Skip to content
Wednesday, 4 November 2026
भोपाल मध्य प्रदेश

यही अपेक्षा है कि सरकार के सहयोग से माच कला निरंतर समृद्ध होती रहे – पदमश्री ओम प्रकाश शर्मा

3 min read
Text Size:

अनोखा तीर भोपाल:-भारत का हदय अंचल मालवा भारतीय कला संस्कृति से समृद्ध है। यहां की माच कला पिछले दो सौ सालों से लोक मनोरंजन और मूल्यों को प्रसारित करने का माध्यम है। माच कला के अनन्य साधक ओम प्रकाश शर्मा को प्रतिष्ठित पदमश्री से सम्मानित करने की घोषणा हुई है।

 ओमप्रकाश शर्मा दस-बारह वर्ष की आयु से ही माच कला में पारंगत होते आ रहे हैं। उन्होने इस कला को समृद्ध बनाने और इसका संरक्षण करने में सुदीर्घ साधना की है। कला के प्रति उनका समर्पण नमन योग्य है। वे अपने कलाकार बनने में अपने गुरू पिता स्वर्गीय श्री शालीग्राम और दादा स्वर्गीय श्री कालूरामजी का योगदान मानते हैं। लोकनाटय कला माच की साधना करते हुए ओमप्रकाश शर्मा स्वयं भी वादय यंत्रों को बजाने में पारंगत हो गये। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश –

माच कला की प्रारंभिक शिक्षा –

10-12 वर्ष की आयु से माच कला में प्रदर्शन कर रहा हूं। मेरे गुरू पिता स्व.श्री शालीग्राम एवं मेरे दादा स्व.श्री कालूरामजी थे।

कला की विशेषताएं –

इस कला में मेरे पिताजी और दादा जी ने स्वर ज्ञान, शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत, लोक संगीत एवं विशेष रूप से माच की विधा को सिखाया। इसमें 10-12 महिला एवं पुरूष कलाकार काम करते हैं। इसमें मुख्य रूप ढोलक, हार्मोनियम और सारंगी का उपयोग होता है। पहले जमाने में सारंगी, ढोलक तथा शहनाई का बिगड़ा रूप टोटा से बजाया करते थे।

युवा पीढ़ी का रूझान –

प्रमिता चारेगांवकर, विनीता माहोरकर, पूजा चौहान, गजेन्द्र सिंह, सूर्यप्रकाश वाजपेयी, शनि नागर जैसे कलाकारों से कला को अपनाया। मेरे बेटे भूपेन्द्र एवं विजेन्द्र शर्मा भी कला साधना कर रहे हैं।

सरकार से अपेक्षा –

सरकार की मदद से ज्यादा से ज्यादा लोगों को माच कला में पारंगत किया जा सकता है।

अब तक कितने प्रदर्शन दे चुके हैं

अभी तक 200 से अधिक माच कला का प्रदर्शन दे चुके हैं। भारत रंग उत्सव, चैन्नई, लखनऊ, मुम्बई में माच कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।

माच की विषय वस्तु –

स्वयं लिखते हैं। परंपरागत विषय होते हैं। रामायण, राधा-कृष्ण प्रसंगों और ऐतिहासिक विषयों पर लिखी जाती है।

कोई विशेष सम्मान

नये हार्मोनियम बनाने की कला के साथ ही साथ हार्मोनियम, गिटार, मेंडोलीन, वायलीन, तबला, ढोलक बजाना सीखा। वर्ष 2001 में शिखर सम्मान, 2007 में भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 2014 में राष्ट्रीय तुलसी सम्मान और अब पद्मश्री सम्मान।

सरकारों से अपेक्षा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव को बहुत धन्यवाद और हृदय से आभार। वे कलाकारों के मान-सम्मान का ध्यान रखते हैं। यही चाहते हैं कि सरकार के सहयोग से माच कला निरन्तर समृद्ध होती रहे।

101 Views
What do you think?

Leave a Reply