दिनेश निगम ‘त्यागीÓ भोपाल। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए विधायकों की शीघ्र लाटरी खुल सकती है। 4 जून को मतगणना के बाद इन्हें प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है। ये विधायक हैं छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट से विधायक कमलेश शाह, श्योपुर जिले के विजयपुर से विधायक रामनिवास रावत और सागर जिले की बीना सीट से विधायक निर्मला सप्रे। इनमें से कमलेश शाह विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद भाजपा में शामिल हुए थे जबकि रामनिवास और निर्मला को मंत्री बनने से पहले विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ेगा। सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व की ओर से इन्हें चुनाव निपटने के बाद मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने का आश्वासन दिया गया था। तीनों को चुनाव बाद उनसे किए गए वादे पर अमल का इंतजार रहेगा।
सरकार में अभी मुख्यमंत्री सहित 31 मंत्री
प्रदेश सरकार में अभी मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव सहित 31 मंत्री शामिल हैं। यदि कांग्रेस से आए रामनिवास, कमलेश शाह और निर्मला सप्रे भी मंत्री बन गए तो मंत्रिंमडल के सदस्यों की संख्या 34 हो जाएगी। इसके बाद मंत्रिमंडल में कोई पद रिक्त नहीं बचेगा, क्योंकि विधानसभा में सदस्य संख्या के लिहाज से सरकार में 34 से ज्यादा मंत्री नहीं हो सकते। सूत्रों का कहना है कि पहले कमलेश शाह और इसके बाद राम निवास रावत को मंत्री बनाने की शर्त पर ही भाजपा में लाया गया है। निर्मला सप्रे को लेकर स्थिति अभी ज्यादा स्पष्ट नहीं है। वे कांग्रेस के टिकट पर पहली बार ही चुनाव जीतकर विधायक बनी हैं। उन्हें किसी निगम-मंडल में लेकर मंत्री अथवा राज्य मंत्री का दर्जा दिया जा सकता है। खबर यह भी है कि चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री अमित शाह द्वारा की गई घोषणा के अनुसार भी मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हो सकता है। ऐसा हुआ तो जिन मंत्रियों के क्षेत्र में कम मतदान हुआ उन्हें हटा कर उन विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है जिनके क्षेत्रों में मतदान ज्यादा हुआ है।
छिंदवाड़ा और मुरैना में लाभ के लिए लाए शाह-रावत
भाजपा कमलनाथ के कारण कांग्रेस का गढ़ बन चुकी छिंदवाड़ा सीट को किसी भी कीमत पर जीतना चाहती थी। इसके लिए पार्टी के कद्दावर नेता एवं मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को छिंदवाड़ा का प्रभारी बनाया गया था। उनके प्रयास से ही कमलनाथ के विश्वस्त अमरवाड़ा विधायक कमलेश शाह को तोड़कर भाजपा में लाया गया था। शाह जैसी नैतिकता कम नेताओं में होती है। शाह ने पहले विधानसभा से इस्तीफा दिया, इसके बाद भाजपा में शामिल हुए। भाजपा को उम्मीद है कि उनके आने का लाभ पार्टी को चुनाव में मिलेगा। दूसरी सीट मुरैना फंसी दिख रही थी। यहां विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की प्रतिष्ठा दांव पर है। भाजपा प्रत्याशी शिवमंगल सिंह तोमर की कमजोर स्थिति को देखते हुए कांग्रेस से 6 बार विधायक रहे रामनिवास रावत को भाजपा में लाया गया। हालांकि रावत ने शाह जैसी नैतिकता नहीं दिखाई। भाजपा में शामिल होने के बावजूद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया। उनका इरादा भी इस्तीफा देने का नहीं हैं। हालांकि जानकार कहते हैं कि यदि वे मंत्री बने तो पहले इस्तीफा देना होगा। सागर में भाजपा की स्थिति खराब नहीं थी, फिर भी जिले की बीना सीट से विधायक निर्मला सप्र को क्यों भाजपा में लाया गया, कोई समझ नहीं पाया। निर्मला का मंत्री पद खतरे में भी पड़ सकता है।
सदस्यता समाप्त करने कांग्रेस देगी आवेदन
दलबदल कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि किसी सदन का कोई सदस्य पार्टी छोड़ता है तो उसे सदन की सदस्यता छोड़ना होगी। सदस्यता उसी स्थिति में बच सकती है यदि पार्टी के दो तिहाई सदस्यों ने पार्टी छोड़ी हो। लेकिन दलबदल के बावजूद सदस्य इस्तीफा नहीं देते, जैसा कांग्रेस के राम निवास रावत और निर्मला सप्रे ने किया। कांग्रेस के इन दोनों विधायकों ने पार्टी छोड़ कर भाजपा ज्वाइन कर ली लेकिन विधायकी से त्यागपत्र देने के लिए तैयार नहीं हैं। राम निवास संकेत तक दे चुके हैं कि उनकी इच्छा इस्तीफा देने की नहीं है। विधानसभा के पिछले कार्यकाल में कांग्रेस विधायक सचिन बिरला ने भी भाजपा ज्वाइन की थी लेकिन अंत तक विधायकी नहीं छोड़ी। इस बार वे भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत गए। कांग्रेस ने तय किया है कि पार्टी छोड़ने वाले विधायकों को वह छोड़ेगी नहीं, विधानसभा को पत्र देकर राम निवास रावत और निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करने का आग्रह करेगी। निर्णय का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास रहता है। वे समयसीमा में भी बंधे नहीं हैं। स्पीकर के निर्णय न लेने के कारण ही सचिन बिरला कांग्रेस छोड़ने के बाद भी पूरे समय विधायक बने रहे। उनकी सदस्यता नहीं गई।

