अनोखा तीर भोपाल:-राजीव गांधी प्रौद्याेगिकी विश्वविद्यालय (आरजीपीवी) में एफडी मामले में 19.48 करोड़ रुपये का घोटाला मामले में एफआइआर दर्ज होने के 38 दिन बाद कुलपति प्रो. सुनील कुमार गुप्ता को गिरफ्तार किया गया, लेकिन अब तक तत्कालीन कुलसचिव आरएस राजपूत की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। तीन दिन पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) द्वारा मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने के बाद शासन ने उन्हें निलंबित कर दिया था।
विवि के खाते से 19.48 करोड़ रुपये कुलपति प्रो. गुप्ता के हस्ताक्षर से निजी खाते में स्थानांतरण हुए। फरवरी में एफडी घोटाला सामने आने के बाद ही कुलपति प्रो. गुप्ता छुट्टी पर चले गए। छह मार्च को छुट्टी से लौटे और राज्यपाल को इस्तीफा सौपा।
बता दें, कि प्रो.गुप्ता 2017 में विवि में कुलपति नियुक्त हुए थे। तब से फिर दुबारा इनकी नियुक्ति हुई थी। करीब साढ़े छह साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। शिक्षण व्यवस्था ठप रही और अनुशासन भी फेल रहा। विवि में आए दिन रैगिंग की घटनाएं सामने आई।
साल भर में करीब 50 से अधिक रैगिंग की घटनाएं सामने आई। प्रो. गुप्ता के कार्यकाल में हुए अन्य घोटाले की फाइलें भी खुलने वाली है। शासन द्वारा गठित एसआइटी इनके कार्यकाल में हुए सभी पुराने विवादास्पद मामलों की पड़ताल करने में जुट गई है। इसमें कोविड काल में साफ्टवेयर खरीदी घोटाला, करियर एडवांसमेंट स्कीम में गड़बड़झाला, फर्नीचर सहित निर्माण कार्यों में 170 करोड़ रुपये का घोटाला शामिल है।
निर्माण कार्यों में 170 करोड़ रुपये का घोटाला
विवि में निर्माण कार्यों समेत अन्य कामों में हुए 170 करोड़ रुपये के घोटाले में तत्कालीन कुलपति गुप्ता संदेह के घेरे में आए थे।विभाग ने कुलपति प्रो कुमार की भूमिका को संदेहास्पद मानते हुए जांच समिति बनाई थी। साल 2019-20 में आरजीपीवी में विभिन्न निर्माण कार्य हुए थे।
इस दौरान कुलसचिव का प्रभार प्रो एसएस कुश्वाह के पास था। मामले में तत्कालीन कुलसचिव एसएस कुश्वाह को समिति ने दोषी माना था। विवि के पालीटेक्निक कालेज में दिसंबर 2023 में फैकल्टी द्वारा विद्यार्थियों को सेमेस्टर परीक्षा के प्रश्नपत्र बेचने का मामला सामने आया था।
इस मामले में भी तत्कालीन कुलपति गुप्ता और कुलसचिव विवादों में आए थे। इसकी जांच भी अधर में है। इसके अलावा कुलपति प्रो. गुप्ता पर अपने चहेतों को नियम विरुद्ध पीएचडी कराने और करियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत 18 शिक्षकों को एसोसिएट प्रोफेसर से प्रमोशन देने का मामला सामने आया था।

