शासन की उदासीनता से शासकीय जमीनों पर लगे फलदार वृक्षों की वर्षों से नहीं हो रही नीलामी

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अनोखा तीर, रहटगांव। रहटगांव क्षेत्र में शासकीय जमीनों पर लगे आम, जामुन और सीताफल के फलदार वृक्षों से लाखों रुपए की आमदनी संभव है, जो शासन के खजाने में जानी चाहिए। इससे शासन को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है और वृक्षों का बेहतर रखरखाव भी सुनिश्चित हो सकेगा। साथ ही अवैध कटाई पर अंकुश लगेगा और पर्यावरण को शुद्ध ऑक्सीजन भी मिलती रहेगी। जो पेड़ वृद्ध हो गए हैं या सूख चुके हैं, उनका उपयोग मुक्तिधाम में अंत्येष्टि के लिए तथा ठंड के दिनों में शासकीय परिसरों में अलाव जलाने के काम में लिया जा सकता है। रहटगांव में दो सौ से अधिक आम के पेड़ सहित सीताफल और जामुन के पेड़ मौजूद हैं। मिली जानकारी के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से और कई राज्यों के राजस्व नियमों के तहत शासकीय जमीनों पर स्वत: उगे या लगाए गए फलदार वृक्षों (जैसे आम, सीताफल, जामुन) की नीलामी ‘शिवायÓ या ‘शिवाईÓ मद के अंतर्गत की जाती रही है। रहटगांव में खसरा नंबर 118 रखवा 1.3760 अमराई एवं खसरा नंबर 119 रखवा 13 हेक्टेयर 0.510 भूमि में दो एकड़ आईटीआई, दो एकड़ तहसील और दो एकड़ आदिम जाति छात्रावास भवन शामिल हैं। इसके अलावा शासकीय रास्तों सहित अन्य स्थानों पर भी फलदार पेड़ लगे हुए हैं। वहीं खसरा नंबर 110/3 गोठान, खसरा नंबर 110/6 चराई और खसरा नंबर 107/2 गोठान भूमि पर भी अनेक आम सहित अन्य फलदार वृक्ष मौजूद हैं। जानकारी के मुताबिक, राजस्व अभिलेखों में पंजीकरण के तहत पटवारी या स्थानीय राजस्व अधिकारी द्वारा उन शासकीय जमीनों का सर्वे किया जाता था, जहां फलदार वृक्ष मौजूद हैं। इन पेड़ों को ‘शिवाय चकÓ या सरकारी संपत्ति के रूप में दर्ज किया जाता था। फल आने के सीजन से पहले जैसे आम के लिए मार्च-अप्रैल स्थानीय कोटवार या पटवारी पेड़ों पर लगी बौर या फलों की स्थिति देखकर संभावित उपज का आंकलन करते थे, जिसके आधार पर न्यूनतम नीलामी राशि तय की जाती थी। नीलामी की तारीख से पहले गांव में मुनादी (ढोल बजाकर घोषणा) कराई जाती थी तथा ग्राम पंचायत के सूचना पटल और तहसील कार्यालय में नोटिस चस्पा किया जाता था। जो व्यक्ति सबसे ऊंची बोली लगाता था, उसे उस सीजन के लिए फल तोड़ने का अधिकार दिया जाता था। यह नीलामी केवल फलों के उपभोग के लिए होती थी, जिसमें ठेकेदार को केवल फल तोड़ने की अनुमति होती थी, पेड़ों को नुकसान पहुंचाने या काटने का अधिकार नहीं होता था और जमीन पर उसका कोई मालिकाना हक नहीं बनता था। अब खुली नीलामी के बजाय स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों को प्राथमिकता देने का प्रावधान है, जिससे ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा मिल सके। गौरतलब है कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में शासकीय भूमि पर लगे फलदार वृक्ष शासन की संपत्ति होते हैं। यदि समय पर इनकी नीलामी नहीं होती, तो राजस्व हानि के साथ फलों की चोरी और पेड़ों के रखरखाव में लापरवाही की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।  अक्सर जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती, पंचायत सचिव या सरपंच द्वारा समय पर प्रस्ताव तैयार न करना, नीलामी की सूचना ग्रामीणों तक न पहुंचना तथा स्थानीय रसूखदारों द्वारा बिना नीलामी के ही फलों का उपयोग कर लेना जैसी वजहों से प्रक्रिया में देरी होती है।

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