ग्रीष्मकालीन मूंग फसल की तैयारी में जुटे किसान

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-चने ने किया निराश तो गेहूं ने जगाई आस

अनोखा तीर, हरदा। गेहूं और चना फसल निकालने के बाद अब किसानों ने मूंग फसल का काम शुरू कर दिया है। इस वर्ष जहां चने की फसल ने किसानों को निराश किया है, वहीं गेहूूं की अच्छी पैदावार ने किसानों को नई उम्मीद दी है। जिले में लगभग रबी फसल कट कर किसानों के घरों तक पहुुंच चुकी है। जिन किसानों के पास गर्मियों में अच्छा पानी है। उनके लिए मूंग फसल एक अच्छा विकल्प है। ग्रीष्मकालीन मूंग की बुआई का अनुकूल समय 10 मार्च से 10 अप्रैल होता है। ग्रीष्मकाल में मूंग की खेती करने से अधिक तापमान तथा कम आर्द्रता के कारण बीमारियों तथा कीटों का प्रकोप कम होता है। परंतु इससे देरी से बुआई करने पर गर्म हवा तथा वर्षा के कारण फल्लियों को नुकसान होता हैं।  मूंग की अच्छी वैराइटी 65-70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। पैदावार की अगर बात करें तो ७-८ क्विंटल प्रति एकड़ तक हो जाती है। यहां फसल अतिरिक्त आय का जरिया बनने के साथ आर्थिक स्थिति सुधारने में मददगार बनी हुई है। पिछले 4-5 सालों में मूंग की पैदावार भी बढ़ी है। मंडियों में मूंग का भाव कम से कम ७-८ हजार प्रति क्विंटल तक है। जिले के किसानों केे लिए मूंग फसल किसी वरदान से कम नहीं है। किसान बताते है कि जब से उन्होंने मूंग फसल लगाना शुरू की है उनकी आर्थिक स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ है।

अंतिम छोर तक मिलेगा पानी
ग्रीष्मकालिन मूंग फसल के लिए प्रशासन अंतिम छोर तक के किसान को नहर का पानी फसल सिंचाई हेतु पहुंचाने की मंशा से काम कर रहा है। जल्द ही जिले के लिए तवा डेम से पानी छोड़ा जाएगा। जिला प्रशासन की कोशिश है कि अंतिम छोर पर स्थित किसान को भी मूंग का पानी मिल सके। जिले के किसानों के लिए नहर का पानी तवा डेम से २९ मार्च तक छोड़ा जा सकता है। इधर कलेक्टर ने बोरवेल करने पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। जिन किसानों तक नहर का पानी पहुंचेगा वह तो मूंग फसल का लाभ लेंगे, लेकिन जिन किसानों के पास पानी नहीं पहुंच पाएगा और जो बोरवेल कराने वालेे है उनके लिए प्रतिबंध समस्या बन गया है। ऐसे किसान मूंग फसल से वंचित रह जाएंगे।

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