महसूस होता है। जहां तक सामाजिक समीकरणों का सवाल है तो वर्तमान में जिले की चार नगरीय निकायों में हरदा नगर पालिका पर जहां जाट समाज को नेतृत्व मिला है तो वहीं खिरकिया में पंजाबी समुदाय तथा सिराली में अग्रवाल समाज को नेतृत्व मिल चुका है। टिमरनी नगर पंचायत में ब्राम्हण समाज के कांग्रेस से आयातित नेता को नेतृत्व दिया गया है। लेकिन इसका स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने भी भरपूर विरोध किया था। वहीं जिला पंचायत में आदिवासी समुदाय को जिलाध्यक्ष पद की कमान सौंपी गई है। पिछले इतिहास और वर्तमान परिस्थिति को राजनीतिक दृष्टि से सामाजिक समीकरण अनुसार देखा जाए तो दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में राजपूत, गुर्जर और ब्राम्हण समाज का बड़ा वोट बैंक माना जाता है। संगठनात्मक दृष्टि से भाजपा में राजपूत और ब्राम्हण समाज लम्बे समय से उपेक्षित बने रहे। चूंकि पिछले ३० वर्षों से विधानसभा चुनाव दौरान जहां हरदा की सामान्य सीट पर पिछड़ा वर्ग से जाट समाज के कमल पटेल ही चुनाव लड़ते रहे तो वहीं आरक्षित टिमरनी विधानसभा से पहले अनुसूचित जाति से मनोहरलाल राठौर तथा बाद में अनुसूचित जनजाति से संजय शाह चुनाव लड़ते आए है। जिले की एकमात्र हरदा नगरपालिका में भी भाजपा ने कभी ब्राम्हण या राजपूत वर्ग को अवसर नहीं दिया है। ऐसी स्थिति में संगठनात्मक चुनाव दौरान भाजपा इस जातिगत समीकरणों को साधने पर भी जोर दे सकती है। खैर यह पार्टी का अपना अंधरूनी मामला है वह किसे हरदा भाजपा का चेहरा बनाती है।

