मुख्यमंत्री के निर्देश पर ऋषियों की अस्थियों के ढेर से बना सिद्धा पहाड़ को वन आच्छादित करने की पहल तेज

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गणेश पांडे, भोपाल। सतना जिले के चित्रकूट स्थित सिद्धा पहाड़ पर अब कभी उत्खनन नहीं होगा। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर मशहूर और ऐतिहासिक सिद्धा पहाड़ को वन आच्छादित बनाने और संवारने का काम शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत पर्यावरण दिवस पर क्षेत्रीय सांसद गणेश सिंह और विधायक चित्रकूट नीलांशु त्रिवेदी की उपस्थिति में हुई। सतना वन मंडल डीएफओ विपिन पटेल ने जिला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर स्थित धार्मिक स्थल सिद्धा पहाड़ को संवारने के लिए 2 वर्ष का वर्किंग प्लान तैयार किया है। इस कार्य के लिए डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड से 50 लाख रुपए की मांग की गई है। ऋषियों की अस्थियों के ढेर से बना सिद्धा पहाड़ के चारों तरफ 10 हेक्टेयर क्षेत्र की परिधि में चैनलिंक फेंसिंग की जाएगी। पहाड़ के चारों तरफ धार्मिक मान्यताओं के 4000 पौधेरोपण किया जाएंगा। सिद्धा पर्वत के शिखर तक श्रद्धालुओं को पहुंचने के लिए कांक्रीट मार्ग और स्टील की रेलिंग लगाई जाएगी। पहाड़ की परिक्रमा के लिए 14 सो रनिंग मीटर में डब्ल्यूबीएम मार्ग का निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा भू जल संरक्षण के लिए पत्थर का चेक डैम निर्माण और 1000 नग कंटूर ट्रेंच का कार्य किया जाएगा। पहाड़ के रिक्त क्षेत्रों में खोदे गए कंटूर ट्रेंच के मिट्टी के ऊपर बीज बुवाई का कार्य किया जाएगा। उत्खनन पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं। दरअसल, पवित्र नगरी चित्रकूट धाम के मशहूर धार्मिक स्थल सिद्धा पहाड़ में उत्खनन की तैयारी चल रही थी, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मुद्दा बना लिया था। इसके बाद अब सीएम शिवराज ने कहा है कि सिद्धा पहाड़ पर उत्खनन नहीं किया जाएगा। इसके लिए जिला प्रशासन को निर्देश दे दिए गए हैं।

क्या है सिद्धा पहाड़, सतना

रामचरित मानस में अरण्यकांड में उल्लेख है कि भगवान राम जब चित्रकूट से आगे की ओर बढ़े तो सिद्धा पहाड़ मिला। सिद्धा पहाड़ ऋषियों की अस्थियों के ढेर से बना है। यहीं श्रीराम ने भूमि को राक्षसों से विहीन करने की प्रतिज्ञा की थी। पौराणिक महत्व से जुड़े राम भक्तों की आस्था के इस केंद्र सिद्धा पर्वत में लैटेराइट, बॉक्साइट, राम-रज गेरू जैसी खनिज संपदा है।

11 फीट ऊंची वनवासी श्रीराम की प्रतिमा

श्रीराम प्रतिज्ञा स्थल में वनवासी प्रभु श्रीराम की 11 फीट ऊंची प्रतिमा लगभग तैयार हो चुकी है। इस प्रतिमा को ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट के ललित कला विभाग के प्राध्यापकों और छात्रों की टीम ने मिलकर तैयार किया है। सिद्धा पहाड़ की चोटी पर स्थापित की जाने वाली यह प्रतिमा 5 किलोमीटर दूर से भी लोगों को नजर आएगी। प्रतिमा स्थापित होने के बाद सिद्धा पर्वत में दर्शनार्थियों की संख्या में काफी इजाफा होगा। यह स्थल राम वन गमन पथ में शामिल है।

क्यों उठा था विवाद

पिछले वर्ष खनिज विभाग ने सिद्धा पहाड़ की खदान को फिर से शुरू किए जाने का आदेश था। बताते हैं कि मझगवां तहसील के सिद्धा ग्राम में स्थित सिद्धा पर्वत पर बाक्साइट, लैटेराइट, ओकर, और व्हाइट अर्थ की 16.14 हेक्टेयर खदान पहली बार अगस्त 1978 में जैतवारा की मेसर्स गायत्री देवी बंसल के नाम 10 साल के लिए स्वीकृत की गई थी। अगस्त 1988 में 10 साल के लिए एक बार फिर से इसी खदान का नवीनीकरण कराया गया। यह चलती रही लेकिन 2015 में विरोध के बाद खदान बंद कर दी गई। दरअसल मामले ने तब उछाल पकड़ा जब 2 हेक्टेयर के लिए एनवायरमेंट क्लीयरेंस मांगी गई। यह उस कंपनी ने मांगा जिसके खिलाफ पहले से मामला न्यायालय में विचाराधीन है। बताते हैं कि लीज को पहले जैतवारा की राकेश एजेंसी के नाम पर ट्रांसफर कराया गया। इसमें 6 भागीदार बने। इन भागीदारों में कटनी के अल्फर्ट गंज माई का बगीचा निवासी सुरेन्द्र सिंह सलूजा के अलावा जैतवारा सोम कुमार बंसल, ओमप्रकाश बंसल, विनय कुमार बंसल, श्याम कुमार बंसल और एक राजेश कुमार जैन शामिल हैं। राकेश एजेंसी के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत मामला सीजेएम की अदालत में फरवरी 2016 से चल रहा है। इसके बाद भी राकेश एजेंसी ने कटनी के खनन कारोबारी के जरिए ये लीज दोबारा पाने सफल हो गए थे। एनवायरमेंटल क्लीयरेंस के लिए जब मामला सिया कमेटी में पहुंचा तो कमेटी के सदस्यों ने आपत्ति की और उसके बाद से ही सियासत तेज हो गई। ऐतिहासिक सिद्धा पहाड़ को बचाने के लिए आंदोलन शुरू हुए और जब मामला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक पहुंचा तो उन्होंने तत्काल माइनिंग निरस्त करने के आदेश जारी कर दिए थे।

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