पर्यावरण संरक्षण से ही बचाया जा सकता है मां नर्मदा का अस्तित्व : केंद्रीय मंत्री उईके

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नर्मदा नदी को बचाने निकली नर्मदा पर्यावरण संरक्षण परिक्रमा यात्रा

-अमृतवन, संरक्षण फाउन्डेशन के बैनरतले 20 लोगों का दल हुआ रवाना

अनोखा तीर, हंडिया। आज मध्यप्रदेश की संपन्नता और करोड़ों की प्यास बुझाने वाली मां नर्मदा नदी को पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से ही बचाया जा सकता है। अमृत वन संरक्षण फाउंडेशन के गौरीशंकर मुकाति द्वारा निकाली जा रही नर्मदा पर्यावरण संरक्षण परिक्रमा नर्मदातटीय क्षेत्र में रहने वाले लोगों को जागरुक कर नर्मदा नदी को बचाने के लिए नींव का पत्थर साबित होगी। यह बात केंद्रीय राज्य मंत्री एवं क्षेत्रीय सांसद डीडी उईके ने नर्मदा पर्यावरण संरक्षण परिक्रमा के शुभारंभ अवसर पर रिद्धनाथ मंदिर प्रांगण हंडिया में कही। मंत्री श्री उईके ने कहा कि श्री मुकाति की इस पहल को केंद्र सरकार और राज्य सरकार पूरा सहयोग देगी। श्री उईके ने कहा कि जो सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल वार्मिंग को शून्य प्रतिशत तक करने का देखा है, वह श्री मुकाति जैसे पर्यावरण प्रेमी व्यक्तियों के कारण संभव होगा। कार्यक्रम के सूत्रधार गौरीशंकर मुकाति ने इस यात्रा के संबंध में बताया कि यह यात्रा आस्था की यात्रा नहीं, बल्कि मां नर्मदा को बचाने की यात्रा है। नर्मदा की परिक्रमा तो हर व्यक्ति करता है, लेकिन इस यात्रा का मूल उद्देश्य नर्मदा नदी के तटवर्तीय १८ जिलों में आमजनता और किसानों के बीच वृक्षारोपण को लेकर जनजागृति की अलख जगाना है। श्री मुकाति ने कहा कि हमारे फाउंडेशन के माध्यम से नर्मदा नदी एवं उसकी सहायक नदियों के किनारे किसानों के खेत में लगभग ५० लाख हेक्टेयर भूमि पर ५० करोड़ पौधों का रोपण किया जाना है। इस महाअभियान में जहां ६० लाख से अधिक स्थानीय लोगों को कार्य मिलेगा, वहीं आने वाले २० वर्ष पश्चात उन किसानों को १० लाख करोड़ से अधिक का काष्ठ उत्पादन लाभ भी प्राप्त होगा। श्री मुकाति ने बताया कि यह यात्रा आज २ जनवरी से प्रारंभ होकर नर्मदा तटीय क्षेत्रों के विभिन्न ग्रामों से होती हुई २३ जनवरी को हंडिया में ही समाप्त होगी। इस यात्रा में शामिल २० सदस्यीय टीम क्षेत्र के किसानों को पर्यावरण संवर्धन के साथ ही उससे कैसे आय प्राप्त होगी, इसके संबंध में जागरुक करेंगे। कार्यक्रम को अवंतिका विश्वविद्यालय के डायरेक्टर श्रीपादजी अवधूत ने भी संबोधित करते हुए कहा कि नर्मदा पर्यावरण संरक्षण परिक्रमा निकालने का जो आयोजन गौरीशंकर मुकाति जी ने किया है, वह निश्चित ही बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि मैंने खुद मां नर्मदा नदी की परिक्रमा की है और हर घाट के जल का टीडीएस जांच कराई है। अमरकंटक से लेकर गुजरात तक यह स्थिति है कि यह जल अब पीने लायक नहीं बचा है। पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि यह नर्मदा नदी को बचाकर लोगों को नया जीवन देने की यात्रा है। उन्होंने इस यात्रा के माध्यम से यह आहवान किया कि लोग नर्मदा के तटों की पवित्रता बनाए रखें और इसे पॉलीथिन और कैमिकल से दूषित न करें। कार्यक्रम में प्रवाजिका विशुद्धानंदा भारती, पूर्व कृषि मंत्री कमल पटेल, हरदा विधायक डॉ.आरके दोगने, जिपं अध्यक्ष गजेंद्र शाह, भारत भारती बैतूल के मोहन जी नागर, हरिहर आश्रम भमौरी के स्वामी राजेशदास, वैदिक विद्यापीठम के निरंजन शर्मा, डॉ.प्रभुशंकर शुक्ल प्रमुख रूप से उपस्थित थे। इस पर्यावरण बचाओ यात्रा में यात्री के रूप में कु.सिमरन शर्मा, श्रीमती सुमन, श्रीमती मनोरमा शर्मा, बलवीरसिंह राजपूत, अरविंद सारण, रामकृष्ण पटेल, मुन्नाभाई, बलराम पटेल, प्रहलाद शर्मा, जितेंद्र सोनी, रामकृष्ण दुगाया, श्याम भायरे, कैलाश विश्वकर्मा, मोहनलाल, शिवदयाल यादव एवं सुनील अंकरे शामिल हुए। यात्रा को रिद्धनाथ घाट से हरि झंडी दिखाकर रवाना किया गया। जिसका पहला पड़ाव संत सिंगाजी धाम था।

आस्था स्थल सिंगाजी में है गंदगी का साम्राज्य

आज नर्मदा पर्यावरण संरक्षण यात्रा के तहत नाभि कुंड हंडिया से चलकर खंडवा जिले के सिंगाजी पहुंचे। निमाड़ के प्रसिद्ध संत सिंगाजी महाराज का यह स्थान ने केवल निमाड़ क्षेत्र वासियों की आस्था का केंद्र है अपितु यहां मध्य प्रदेश के क्षेत्र सहित महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इस स्थान पर प्रतिवर्ष एक माह का मेला भी लगता है। किसी समय में सिंगाजी मेला मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि आसपास के प्रान्तों के लिए सबसे बड़ा पशु मेला हुआ करता था। परंतु इंदिरा सागर बांध परियोजना की डूब के दायरे में आने के कारण यहां स्थित ग्राम बोरखेड़ा पूरी तरह डूब की चपेट में आ गया है। अब सिंगाजी महाराज का समाधी स्थल एक टापू इंदिरा सागर बांध से बनी समुद्र जैसी झील के बीचों- बीच बने मानव निर्मित टापू के रूप में स्थित है। जिसे सिंगाजी महाराज का समाधि स्थल कहां जाता है। लोगों की ऐसी मान्यता है कि 16 वीं सदी के अंत में संत सिंगाजी महाराज ने इसी स्थान पर समाधि ली थी। यह स्थान बोरखेड़ा गांव में बसा हुआ था। लेकिन जब इंदिरा सागर बांध बना तो यह डूब गया था। लेकिन संत सिंगाजी महाराज के अनुयायियों ने सरकार से मांग की कि यह लोगों व किसानों की आस्था का केंद्र है, इसे विस्थापित नहीं किया जाए। तब तत्कालीन प्रदेश सरकार ने यहां हजारों ट्रक मिट्टी डालकर टापू बनाया और 2 किलोमीटर लंबा रैंप बनाकर इस समाधि स्थल को संरक्षित किया। इसके अलावा ऐसा भी कहा जाता है कि लगभग 200 फीट नीचे मूल समाधि स्थल है और ऊपर उनकी चरण पादुका और अखंड ज्योति जलती है। साथ ही साथ आपको बता दें कि लोग कहते है कि संभवत यह पहला ऐसा स्थान है जहां पर लोग अपने सपनों का घर बनाने के लिए पत्थरों को एक दूसरे पर रख कर कामना करते हैं कि जितने पत्थर एक दूसरे पर रखें है उतनी मंजिला इमारत बन जाएं। वहीं किसान यहां अपने पशुओं के लिए भी मन्नते मांगते है।? लेकिन आज जब इस स्थान पर हमारा परिक्रमा दल पहुंचा तो देखा कि यह आस्था का केंद्र गंदगी के कारण नयनाभिराम दृश्य को नारकीय कोहराम में तब्दील किए नजर आ रहा है। वैसे तो यहां लोग बैकवाटर में आस्था की डूबकी भी लगाते हैं लेकिन यहां का पानी किसी सड़े हुए नाले की तरह नजर आता है।

 

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