प्रदीप साहू, खातेगांव- गांधी ने स्वदेश व ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना में गांव को आत्मनिर्भर बनाने की बात कही है। इसके लिए लघु उद्योग व स्वावलंबन की बात कही है जिसमें बड़े उद्योग की बजाए हर व्यक्ति को अपना काम करते हुए कुछ उत्पान करने की बात कही है।
खातेगांव के ग्रामीण क्षेत्रों में हस्तकला की जानकारी को लेकर प्रदीप साहू या सामाजिक कार्यकर्ता योगेश मालवीया द्वारा मिट्टी की कला और स्वरोजगार को समझने ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण किया गया। इसी कड़ी में ग्राम बछखाल के कुम्हार परिवारों से चर्चा की गई।
बछखाल के मुकेश प्रजापत ने बताया कि मिट्टी के मटके व दिए बनाने का काम हमारा पुश्तैनी और पापंरागत काम है। यह हुनर पीढ़ियों दर पीढ़ी से चल रहा है। मेरे पिताजी जब मटके व दिये बनाने का काम करते थे, तब हम देखा करते थे। खाली समय में खुद से सिखा और काम करना आ गया। मेरी पढाई कर कुछ करने की इक्छा थी लेकिन परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। मैंने कक्षा 5 वी तक पढ़ाई कर पाया। पिता के बीमारी के कारण आसमायिक शांति हो गया। मेरे पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई घर पर मेरे दो भाई एक बहन और मां की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। हमारे पास पांच एकड़ जमीन थी वह असिंचित जमीन, बिजली के साधन नहीं थे। खेती व परिवार के जिम्मेदारी के चलते पढाई छोड़ दी। हमारा गांव खण्डवा जिले के हरसूद ब्लाक का जेतापुर गांव था। हमारे बाप दादा मूल निवास वहीं था। डेम के कारण हमारा गांव व हरसूद के गांव डूब गये ऐसे में कुम्हार समुदाय को नये क्षेत्र में जाकर रोजगार करना कठिन था। खातेगांव ब्लाक के ग्राम बछखाल में आज से 25 वर्ष पूर्व आकर निवास किया।
मिट्टी की कला – कुम्हार समाज मटकी, सुराई, कढ़ीला, टक्कन, मटका, गुल्ल्क, दीप, धूपधानी, घट्टी व मिट्टी से जुड़े कुछ खिलौने बनाते है। इस हस्तकला में वर्तमान महंगाई के समय में घर परिवार चलाना कठिन है यहां गांव में मिट्टी नहीं है। सतवास तहसील के गांव के तालाब जो कि गांव से 80 किमी दूर है।वहां से मिट्टी लाना पड़ता है। मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी का चयन कर मिलना एक चुनौती है। इसके अलावा नर्मदा किनारे बारिश के कपे की मिट्टी लाते है। पहले नदी किनारे खेतों के आसपास से मिट्टी लाते थे लेकिन अब लोग जागरूक हो गये, कोई भी एक तगाड़ी मिट्टी नही लाने देते न ही बेचते है। ऐसे में मिट्टी मिलना भी कठिन है। मिट्टी के बर्तन को आग की भट्टी में पकाना होता है। पहले जंगल से लकड़ी मिल जाती थी अब जंगल भी खत्म है गये। गांव में लकड़ी आसानी से मिल जाती थी अब लोगों ने खेत की मेड और पेड़ काट कर खेती के लिए जमीन बना ली है ऐसे में लकड़ी मिलती नही है। हमे खातेगांव लकड़ी की टाल से बुलानी होती है लकड़ी भी महंगी हो गई है।
मिट्टी के बर्तन बनाने में समय परिवार के दो लोग दिन भर का समय लगाते है। बच्चे जरूरत अनुसार सहयोग करते है ज्यादात्तर महिलाएं कच्चा गारा मिट्टी तैयार करती है। मटके और दिये का आकार देने का काम पुरुष करते है। कुछ गांवों में गिनी चुनी महिलाएं भी बना लेती है। यह हुनर व मेहनत ताकत का काम है एक दिन में महिला पुरुष मिलकर दोनों 8 से 10 मटके और एक दिन में 500 से 600 दिया बनाते है। एक सीजन में 400 से 600 मटके बनाते और बेचते है। भट्टी पर पकाने के दौरान मटके 25 से 30 मटके और 50से 100 दिये टूट भी जाते है।
रीति-रिवाजों में समय के साथ परिवर्तन पापंरागत त्यौहारों में बदलाव पर श्रीमती संगीता प्रजापत ने बताया कि पहले किसान गेंहु चने को मजदूर से हाथों से कटवाकर थ्रेसर से निकालते थे। उस दौरान लोग छोटी मटकी खरीद कर ले जाते थे। जब गेंहु निकालते थे तब उस मटकी में गेंहु भरकर आम के पत्ते लगाकर नारियल रखते थे। वर्तमान में किसान हाई वेस्टर से गेंहूं कटाते तो मटकी नही रखते केवल नारियल फोड़ते है। जिसके कारण हमारी मटकी भी नही बिकती है। इसी प्रकार शादी-विवाह में अलग-अलग आकार के मटकी खरीद कर ले जाते थे जिसे विवाह के मंड़प के चारों कोनों में मिट्टी की मटकी रंग रोवन कर सजाकर लगाते थे। अब टेंट के स्टील,ऐल्यमिनयम के मटके ने जगह ले ली है। इसी प्रकार पहले खेत हल बखर से जोतते थे। गेंहु की बुआई अंकुरण होने पर नाड़ी पूजा करते थे। नाड़ी मतलब बैल और धरती मां की पूजा करते थे। धरती माता का सीना चीरकर अनाज बोते थे वह माफी मांगने के साथ अच्छी फसल की प्रार्थना करते थे। पूजा के दौरान लोग 4 छोटे कुंडे और मिट्टी के दिये ले जाते थे। कूड़े में दूध से भरकर और मटकी में गेंहु उबालते थे। अब खेत में बैल की जगह ट्रेक्कर ने ले ली है। आजे पूर्खे खत्म हो गये नये पढ़ी लिखी किसान पीढ़ी इन पूजा या मान्यता को नहीं मानते है जिससे हमारी ब्रिकी कम हुई है।
गांव-गांव जाकर बिक्री मुकेश प्रजापत ने बताया कि परम्परा अनुसार गांव में पहले मटके व दिये बैलगाड़ी से बेचा करते थे अब जमीन नहीं है ऐसे में बैल पालना मुश्किल है। छोटी चार पहिया वाहन किराये से लेकर मटके बचने जाते है। एक मटका 120 से 150 रूपये में बिकता है। गांव में एक बड़े मटके पर 8 से 10 किलो गेंहू अनाज देते है। मटके के साईज के आधार गेंहु मिलता है। हमारे चार पांच गांव के क्षेत्र चयनित है उन गावों से हमे 10 या 12 बोरी गेंहुं मटके के बदले अनाज के रूप में मिलता है।उसमें 4 बोरी साल भर खाने के लिए रख लेते है बाकि स्टाक कर समय -समय पर जरूत अनुसार बेचकर घर गुजारा करते है | साल भर घर परिवार भरण पोषण के लिए व्यापार में कुम्हार समुदाय गर्मियों के दो महीने और दीपावाली के समय एक महीने का समय होता है। उसी से साल भर अजीविका के लिए कमाना होता है। इसके अलावा आस-पास के स्थानीय हाट बाजार में बेचने जाते हैं। बारिश मे दिक्कत होती है। कोविड महामारी में आर्थिक संकट आ गया था। गांव के लोग गांव के अंदर नहीं जाने देते थे बेचना तो दुर रहा।

खुशियों के क्षण मिट्टी की कला व हुनर अच्छा है गरीब व मध्यम वर्ग के लोग मटके से प्यास बुझाते है और फ्रिज की जगह मटके से जो सुकून चेहरे पर दिखाई देता है उससे हमे खुशी मिलती है लेकिन अब पहले से जैसा रोजगार नही रहा। अब मिट्टी के बर्तन गुजरात के बड़े-बड़े कारखानो ने ले ली है। पहले मिट्टी के कबेलु बनाते थे।अब लोगों के घर पर छत व पक्के होने से वह काम भी बंद हो गया है। क्षेत्रीय बाजार न होने पर हमे मिट्टी के दिए और मटके बड़े व्यापारी को कम दामों में बेचना भी मजबूरी है।
इस पारंपरिक काम में मेहनत ज्यादा है, इनकम कम है
वर्तमान में आधुनिकता के परिवेश में समय को देखते हुए मिट्टी की कला को बढ़ावा व नया स्वरूप देकर बाजार में जगह देने की जरूरत है। इसे अन्य हस्तकलाओं को बढ़ावा देकर एक स्थान उपलब्ध कराने की जरूरत है।
अध्ययनकर्ता योगेश मालवीया
उल्लेखनीय है कि हरसूद क्षेत्र से विस्थापित होकर कुम्हार समुदाय देवास, हरदा, खण्डवा, सिहोर आदि जिले में अपने समाज या रिश्तेदारों की मदद से बसे है। अंत में मुकेश प्रजापत ने बताया कि में और हमारे समाज भी अब पहली दूसरी पीढ़ी को पढ़ा रहे है और अन्य रोजगार में नौकरी या व्यापार की चाह रहे है कुम्हार समुदाय ने स्वरोजगार और लघु उद्योग कला को बढ़ाने हेतु हमारी समाज ने प्रशासन को लिखित मौखिक आवेदन दिया है किन्तु अब तक कुछ कार्यवाही नहीं आशा है आगामी समय में चुनाव के समय कुछ पहल या घोषणाएं हो।
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