भूतपूर्व का भूतनृत्य

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खाकी और खादी का यह द्वंद नया नहीं है। सिंहासन बदलते हैं खाकी स्थिर है।


सार्वजनिक संस्थान में घुसना प्रतिबंधित तो कभी नहीं रहा, न है और न होगा। लेकिन लोक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में वहां घुसकर व्यवहार करना संविधान ने निर्धारित किया है। वह ”घुसकर मारने को घोर अपराध घोषित करता हैÓÓ। संविधान तो देश का है तथा देश का नागरिक होने से कोई भी इस व्यवस्था से बड़ा नहीं है। यह बात गांधी जी भी कह गए हैं, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी कही है, बाबा साहब अम्बेडकर और राम मनोहर लोहिया जी ने भी कही है। अब आप किसके अनुयाई हो यह विषय नहीं बचता।
भैया भूत हैं इस समय। इसलिए कह रहे हैं इसलिए कह गए घुस कर मारता हूं। वर्तमान होते तो? नहीं कह पाते। भूत इसलिए हैं कि जब वर्तमान थे तो प्रेत उनके सर पर रहता था। लोकतंत्र ने उनका प्रेत उतार दिया। इसलिए उनका भूत कुलबुला रहा है और वे पूरी व्यवस्था को घुस कर मारने की बात कह रहे हैं।
वर्दी खामोश सुन रही थी वहां। लेकिन आप शायद नहीं जानते, वहां मौजूद वर्दी ने जो धैर्य और संयम दिखाया है वह ही वर्दी का धर्म था। सीएसपी ने अपना धर्म पूरी निष्ठा से निभाया है। अन्यथा उत्तर देना वर्दी बहुत अच्छी तरह से जानती है। भावना के बर्छों पर सवार भीड़ के बीच कोई छुटभैया तक कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र होता है। फिर तो ये भूत लगे माननीय रहे हैं। जिन परिस्थितियों ने सीएसपी जैसे व्यक्ति को स्व नियंत्रण में रहना चाहिए सीएसपी साहब ने उसका पालन किया है। उन परिस्थितियों में उनका काम भड़कना नहीं संभलना और संभालना था जो उन्होंने किया। और जिन परिस्थितियों में जन नेतृत्व को अपनी बुद्धिमत्ता दिखानी चाहिए उस पर भूतपूर्व माननीय खरे नहीं उतरे।
”थाने में घुसकर मरता हूंÓÓ जैसा शब्द एक पूरी व्यवस्था को चुनौती देना है जिसका नियंत्रण व संचालन प्रदेश में श्यामला हिल्स नामक पहाड़ी और वल्लभ भवन से होता है। उसमें जबलपुर इंदौर ग्वालियर या भोपाल अथवा सुदूर झाबुआ, डिंडोरी, पोरसा या मनासा में स्थापित थाने उसी नियंत्रण कक्ष के प्रतिनिधि हैं। इसलिए अगर किसी ने यह कहा कि वह घुसकर मरता है तो वह श्यामला हिल्स की दीवारों में घुसता है, वह वल्लभ भवन के सुसज्जित कक्ष में घुसता है।
वर्दी का काम निश्चित रूप से हर परिस्थिति में अपराधियों की नकेल कसना है। आम जनता को भयमुक्त रख उनका निर्भीक और सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अगर ऐसा नहीं होता तो वर्दी जिम्मेदार है। वर्दी की पूरी जिम्मेदारी है यह। अगर अपराधी सिर उठाते हैं तो उनके हौसले कुचलना केवल और केवल थाने की वर्दी का उत्तरदायित्व है और समाज इसमें किसी भी तरह की हीला-हवाली अथवा बहानेबाजी स्वीकार नहीं करेगा। और कर भी क्यों? लेकिन यह तब संभव है जब सारी व्यवस्थाएं छोटे तालाब के किनारे की बड़ी बिल्डिंग से निर्बाध सम्पन्न हों। किसको कहां भेजा जाना है तथा किसको कहां से हटाना है यह चौथा माला निर्विघ्न और गुणवत्ता के आधार पर सुनिश्चित कर सके। क्या अब यह संभव है? यदि नहीं तो फिर प्रश्न करने का भी किसी को कोई अधिकार नहीं है। इसके लिए यह जरूरी है कि वल्लभ भाई पटेल के नाम पर स्थापित सिंहासन अपने पाए इतने मजबूत बनाए कि वे हर आंधी-तूफान से टकराने में सक्षम हों। लेकिन दर्पण तो कुछ और ही कहते हैं, तथा यह शाश्वत सत्य है कि दर्पण झूठ नहीं बोलता।
थाने में घुसकर मारने का उद्घोष करने वाले भूतों के भूत घमापुर, बेलपुरा, ओमती, सहित शहर के दसियों जगह पर क्राइम रजिस्टर और वीसीएनबी के पन्ने पर देखिए कैसे चीख-चीख कर बता रहे हैं कि ये खुद कितने रक्त रंजित हाथ हैं। फिर इन्हें क्या अधिकार है व्यवस्था पर अंगुली उठाने का। भीड़ के साथ खड़े होकर और भीड़ जुटाकर आप हीरो तो बन सकते हो कुर्ते के दाग नहीं मिटा सकते। आपने कितने अपराधियों का समर्थन कर बचाने की कोशिश की है? कितने अवैध काम करने वालों को भोला-भाला और सात्विक सिद्ध करने का प्रयास किया है? आप बताएं आपने ही कितने भस्मासुर पैदा किए हैं? अब अवैध धंधों से पैसा कमाने वाले अपराधी कट्टे-तलवारे खरीद कर चौराहों पर दम दिखाएंगे ही, वे कोई सत्यनारायण भगवान की कथा को जीवन में उतारने से तो रहे। और इसके जिम्मेदार भी तो आप ही हैं।
माफ करना मंच पर आदर्शवाद और रामराज की दुहाई देते चेहरों को अपराधियों के लिए किए गए बहुत से फोन सुने हैं मैने भी। दोहरे चरित्रों के मुखौटे पिछले 38 वर्ष से सुरक्षित हैं मेरे पास भी। इसलिए है भूतो, वर्तमानों और भविष्य के होनहारों जब बोलो तो जरा यह भी देख लेना आपके सफेद कुर्ते पर कितने लाल निशान हैं। वर्ना जब वर्दी सुधारने पर आती है तो घुसने के लिए कोई घर भी नहीं मिलता। इसलिए नंदी बनो सांड नहीं। नंदी चिरकाल तक पूजा जाता है और सांड……

  • चौ. मदन मोहन समर।

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