श्रीकृष्ण-सुदामा चरित्र का किया वर्णन  

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अनोखा तीर, हरदा। सुनते ही दौड़े चले आए मोहन, लगाया गले से सुदामा को, देखो देखो ये गरीबी ये गरीबी का हाल… कृष्ण के द्वार पे विश्वास लेके आया हूं। मेरे बचपन का यार है… मेरा श्याम बस यही सोच के आस लेके आया हूं। श्रीमद्भागवत कथा में सुदामा चरित्र के वर्णन के दौरान इन भजनो पर श्रद्धालु भक्ति भाव में डूबकर नृत्य करने लगे। खेड़ीपुरा भगवा चौक में श्रद्ध पक्ष में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा की मंगलवार को पूर्णाहुति की गई। अंतिम दिवस कथावाचक पंडित विद्याधर उपाध्याय ने कृष्ण सुदामा चरित्र का रोचक वर्णन सुनाकर भक्तों को भावविभोर कर दिया। भागवत कथा का समापन करते हुए कई कथाओं का भक्तों को श्रवण कराया। जिसमें प्रभु कृष्ण के 16 हजार शादियों के प्रसंग के साथ, सुदामा प्रसंग और परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई। कथा का समापन सुदामा चरित्र के वर्णन के साथ हुआ। कथाव्यास पंडित उपाध्याय ने कहा कि मित्रता करो, तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। परंतु आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता है, मित्रता खत्म हो जाती है। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती ने दुनिया को यह संदेश दिया कि राजा हो या रंक दोस्ती में सब बराबर होते हैं। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है। कथा व्यास ने कहा कि द्वारपाल के मुख से पूछत दीनदयाल के धाम, बतावत आपन नाम सुदामा सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगवानी करने राजमहल के द्वार पर पहुंच गए। यह सब देख वहां लोग यह समझ ही नहीं पाए कि आखिर सुदामा में ऐसा क्या है जो भगवान दौड़े दौड़े चले आए। बचपन के मित्र को गले लगाकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें राजमहल के अंदर ले गए और अपने सिंहासन पर बैठाकर स्वयं अपने हाथों से उनके पांव पखारे। कहा कि सुदामा से भगवान ने मित्रता का धर्म निभाया और दुनिया के सामने यह संदेश दिया कि जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। राजू हरने ने बताया की अंतिम दिवस कथा श्रवण हेतु दूर-दूर से श्रद्धालुओं ने पहुंचकर कथा का लाभ उठाया जिसमे श्रोताओं की खूब भीड़ उमड़ी। समापन पर हवन यज्ञ पूर्णाहुति के बाद प्रसादी वितरण कर कथा का समापन किया गया। खेड़ापति भागवत समिति द्वारा भागवत कथा के सफल आयोजन पर सभी का आभार माना।

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