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Sunday, 18 October 2026
हरदा

जनजाति सांस्कृतिक समागम

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-दिल्ली से उठेगी जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना की ऐतिहासिक हुंकार

अनोखा तीर, हरदा। देश की राजधानी दिल्ली का लाल किला मैदान 24 मई को भारतीय जनजातीय इतिहास के एक अभूतपूर्व अध्याय का साक्षी बनने जा रहा है। पहली बार भारत के कोने-कोने से 500 से अधिक जनजातियों के लगभग दो लाख से अधिक जनजातीय समाजजन एक मंच पर एकत्रित होकर अपनी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और दैवीय परम्पराओं के संरक्षण का संकल्प लेंगे। यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन जनजातीय चेतना, अस्मिता और सांस्कृतिक स्वाभिमान का विराट उद्घोष होगा। इस भव्य जनजाति सांस्कृतिक समागम का आयोजन अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के नेतृत्व में जनजातीय सुरक्षा मंच के बैनर तले ‘तू मैं – एक रक्तÓ  के उदघोष के साथ किया जा रहा है। यह आयोजन उस समय हो रहा है जब वैश्वीकरण, बाजारवाद और सांस्कृतिक विघटन के दौर में जनजातीय समाज अपनी मूल पहचान, परम्पराओं और जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए संघर्षरत है। भारत का जनजातीय समाज केवल एक सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि इस राष्ट्र की प्राचीनतम सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतिनिधि है। जल, जंगल और जमीन के साथ सहअस्तित्व का जो दर्शन आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण के नाम पर खोज रही है, वह जनजातीय जीवन पद्धति में सदियों से विद्यमान है। प्रकृति पूजा, सामूहिक जीवन, मातृशक्ति का सम्मान, लोकदेवताओं में आस्था और धरती के प्रति संवेदनशीलता जनजातीय संस्कृति की मूल आत्मा है। दिल्ली का यह समागम इस बात का प्रतीक बनेगा कि जनजातीय समाज अपनी परम्पराओं को केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि जीवन व्यवहार में जीवित रखना चाहता है। यह आयोजन सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं होगा, बल्कि जनजातीय समाज की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक अधिकार और सामाजिक अस्तित्व की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति बनेगा। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आने वाली जनजातियाँ अपने पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वेशभूषा, वाद्ययंत्र, देवी-देवताओं की आराधना पद्धति तथा सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन करेंगी। यह विविधता भारत की उस सांस्कृतिक एकात्मता को प्रदर्शित करेगी जिसमें भिन्नता के भीतर भी एक साझा राष्ट्रीय आत्मा विद्यमान है। यह भी महत्वपूर्ण है कि जनजातीय समाज आज अपनी संस्कृति और परम्पराओं पर बढ़ते वैचारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दबावों को गंभीरता से महसूस कर रहा है। ऐसे समय में यह समागम अपनी जड़ों से जुड़े रहने और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी दैवीय एवं सांस्कृतिक परम्पराओं को सुरक्षित पहुँचाने का राष्ट्रीय संकल्प माना जा रहा है। लाल किला, जो भारत के गौरव, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है, वहीं पर जनजातीय समाज का यह विराट संगम होना अपने आप में अत्यंत प्रतीकात्मक है।  24 मई का यह जनजाति सांस्कृतिक समागम केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय जनजातीय अस्मिता के इतिहास में एक नई सांस्कृतिक घोषणा के रूप में स्मरण किया जाएगा।
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